ट्रैन के ए.सी. कम्पार्टमेंट में मेरे सामने की सीट पर बैठी लड़की ने मुझसे पूछा " हैलो, क्या आपके पास इस मोबाइल की पिन है??"
उसने अपने बैग से एक फोन निकाला था, और नया सिम कार्ड उसमें डालना चाहती थी। लेकिन सिम स्लॉट खोलने के लिए पिन की जरूरत पड़ती है जो उसके पास नहीं थी। मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और सीट के नीचे से अपना बैग निकालकर उसके टूल बॉक्स से पिन ढूंढकर लड़की को दे दी। लड़की ने थैंक्स कहते हुए पिन ले ली और सिम डालकर पिन मुझे वापिस कर दी।
थोड़ी देर बाद वो फिर से इधर उधर ताकने लगी, मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने पूछ लिया "कोई परेशानी??"
वो बोली सिम स्टार्ट नहीं हो रही है, मैंने मोबाइल मांगा, उसने दिया। मैंने उसे कहा कि सिम अभी एक्टिवेट नहीं हुई है, थोड़ी देर में हो जाएगी। और एक्टिव होने के बाद आईडी वेरिफिकेशन होगा उसके बाद आप इसे इस्तेमाल कर सकेंगी।
लड़की ने पूछा, आईडी वेरिफिकेशन क्यों??
मैंने कहा " आजकल सिम वेरिफिकेशन के बाद एक्टिव होती है, जिस नाम से ये सिम उठाई गई है उसका ब्यौरा पूछा जाएगा बता देना"
लड़की बुदबुदाई "ओह्ह "
मैंने दिलासा देते हुए कहा "इसमे कोई परेशानी की कोई बात नहीं"
वो अपने एक हाथ से दूसरा हाथ दबाती रही, मानो किसी परेशानी में हो। मैंने फिर विन्रमता से कहा "आपको कहीं कॉल करना हो तो मेरा मोबाइल इस्तेमाल कर लीजिए"
लड़की ने कहा "जी फिलहाल नहीं, थैंक्स, लेकिन ये सिम किस नाम से खरीदी गई है मुझे नहीं पता"
मैंने कहा "एक बार एक्टिव होने दीजिए, जिसने आपको सिम दी है उसी के नाम की होगी"
उसने कहा "ओके, कोशिस करते हैं"
मैंने पूछा "आपका स्टेशन कहाँ है??"
लड़की ने कहा "दिल्ली"
और आप?? लड़की ने मुझसे पूछा
मैंने कहा "दिल्ली ही जा रहा हूँ, एक दिन का काम है, आप दिल्ली में रहती हैं या...?"
लड़की बोली "नहीं नहीं, दिल्ली में कोई काम नहीं ना मेरा घर है वहाँ"
तो? मैंने उत्सुकता वश पूछा
वो बोली "दरअसल ये दूसरी ट्रेन है, जिसमे आज मैं हूँ, और दिल्ली से तीसरी गाड़ी पकड़नी है, फिर हमेशा के लिए आज़ाद"
आज़ाद?? लेकिन किस तरह की कैद से?? मुझे फिर जिज्ञासा हुई किस कैद में थी ये कमसिन अल्हड़ सी लड़की..
लड़की बोली, उसी कैद में थी जिसमें हर लड़की होती है। जहाँ घरवाले कहे शादी कर लो, जब जैसा कहे वैसा करो। मैं घर से भाग चुकी हुँ..
मुझे ताज्जुब हुआ मगर अपने ताज्जुब को छुपाते हुए मैंने हंसते हुए पूछा "अकेली भाग रही हैं आप? आपके साथ कोई नजर नहीं आ रहा? "
वो बोली "अकेली नहीं, साथ में है कोई"
कौन? मेरे प्रश्न खत्म नहीं हो रहे थे
दिल्ली से एक और ट्रेन पकड़ूँगी, फिर अगले स्टेशन पर वो मिलेगा, और उसके बाद हम किसी को नहीं मिलेंगे..
ओह्ह, तो ये प्यार का मामला है।
उसने कहा "जी"
मैंने उसे बताया कि 'मैंने भी लव मैरिज की है।'
ये बात सुनकर वो खुश हुई, बोली "वाओ, कैसे कब?" लव मैरिज की बात सुनकर वो मुझसे बात करने में रुचि लेने लगी
मैंने कहा "कब कैसे कहाँ? वो मैं बाद में बताऊंगा पहले आप बताओ आपके घर में कौन कौन है?
उसने होशियारी बरतते हुए कहा " वो मैं आपको क्यों बताऊं? मेरे घर में कोई भी हो सकता है, मेरे पापा माँ भाई बहन, या हो सकता है भाई ना हो सिर्फ बहने हो, या ये भी हो सकता है कि बहने ना हो और 2-4 मुस्टंडे भाई हो"
मतलब मैं आपका नाम भी नहीं पूछ सकता "मैंने काउंटर मारा"
वो बोली, 'कुछ भी नाम हो सकता है मेरा, टीना, मीना, शबीना, अंजली कुछ भी'
बहुत बातूनी लड़की थी वो.. थोड़ी इधर उधर की बातें करने के बाद उसने मुझे ट्रॉफी दी जैसे छोटे बच्चे देते हैं क्लास में, बोली आज मेरा बर्थडे है।
मैंने उसकी हथेली से ट्रॉफी उठाते बधाई दी और पूछा "कितने साल की हुई हो?"
वो बोली "18"
"मतलब भागकर शादी करने की कानूनी उम्र हो गई आपकी" मैंने काउंटर किया
वो "हंसी"
कुछ ही देर में काफी फ्रैंक हो चुके थे हम दोनों। जैसे बहुत पहले से जानते हो एक दूसरे को..
मैंने उसे बताया कि "मेरी उम्र 28 साल है, यानि 10 साल बड़ा हुँ"
उसने चुटकी लेते हुए कहा "लग भी रहे हो"
मैं मुस्कुरा दिया
मैंने उसे पूछा "तुम घर से भागकर आई हो, तुम्हारे चेहरे पर चिंता के निशान जरा भी नहीं है, इतनी बेफिक्री मैंने पहली बार देखी"
खुद की तारीफ सूनकर वो खुश हुई, बोली "मुझे उसने(प्रेमी ने) पहले से ही समझा दिया था कि जब घर से निकलो तो बिल्कुल बिंदास रहना, घरवालों के बारे में बिल्कुल मत सोचना, बिल्कुल अपना मूड खराब मत करना, सिर्फ मेरे और हम दोनों के बारे में सोचना और मैं वही कर रही हूँ"
मैंने फिर चुटकी ली, कहा "उसने तुम्हे मुझ जैसे अनजान मुसाफिरों से दूर रहने की सलाह नहीं दी?"
उसने हंसकर जवाब दिया "नहीं, शायद वो भूल गया होगा ये बताना"
मैंने उसके प्रेमी की तारीफ करते हुए कहा " वैसे तुम्हारा बॉय फ्रेंड काफी टेलेंटेड है, उसने किस तरह से तुम्हे अकेले घर से रवाना किया, नई सिम और मोबाइल दिया, तीन ट्रेन बदलवाई.. ताकि कोई ट्रेक ना कर सके, वेरी टेलेंटेड पर्सन"
लड़की ने हामी भरी,बोली " बोली बहुत टेलेंटेड है वो, उसके जैसा कोई नहीं"
मैंने उसे बताया कि "मेरी शादी को 5 साल हुए हैं, एक बेटी है 2 साल की, ये देखो उसकी तस्वीर"
मेरे फोन पर बच्ची की तस्वीर देखकर उसके मुंह से निकल गया "सो क्यूट"
मैंने उसे बताया कि "ये जब पैदा हुई, तब मैं कुवैत में था, एक पेट्रो कम्पनी में बहुत अच्छी जॉब थी मेरी, बहुत अच्छी सेलेरी थी.. फिर कुछ महीनों बाद मैंने वो जॉब छोड़ दी, और अपने ही कस्बे में काम करने लगा।"
लड़की ने पूछा जॉब क्यों छोड़ी??
मैंने कहा "बच्ची को पहली बार गोद में उठाया तो ऐसा लगा जैसे जन्नत मेरे हाथों में है, 30 दिन की छुट्टी पर घर आया था, वापस जाना था लेकिन जा ना सका। इधर बच्ची का बचपन खर्च होता रहे उधर मैं पूरी दुनिया कमा लूं, तब भी घाटे का सौदा है। मेरी दो टके की नौकरी, बचपन उसका लाखों का.."
उसने पूछा "क्या बीवी बच्चों को साथ नहीं ले जा सकते थे वहाँ?"
मैंने कहा "काफी टेक्निकल मामलों से गुजरकर एक लंबी अवधि के बाद रख सकते हैं, उस वक्त ये मुमकिन नहीं था.. मुझे दोनों में से एक को चुनना था, आलीशान रहन सहन के साथ नौकरी या परिवार.. मैंने परिवार चुना अपनी बेटी को बड़ा होते देखने के लिए। मैं कुवैत वापस गया था, लेकिन अपना इस्तीफा देकर लौट आया।"
लड़की ने कहा "वेरी इम्प्रेसिव"
मैं मुस्कुराकर खिड़की की तरफ देखने लगा
लड़की ने पूछा "अच्छा आपने तो लव मैरिज की थी न,फिर आप भागकर कहाँ गए?? कैसे रहे और कैसे गुजरा वो वक्त??
उसके हर सवाल और हर बात में मुझे महसूस हो रहा था कि ये लड़की लकड़पन के शिखर पर है, बिल्कुल नासमझ और मासूम।
मैंने उसे बताया कि हमने भागकर शादी नहीं की, और ये भी है कि उसके पापा ने मुझे पहली नजर में सख्ती से रिजेक्ट कर दिया था।"
उन्होंने आपको रिजेक्ट क्यों किया?? लड़की ने पूछा
मैंने कहा "रिजेक्ट करने की कुछ भी वजूहात हो सकती है, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा कुल कबीला घर परिवार नस्ल या नक्षत्र..इन्ही में से कोई काट होती है जिसके इस्तेमाल से जुड़ते हुए रिश्तों की डोर को काटा जा सकता है"
"बिल्कुल सही", लड़की ने सहमति दर्ज कराई और आगे पूछा "फिर आपने क्या किया?"
मैंने कहा "मैंने कुछ नहीं किया,उसके पिता ने रिजेक्ट कर दिया वहीं से मैंने अपने बारे में अलग से सोचना शुरू कर दिया था। खुशबू ने मुझे कहा कि भाग चलते हैं, मेरी वाइफ का नाम खुशबू है..मैंने दो टूक मना कर दिया। वो दो दिन तक लगातार जोर देती रही, कि भाग चलते हैं। मैं मना करता रहा.. मैंने उसे समझाया कि "भागने वाले जोड़े में लड़के की इज़्ज़त वकार पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता, जबकि लड़की का पूरा कुल धुल जाता है। फिल्मों में नायक ही होता है जो अपनी प्रेमिका को भगा ले जाए और वास्तविक जीवन में भी प्रेमिका को भगाकर शादी करने वाला नायक ही माना जाता है। लड़की भगाने वाले लड़के के दोस्तों में उस लड़के का दर्जा बुलन्द हो जाता है, भगाने वाला लड़का हीरो माना जाता है लेकिन इसके विपरीत जो लड़की प्रेमी संग भाग रही है वो कुल्टा कहलाती है, मुहल्ले के लड़के उसे चालू ठीकरा कहते हैं। बुराइयों के तमाम शब्दकोष लड़की के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। भागने वाली लड़की आगे चलकर 60 साल की वृद्धा भी हो जाएगी तब भी जवानी में किये उस कांड का कलंक उसके माथे पर से नहीं मिटता। मैं मानता हूँ कि लड़का लड़की को तौलने का ये दोहरा मापदंड गलत है, लेकिन है तो सही.. ये नजरिया गलत है मगर अस्तित्व में है, लोगों के अवचेतन में भागने वाली लड़की की भद्दी तस्वीर होती है। मैं तुम्हारी पीठ को छलनी करके सुखी नहीं रह सकता, तुम्हारे माँ बाप को दुखी करके अपनी ख्वाहिशें पूरी नहीं कर सकता।"
वो अपने नीचे का होंठ दांतो तले पीसने लगी, उसने पानी की बोतल का ढक्कन खोलकर एक घूंट अंदर सरकाया।
मैंने कहा अगर मैं उस दिन उसे भगा ले जाता तो उसकी माँ तो शायद कई दिनों तक पानी भी ना पीती। इसलिए मेरी हिम्मत ना हुई कि ऐसा काम करूँ.. मैं जिससे प्रेम करूँ उसके माँ बाप मेरे माँ बाप के समान ही है। चाहे शादी ना हो, तो ना हो।
कुछ पल के लिए वो सोच में पड़ गई , लेकिन मेरे बारे में और अधिक जानना चाहती थी, उसने पूछा "फिर आपकी शादी कैसे हुई???
मैंने बताया कि " खुशबू की सगाई कहीं और कर दी गई थी। धीरे धीरे सबकुछ नॉर्मल होने लगा था। खुशबू और उसके मंगेतर की बातें भी होने लगी थी फोन पर, लेकिन जैसे जैसे शादी नजदीक आने लगी, उन लोगों की डिमांड बढ़ने लगी"
डिमांड मतलब 'लड़की ने पूछा'
डिमांड का एक ही मतलब होता है, दहेज की डिमांड। परिवार में सबको सोने से बने तोहफे दो, दूल्हे को लग्जरी कार चाहिए, सास और ननद को नेकलेस दो वगैरह वगैरह, बोले हमारे यहाँ रीत है। लड़का भी इस रीत की अदायगी का पक्षधर था। वो सगाई मैंने येन केन प्रकरेण तुड़वा डाली.. फिर किसी तरह घरवालों को समझा बुझा कर मैं फ्रंट पर आ गया और हमारी शादी हो गई। ये सब किस्मत की बात थी..
लड़की बोली "चलो अच्छा हुआ आप मिल गए, वरना वो गलत लोगों में फंस जाती"
मैंने कहा "जरूरी नहीं कि माँ पापा का फैसला हमेशा सही हो, और ये भी जरूरी नहीं कि प्रेमी जोड़े की पसन्द सही हो.. दोनों में से कोई भी गलत या सही हो सकता है.. नुक्ते की बात यहाँ ये है कि कौन ज्यादा फरमाबरदार और वफादार है।"
लड़की ने फिर से पानी का घूंट लिया और मैंने भी.. लड़की ने तर्क दिया कि "हमारा फैसला गलत हो जाए तो कोई बात नहीं, उन्हें ग्लानि नहीं होनी चाहिए"
मैंने कहा "फैसला ऐसा हो जो दोनों का हो, औलाद और माता पिता दोनों की सहमति, वो सबसे सही है। बुरा मत मानना मैं कहना चाहूंगा कि तुम्हारा फैसला तुम दोनों का है, जिसमे तुम्हारे पेरेंट्स शामिल नहीं है, ना ही तुम्हे इश्क का असली मतलब पता है अभी"
उसने पूछा "क्या है इश्क़ का सही अर्थ?"
मैंने कहा "तुम इश्क में हो, तुम अपना सबकुछ छोड़कर चली आई ये इश्क़ है, तुमने अक़्ल का दखल नहीं दिया ये इश्क है, नफा नुकसान नहीं सोचा ये इश्क है...तुम्हारा दिमाग़ दुनियादारी के फितूर से बिल्कुल खाली था, उस खाली स्पेस में इश्क इनस्टॉल कर दिया गया। जिसने इश्क को इनस्टॉल किया वो इश्क में नहीं है.. यानि तुम जिसके साथ जा रही हो वो इश्क में नहीं, बल्कि होशियारी हीरोगिरी में है। जो इश्क में होता है वो इतनी प्लानिंग नहीं कर पाता है, तीन ट्रेनें नहीं बदलवा पाता है, उसका दिमाग इतना काम ही नहीं कर पाता.. कोई कहे मैं आशिक हुँ, और वो शातिर भी हो ये नामुमकिन है। मजनू इश्क में पागल हो गया था, लोग पत्थर मारते थे उसे, इश्क में उसकी पहचान तक मिट गई। उसे दुनिया मजून के नाम से जानती है जबकि उसका असली नाम कैस था जो नहीं इस्तेमाल किया जाता। वो शातिर होता तो कैस से मजनू ना बन पाता। फरहाद ने शीरीं के लिए पहाड़ों को खोदकर नहर निकाल डाली थी और उसी नहर में उसका लहू बहा था, वो इश्क़ था। इश्क़ में कोई फकीर हो गया, कोई जोगी हो गया, किसी मांझी ने पहाड़ तोड़कर रास्ता निकाल लिया..किसी ने अतिरिक्त दिमाग़ नहीं लगाया.. लालच हिर्स और हासिल करने का नाम इश्क़ नहीं है.. इश्क समर्पण करने को कहते हैं जिसमें इंसान सबसे पहले खुद का समर्पण करता है, जैसे तुमने किया, लेकिन तुम्हारा समर्पण हासिल करने के लिए था, यानि तुम्हारे इश्क में हिर्स की मिलावट हो गई । डॉ इकबाल का शेर है
"अक़्ल अय्यार है सौ भेष बदल लेती है
इश्क बेचारा ना मुल्ला है, ना ज़ाहिद, ना हकीम"
लकड़ी अचानक से खो सी गई.. उसकी खिलख़िलाहट और लपड़ापन एकदम से खमोशी में बदल गया.. मुझे लगा मैं कुछ ज्यादा बोल गया, फिर भी मैंने जारी रखा, मैंने कहा " प्यार तुम्हारे पापा तुमसे करते हैं, कुछ दिनों बाद उनका वजन आधा हो जाएगा, तुम्हारी माँ कई दिनों तक खाना नहीं खाएगी ना पानी पियेगी.. जबकि आपको अपने प्रेमी को आजमा कर देख लेना था, ना तो उसकी सेहत पर फर्क पड़ता, ना दिमाग़ पर, वो अक्लमंद है, अपने लिए अच्छा सोच लेता। आजकल गली मोहल्ले के हर तीसरे लौंडे लपाडे को जो इश्क हो जाता है, वो इश्क नहीं है, वो सिनेमा जैसा कुछ है। एक तरह की स्टंटबाजी, डेरिंग, अलग कुछ करने का फितूर..और कुछ नहीं।
लड़की का चेहरे का रंग बदल गया, ऐसा लग रहा था वो अब यहाँ नहीं है, उसका दिमाग़ किसी अतीत में टहलने निकल गया है। मैं अपने फोन को स्क्रॉल करने लगा.. लेकिन मन की इंद्री उसकी तरफ थी।
थोड़ी ही देर में उसका और मेरा स्टेशन आ गया.. बात कहाँ से निकली थी और कहाँ पहुँच गई.. उसके मोबाइल पर मैसेज टोन बजी, देखा, सिम एक्टिवेट हो चुकी थी.. उसने चुपचाप बैग में से आगे का टिकट निकाला और फाड़ दिया.. मुझे कहा एक कॉल करना है, मैंने मोबाइल दिया.. उसने नम्बर डायल करके कहा "सोरी पापा, और सिसक सिसक कर रोने लगी, सामने से पापा फोन पर बेटी को संभालने की कोशिश करने लगे.. उसने कहा पापा आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए मैं घर आ रही हूँ..दोनों तरफ से भावनाओ का सागर उमड़ पड़ा"
हम ट्रेन से उतरे, उसने फिर से पिन मांगी, मैंने पिन दी.. उसने मोबाइल से सिम निकालकर तोड़ दी और पिन मुझे वापस कर दी
Monday, September 30, 2019
अमेरिकन डायमंड
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी, पर अलका की आंखों से जाने क्यों नींद गायब थी. तरह-तरह के विचारों ने उसके मन को कितना अशांत कर दिया था. वो सोते हुए रोहित के बालों में हौले-हौले बड़े प्यार-से यूं उंगलियां फिराने लगी, जैसे उसे अपना प्यार सदियों बाद मिला हो. आज उसे पुराने दिन याद आने लगे.
अलका और सौम्या अच्छी सहेलियां थीं. नितांत विपरीत स्वभाव के बावजूद उनकी मित्रता सबके लिए आश्चर्य का विषय था. उन्मुक्त विचारों और खुले मन की सौम्या को न तो पार्टियों में जाने में कोई ऐतराज़ होता, न डेटिंग में कोई संकोच. तभी तो बिंदास और महफ़िलों की शान सौम्या के कितने ही लड़के दीवाने थे. वहीं फैशन व पार्टियों से दूर, अंतर्मुखी साहित्यानुरागी अलका क्लास में न दिख रही हो, तो लाइब्रेरी में ही मिलती. लड़कों से तो वो दूर ही रहती. “तू कहां इक्कीसवीं सदी में पैदा हो गई. तुझे तो घोड़ी पर सवार हो कोई राजकुमार ब्याहकर ले जाएगा.” कहकर हंसती हुई सौम्या जब छेड़ने लगती, तो बेचारी अलका शरमा ही जाती.
“और तुम? तुम कैसे करोगी शादी? राजुकमार आएगा या तुम ही भगा ले जाओगी किसी राजकुमार को?” एक दिन वो पूछ ही बैठी सौम्या से.
“न बाबा. अब तो ज़माना नहीं रहा कि स्टैच्यू की तरह फोटो खिंचाई, लड़की दिखाई और विदा हो गए किसी अजनबी के साथ. न कोई उमंग-तरंग, न रोमांस, न रोमांच.”
सौम्या दो पल रुककर बोली, “मैं नहीं चाहती कि मम्मी-पापा के ढूंढ़े किसी भी लड़के से शादी कर लूं. मैं तो ऐसे लड़के से शादी करूंगी, जो मुझे जाने-समझे.”
सौम्या के पिता फौजी अफसर होते हुए भी पार्टियों के कम शौक़ीन थे, तो उसकी मां को अत्याधुनिक जीवनशैली पसंद थी. उसके पिता सौम्या के बड़े होने की दुहाई देते हुए मां को समझाते, तो मां सौम्या को दक़ियानूसी और पुराने ख़्याल का बनाने का आरोप लगातीं. हारकर पिता ने इकलौती बेटी को हॉस्टल भेज दिया.
वहीं अलका को पारंपरिक विवाह से तो कोई समस्या थी नहीं, पर रोमांटिक टीवी सीरियल्स व फिल्में देखकर उसने कुछ सपने ज़रूर देखे थे. पति के साथ रोज़ घूमना-फिरना, कभी बाहर खाना, तो कभी मॉल में शॉपिंग, घरेलू काम भी मिल-जुलकर करना. उसके मन में पति की अलग-सी रोमांटिक छवि थी.
अलका के घरवालों को रोहित पसंद आ गया, वहीं वो भी रोहित और उसके घरवालों को पसंद आ गई. रोहित का छोटा-सा परिवार था, एक छोटी बहन और माता-पिता, जो भोपाल में रहते थे. दिल्ली में किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में काम करनेवाला रोहित अकेले ही रहता था. शादी के कुछ दिन बाद वो रोहित के साथ दिल्ली आ गई.
शुरुआती दिन तो अच्छे बीते, पर कुछ दिन बाद अलका को रोहित से शिकायतें होने लगीं कि वो बाकी लोगों की तरह क्यों नहीं है. कैसे-कैसे ख़्वाब थे उसके, फिल्म्स और टीवी सीरियल्स देखकर कैसी कल्पनाएं की थीं उसने, पर ख़्वाब ख़्वाब ही रह गए. वैसे रोहित में न कोई बुरी आदत थी, न कोई कमी, बस वो सरल-सा था, जो दिखावटी जीवन नहीं जी पाता था.
उस दिन कनाट प्लेस घूमते हुए अलका की निगाह एक स्मार्ट जोड़े पर पड़ी. वो तो लड़के को ही देखती रह गई. इतना स्मार्ट कि मॉडल्स तक फीके पड़ जाएं. उसकी निगाहें तो जैसे लड़के से हट ही नहीं रही थीं कि सहसा अपना नाम सुनकर चौंक उठी. “सौम्या” वो लगभग चीख पड़ी और लपककर दोनों ऐसे गले मिलीं जैसे बिछड़े हुए सदियां बीत गई हों.
“सौम्या! माई गॉड! कितना बदल गई है तू. मैं तो पहचान ही नहीं पाई तुझे.”
“मैं क्या बदल गई, सब इनका कमाल है. माय डार्लिंग हबी.” एक अदा से कहते हुए सौम्या ने उसी स्मार्ट लड़के की ओर इशारा किया, “हेलो, माइसेल्फ मोहित.”
अलका की तो जैसे सांस ही रुक-सी गई. आपस में औपचारिक परिचय के बाद सौम्या ने उन लोगों को अपने घर डिनर के लिए आमंत्रित किया. सौम्या के घर पहुंचकर अलका उसका महंगे व विदेशी चीज़ों से सजा शानदार घर देखती ही रह गई. दोनों सहेलियां बेडरूम में आ गईं. “सौम्या, जानती है आज तुझे देखकर मुझे कितनी ईर्ष्या हो रही है? तू तो पहले ही इतनी सुंदर और स्मार्ट थी, अब और कितना निखर गई है. कौन कहेगा कि तू शादीशुदा है और ये मोहित कहां से आ टपका? कहां गए तेरे वो सब दीवाने?” अलका एक सांस में बोलती गई.
“अलका, याद है अपने कॉलेज में मनीषा थी न, उसी का कज़िन है मोहित. हम एक पार्टी में मिले. फिर दो-चार मुलाक़ातों में हम समझ गए कि वी आर मेड फॉर ईच अदर. जिसे मैं अपने सपनों में ढूंढ़ती थी, वो मोहित ही था. यहीं फैशन फोटोग्राफर है. उसने तो मेरा प्रोफाइल ही बदल दिया. अपनी तो ऐश हो रही है और तू सुना.”
अलका चुप. उसे लगा उसके पास सुनाने के लिए जैसे कुछ है ही नहीं. किसी तरह मन को नियंत्रित कर उसने कह दिया, “ठीक ही है. अपनी ज़िंदगी भी कट ही रही है.”
डिनर में तो जैसे मोहित का सम्मोहन पूरा ही हो गया. बात करने का ऐसा तरीक़ा कि सामनेवाला प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता. आवाज़ में एक कशिश और मुस्कुराहट. तौबा-तौबा. उस पर गहरी आंखों का जादू. ऐसा लगता कि दिल के अंदर तक सब पढ़ लेंगी.
अलका ने तो दुबारा मोहित की आंखों से आंखें मिलाई ही नहीं. अकेले में उसने सौम्या से कह ही दिया, “तू सचमुच बड़ी क़िस्मतवाली है. बस, ये समझ ले तेरे हाथ असली हीरा लगा है और मैं? मुझे मिला अमेरिकन डायमंड. जो न सोसाइटी में पहना जा सकता है, न ही उसकी कोई क़ीमत ही होती है. हां, अपने पास भी हीरा होने की झूठी तसल्ली की जा सकती है.”
उसके बाद से जाने क्यों अलका से अनचाहे रोहित की उपेक्षा-सी होने लगी. ऐसा नहीं था कि वो जान-बूझकर ऐसा करती. उसका अवचेतन मन जाने कैसे-कैसे काम कराने लगा. कभी शाम को रोहित के आने पर उसका सिर ऐसा दर्द कर रहा होता कि वो चाय तक बनाने की स्थिति में न होती, तो कभी रोहित की पसंद-नापसंद भूलकर भोजन बना बैठती. लेकिन रोहित कभी नाराज़ न होता, बल्कि परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठा ही लेता.
सौम्या के अलावा यहां उसका था ही कौन, इसलिए वो जब-तब उससे मिलने अकेले ही चली जाती. आज अलका ने पाया कि सौम्या कुछ गुमसुम-सी थी. “क्या हुआ सौम्या? सब ठीक तो है?”
“हां ठीक है.” सौम्या ने सहज दिखने का प्रयास तो किया, पर असफल रही.
“नहीं सौम्या, तू कुछ तो छुपा रही है. तेरी आंखें कह रही हैं कि कोई न कोई बात ज़रूर है.”
“क्या बताऊं अलका? मैं तो जैसे सब हार गई. कुछ दिनों से मुझे मोहित के रंग-ढंग बदले नज़र आ रहे थे, पर मैंने सोचा मेरी नज़र का धोखा होगा, लेकिन धोखा तो कुछ और ही निकला. उसके कई औरतों से संबंध हैं और उस पर तारीफ़ ये कि पूछने पर जनाब ने बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया जैसे कुछ हुआ ही न हो. जब मैंने ज़्यादा ऐतराज़ जताया, तो कहने लगे कि मैंने तुम्हें मॉडर्न समझा था, पर तुम्हारी भी वही आउटडेटेड सोच निकली. शादी का मतलब ग़ुलामी नहीं होता कि हर बात के लिए परमिशन लेनी पड़े. उसके अनुसार पति-पत्नी के रिश्ते में स्पेस तो होना ही चाहिए और जब तक हम दोनों एक-दूसरे की पर्सनल और प्राइवेट लाइफ में दख़ल नहीं देंगे, हमारा रिश्ता बरक़रार रहेगा. वरना…” कहते-कहते उसकी आवाज़ भर्रा गई और आंखें भीग गईं.
अलका तो स्तब्ध रह गई. झूठी तसल्ली देने में भी ख़ुद को असफल समझकर, वो बिल्कुल चुप-सी रही. कुछ ही देर में सौम्या संभल गई और बोली, “तूने एक दिन अमेरिकन डायमंड और असली हीरे की बात की थी. याद है न? तू बहुत भोली है अलका, पर मैंने दुनिया देखी है. अब मैं जान सकी कि हक़ीक़त में वो ही अपना होता है, जो तुमको अपना समझे, तुम्हारी क़द्र करे. कभी मेरे कितने बॉयफ्रेंड्स थे और दूसरी लड़कियों से उनके रिलेशंस से मुझे कुछ भी फील नहीं होता था, लेकिन आज? आज मोहित के संबंधों के बारे में पता चलते ही मुझे ज़िंदगी ही व्यर्थ-सी लगने लगी.
सच कहूं, तो मैं अब समझ पाई कि विवाह के बाद पति-पत्नी का एक-दूसरे पर कितना अधिकार हो जाता है और अंतर्मन कितना पज़ेसिव, कितना ईर्ष्यालु हो उठता है.”
अलका तो बस सौम्या का मुंह ही देखती रह गई.
“अलका, ये रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं. जब तक हम इनमें बंधते नहीं, तब तक इनके बारे में हमारी समझ अधूरी ही रहती है. इन पुरुषों की फ़ितरत हम स्त्रियों से एकदम अलग होती है. पत्नी के अलावा अन्यत्र संबंध का तो इनको बहाना चाहिए. शायद इससे इन्हें आत्मिक संतुष्टि मिलती है या इनका अहं, इनका पुरुषत्व गर्व अनुभव करता है. रही बात हीरे की, तो असली हीरा वो ही होता है, जो अपनी पत्नी की क़द्र कर सके, उसे अपना और अपने को उसका समझ सके, जिसके लिए ज़िंदगी ख़ुद से शुरू होकर पत्नी तक हो, बस.
मैं लड़कों के बारे में तुझसे अधिक जानती हूं, इसलिए दावे के साथ कह सकती हूं कि रोहित जैसे लोग कम ही होते हैं. जैसा भी हो, तेरा रोहित तेरा तो है. बस, थोड़ा उसे समझकर तो देख. रोहित के सरल व्यक्तित्व की सादगी पर कुर्बान होने का दिल करता है.”
अलका तो हैरान रह गई. उसे यूं लगा कि वो आज तक रोहित की क़द्र ही नहीं कर सकी और उसकी उपेक्षा के लिए उसका मन अपने को ही दोषी मान रहा था. उसकी आंखों के सामने अपना और रोहित का व्यवहार घूमने लगा. क्या कमी थी उसके रोहित में? बस, वो दिखावटी जीवन ही तो नहीं जी पाता था? अपराधबोध का भाव उसे अपने आपसे आंख चुराने पर मजबूर कर रहा था और वो तुरंत घर लौटने को बेचैन हो उठी थी.
रात में जब अकेलापन मिला, तब उसका मन न जाने कहां-कहां भटकने लगा था. अब तक की सारी बातें सोचते-सोचते और रोहित के बालों में उंगलियां फिराते-फिराते कब उसकी आंखों से आंसू बहकर उसके अंतर्मन को धोकर पवित्र कर गए और नींद भी आ गई, उसे पता ही नहीं चला. लेकिन सोते में भी उसका अंतर्मन सोच रहा था कि इस अंधेरी रात के बाद एक नया सवेरा होनेवाला है.
अलका और सौम्या अच्छी सहेलियां थीं. नितांत विपरीत स्वभाव के बावजूद उनकी मित्रता सबके लिए आश्चर्य का विषय था. उन्मुक्त विचारों और खुले मन की सौम्या को न तो पार्टियों में जाने में कोई ऐतराज़ होता, न डेटिंग में कोई संकोच. तभी तो बिंदास और महफ़िलों की शान सौम्या के कितने ही लड़के दीवाने थे. वहीं फैशन व पार्टियों से दूर, अंतर्मुखी साहित्यानुरागी अलका क्लास में न दिख रही हो, तो लाइब्रेरी में ही मिलती. लड़कों से तो वो दूर ही रहती. “तू कहां इक्कीसवीं सदी में पैदा हो गई. तुझे तो घोड़ी पर सवार हो कोई राजकुमार ब्याहकर ले जाएगा.” कहकर हंसती हुई सौम्या जब छेड़ने लगती, तो बेचारी अलका शरमा ही जाती.
“और तुम? तुम कैसे करोगी शादी? राजुकमार आएगा या तुम ही भगा ले जाओगी किसी राजकुमार को?” एक दिन वो पूछ ही बैठी सौम्या से.
“न बाबा. अब तो ज़माना नहीं रहा कि स्टैच्यू की तरह फोटो खिंचाई, लड़की दिखाई और विदा हो गए किसी अजनबी के साथ. न कोई उमंग-तरंग, न रोमांस, न रोमांच.”
सौम्या दो पल रुककर बोली, “मैं नहीं चाहती कि मम्मी-पापा के ढूंढ़े किसी भी लड़के से शादी कर लूं. मैं तो ऐसे लड़के से शादी करूंगी, जो मुझे जाने-समझे.”
सौम्या के पिता फौजी अफसर होते हुए भी पार्टियों के कम शौक़ीन थे, तो उसकी मां को अत्याधुनिक जीवनशैली पसंद थी. उसके पिता सौम्या के बड़े होने की दुहाई देते हुए मां को समझाते, तो मां सौम्या को दक़ियानूसी और पुराने ख़्याल का बनाने का आरोप लगातीं. हारकर पिता ने इकलौती बेटी को हॉस्टल भेज दिया.
वहीं अलका को पारंपरिक विवाह से तो कोई समस्या थी नहीं, पर रोमांटिक टीवी सीरियल्स व फिल्में देखकर उसने कुछ सपने ज़रूर देखे थे. पति के साथ रोज़ घूमना-फिरना, कभी बाहर खाना, तो कभी मॉल में शॉपिंग, घरेलू काम भी मिल-जुलकर करना. उसके मन में पति की अलग-सी रोमांटिक छवि थी.
अलका के घरवालों को रोहित पसंद आ गया, वहीं वो भी रोहित और उसके घरवालों को पसंद आ गई. रोहित का छोटा-सा परिवार था, एक छोटी बहन और माता-पिता, जो भोपाल में रहते थे. दिल्ली में किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में काम करनेवाला रोहित अकेले ही रहता था. शादी के कुछ दिन बाद वो रोहित के साथ दिल्ली आ गई.
शुरुआती दिन तो अच्छे बीते, पर कुछ दिन बाद अलका को रोहित से शिकायतें होने लगीं कि वो बाकी लोगों की तरह क्यों नहीं है. कैसे-कैसे ख़्वाब थे उसके, फिल्म्स और टीवी सीरियल्स देखकर कैसी कल्पनाएं की थीं उसने, पर ख़्वाब ख़्वाब ही रह गए. वैसे रोहित में न कोई बुरी आदत थी, न कोई कमी, बस वो सरल-सा था, जो दिखावटी जीवन नहीं जी पाता था.
उस दिन कनाट प्लेस घूमते हुए अलका की निगाह एक स्मार्ट जोड़े पर पड़ी. वो तो लड़के को ही देखती रह गई. इतना स्मार्ट कि मॉडल्स तक फीके पड़ जाएं. उसकी निगाहें तो जैसे लड़के से हट ही नहीं रही थीं कि सहसा अपना नाम सुनकर चौंक उठी. “सौम्या” वो लगभग चीख पड़ी और लपककर दोनों ऐसे गले मिलीं जैसे बिछड़े हुए सदियां बीत गई हों.
“सौम्या! माई गॉड! कितना बदल गई है तू. मैं तो पहचान ही नहीं पाई तुझे.”
“मैं क्या बदल गई, सब इनका कमाल है. माय डार्लिंग हबी.” एक अदा से कहते हुए सौम्या ने उसी स्मार्ट लड़के की ओर इशारा किया, “हेलो, माइसेल्फ मोहित.”
अलका की तो जैसे सांस ही रुक-सी गई. आपस में औपचारिक परिचय के बाद सौम्या ने उन लोगों को अपने घर डिनर के लिए आमंत्रित किया. सौम्या के घर पहुंचकर अलका उसका महंगे व विदेशी चीज़ों से सजा शानदार घर देखती ही रह गई. दोनों सहेलियां बेडरूम में आ गईं. “सौम्या, जानती है आज तुझे देखकर मुझे कितनी ईर्ष्या हो रही है? तू तो पहले ही इतनी सुंदर और स्मार्ट थी, अब और कितना निखर गई है. कौन कहेगा कि तू शादीशुदा है और ये मोहित कहां से आ टपका? कहां गए तेरे वो सब दीवाने?” अलका एक सांस में बोलती गई.
“अलका, याद है अपने कॉलेज में मनीषा थी न, उसी का कज़िन है मोहित. हम एक पार्टी में मिले. फिर दो-चार मुलाक़ातों में हम समझ गए कि वी आर मेड फॉर ईच अदर. जिसे मैं अपने सपनों में ढूंढ़ती थी, वो मोहित ही था. यहीं फैशन फोटोग्राफर है. उसने तो मेरा प्रोफाइल ही बदल दिया. अपनी तो ऐश हो रही है और तू सुना.”
अलका चुप. उसे लगा उसके पास सुनाने के लिए जैसे कुछ है ही नहीं. किसी तरह मन को नियंत्रित कर उसने कह दिया, “ठीक ही है. अपनी ज़िंदगी भी कट ही रही है.”
डिनर में तो जैसे मोहित का सम्मोहन पूरा ही हो गया. बात करने का ऐसा तरीक़ा कि सामनेवाला प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता. आवाज़ में एक कशिश और मुस्कुराहट. तौबा-तौबा. उस पर गहरी आंखों का जादू. ऐसा लगता कि दिल के अंदर तक सब पढ़ लेंगी.
अलका ने तो दुबारा मोहित की आंखों से आंखें मिलाई ही नहीं. अकेले में उसने सौम्या से कह ही दिया, “तू सचमुच बड़ी क़िस्मतवाली है. बस, ये समझ ले तेरे हाथ असली हीरा लगा है और मैं? मुझे मिला अमेरिकन डायमंड. जो न सोसाइटी में पहना जा सकता है, न ही उसकी कोई क़ीमत ही होती है. हां, अपने पास भी हीरा होने की झूठी तसल्ली की जा सकती है.”
उसके बाद से जाने क्यों अलका से अनचाहे रोहित की उपेक्षा-सी होने लगी. ऐसा नहीं था कि वो जान-बूझकर ऐसा करती. उसका अवचेतन मन जाने कैसे-कैसे काम कराने लगा. कभी शाम को रोहित के आने पर उसका सिर ऐसा दर्द कर रहा होता कि वो चाय तक बनाने की स्थिति में न होती, तो कभी रोहित की पसंद-नापसंद भूलकर भोजन बना बैठती. लेकिन रोहित कभी नाराज़ न होता, बल्कि परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठा ही लेता.
सौम्या के अलावा यहां उसका था ही कौन, इसलिए वो जब-तब उससे मिलने अकेले ही चली जाती. आज अलका ने पाया कि सौम्या कुछ गुमसुम-सी थी. “क्या हुआ सौम्या? सब ठीक तो है?”
“हां ठीक है.” सौम्या ने सहज दिखने का प्रयास तो किया, पर असफल रही.
“नहीं सौम्या, तू कुछ तो छुपा रही है. तेरी आंखें कह रही हैं कि कोई न कोई बात ज़रूर है.”
“क्या बताऊं अलका? मैं तो जैसे सब हार गई. कुछ दिनों से मुझे मोहित के रंग-ढंग बदले नज़र आ रहे थे, पर मैंने सोचा मेरी नज़र का धोखा होगा, लेकिन धोखा तो कुछ और ही निकला. उसके कई औरतों से संबंध हैं और उस पर तारीफ़ ये कि पूछने पर जनाब ने बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया जैसे कुछ हुआ ही न हो. जब मैंने ज़्यादा ऐतराज़ जताया, तो कहने लगे कि मैंने तुम्हें मॉडर्न समझा था, पर तुम्हारी भी वही आउटडेटेड सोच निकली. शादी का मतलब ग़ुलामी नहीं होता कि हर बात के लिए परमिशन लेनी पड़े. उसके अनुसार पति-पत्नी के रिश्ते में स्पेस तो होना ही चाहिए और जब तक हम दोनों एक-दूसरे की पर्सनल और प्राइवेट लाइफ में दख़ल नहीं देंगे, हमारा रिश्ता बरक़रार रहेगा. वरना…” कहते-कहते उसकी आवाज़ भर्रा गई और आंखें भीग गईं.
अलका तो स्तब्ध रह गई. झूठी तसल्ली देने में भी ख़ुद को असफल समझकर, वो बिल्कुल चुप-सी रही. कुछ ही देर में सौम्या संभल गई और बोली, “तूने एक दिन अमेरिकन डायमंड और असली हीरे की बात की थी. याद है न? तू बहुत भोली है अलका, पर मैंने दुनिया देखी है. अब मैं जान सकी कि हक़ीक़त में वो ही अपना होता है, जो तुमको अपना समझे, तुम्हारी क़द्र करे. कभी मेरे कितने बॉयफ्रेंड्स थे और दूसरी लड़कियों से उनके रिलेशंस से मुझे कुछ भी फील नहीं होता था, लेकिन आज? आज मोहित के संबंधों के बारे में पता चलते ही मुझे ज़िंदगी ही व्यर्थ-सी लगने लगी.
सच कहूं, तो मैं अब समझ पाई कि विवाह के बाद पति-पत्नी का एक-दूसरे पर कितना अधिकार हो जाता है और अंतर्मन कितना पज़ेसिव, कितना ईर्ष्यालु हो उठता है.”
अलका तो बस सौम्या का मुंह ही देखती रह गई.
“अलका, ये रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं. जब तक हम इनमें बंधते नहीं, तब तक इनके बारे में हमारी समझ अधूरी ही रहती है. इन पुरुषों की फ़ितरत हम स्त्रियों से एकदम अलग होती है. पत्नी के अलावा अन्यत्र संबंध का तो इनको बहाना चाहिए. शायद इससे इन्हें आत्मिक संतुष्टि मिलती है या इनका अहं, इनका पुरुषत्व गर्व अनुभव करता है. रही बात हीरे की, तो असली हीरा वो ही होता है, जो अपनी पत्नी की क़द्र कर सके, उसे अपना और अपने को उसका समझ सके, जिसके लिए ज़िंदगी ख़ुद से शुरू होकर पत्नी तक हो, बस.
मैं लड़कों के बारे में तुझसे अधिक जानती हूं, इसलिए दावे के साथ कह सकती हूं कि रोहित जैसे लोग कम ही होते हैं. जैसा भी हो, तेरा रोहित तेरा तो है. बस, थोड़ा उसे समझकर तो देख. रोहित के सरल व्यक्तित्व की सादगी पर कुर्बान होने का दिल करता है.”
अलका तो हैरान रह गई. उसे यूं लगा कि वो आज तक रोहित की क़द्र ही नहीं कर सकी और उसकी उपेक्षा के लिए उसका मन अपने को ही दोषी मान रहा था. उसकी आंखों के सामने अपना और रोहित का व्यवहार घूमने लगा. क्या कमी थी उसके रोहित में? बस, वो दिखावटी जीवन ही तो नहीं जी पाता था? अपराधबोध का भाव उसे अपने आपसे आंख चुराने पर मजबूर कर रहा था और वो तुरंत घर लौटने को बेचैन हो उठी थी.
रात में जब अकेलापन मिला, तब उसका मन न जाने कहां-कहां भटकने लगा था. अब तक की सारी बातें सोचते-सोचते और रोहित के बालों में उंगलियां फिराते-फिराते कब उसकी आंखों से आंसू बहकर उसके अंतर्मन को धोकर पवित्र कर गए और नींद भी आ गई, उसे पता ही नहीं चला. लेकिन सोते में भी उसका अंतर्मन सोच रहा था कि इस अंधेरी रात के बाद एक नया सवेरा होनेवाला है.
Sunday, September 29, 2019
तलाक़ दूँगी , लेकिन मेरी भी एक शर्त है
जब मैं रात को घर पंहुचा तो मेरी पत्नी ने खाना लगाया। मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लिया और कहा मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात कहना है। वो शांत बैठकर खाना खा रही थी। उसकी आखों में कुछ दर्द सा साफ़ नज़र आ रहा था। अचानक मुझे नहीं पता कैसे कहूं मगर मुझे उसे बताना ही था। मैंने बड़ी शांति से कहा - मुझे तलाक चाहिए। लगा जैसे उसे मेरे शब्दों से कुछ फर्क नहीं पड़ा बल्कि उसने मुझसे पूछा क्यों तलाक चाहिए ?
मैंने उसके सवाल को अनसुना किया तो उसे गुस्सा आ गया। उसने चम्मच उठाकर फेंक दिया और जोर से चिल्लाई - तुम इन्सान नहीं हो ! उस रात, हमने एक दुसरे से बात नहीं की, वो रो रही थी !
मुझे पता था कि वो जानना चाहती थी कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो हमारा रिश्ता टूटने की कगार पर आ गया। पर मेरे लिए उसके सवालों का जवाब दे पाना नामुमकिन था। मैं अब किसी और से (प्रिया नाम था उसका) प्यार करने लगा हूँ। अब मुझे उससे प्यार नहीं रहा। मैंने उसे उसके बरसो के प्यार की सजा दी थी।
भरे मन से मैंने तलाक के पेपर तैयार किये। उसमें लिखा था कि वह पूरा घर, कार और कंपनी की 30% शेयर ले सकती है इस तलाक के बदले में। लेकिन उसने उन पेपर्स को देखा और उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
वो औरत जिसने मेरे साथ जीवन के दस साल बिताये थे वो आज मेरे लिए अनजान हो चुकी थी। मुझे इन दस सालों का जो उसने मेरे लिए बर्बाद किये। मगर मैं क्या करूँ जो हो चूका उसे मैं बदल नहीं सकता था। क्योंकि मैं किसी और से अपनी पत्नी से भी ज्यादा प्यार करने लगा था।
आख़िरकार उसके सब्र का बांध टूट गया और वो फुट-फुट कर मेरे सामने रोने लगी। मेरे लिए उसका रोना एक तरह से उसकी रिहाई की तरह था। तलाक की ये बात जो कई दिनों से मुझे परेशान कर रही थी अब बिलकुल साफ़ हो चुकी थी !
अगले दिन मैं घर काफी लेट आया। मैंने देखा कि वो टेबल पर बैठ कर कुछ लिख रही थी। मैंने शाम का खाना नहीं खाया था लेकिन फिर भी में सीधे ऊपर जाकर अपने कमरे में सो गया। क्योंकि पूरा दिन प्रिया के साथ रहने और कई जगह घूमने के बाद मैं थक गया था।
वो शायद रात को उसी टेबल पर लिखते-लिखते सो गई थी। सुबह उसने तलाक देने की शर्ते बताई। वो मुझसे कुछ भी लेना नहीं चाहती थी। उसे सिर्फ तलाक से पहले एक महीने का समय चाहिए था। उसने आग्रह किया कि इस एक महीने में हम दोनों वही पुराना वाला जीवन जीयें जितना संभव हो सके। क्योंकि आने वाले महीने में हमारे बेटे की परीक्षा है। वह नहीं चाहती थी कि हमारे टूटे रिश्ते का प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़े।
मुझे भी यह ठीक लगा। मगर वो कुछ और भी चाहती थी जेसे शादी के दिन मैं उसे उठा कर अपने शयनकक्ष तक ले गया था। उसी तरह हर रोज एक महीने तक मैं उसे शयनकक्ष से उठा कर मुख्य द्वार तक ले जाऊं। मुझे लगा यह पागलपन है मगर इन आखरी दिनों को थोडा अच्छा बनाने के लिए मैंने उसकी यह शर्त स्वीकार कर ली।
मेने प्रिया को अपनी पत्नी की सभी शर्ते बताई। वो हँसने लगी। उसे लगा मेरी पत्नी कितने भी तरीके अपना ले तलाक होना तो तय है।
मेरी पत्नी और मैं किसी से भी इस दौरान नहीं मिले थे। लेकिन उस दिन जब मैं उसे पहली बार उठाकर गेट तक लेकर गया तो हम दोनों काफी अजीब महसूस रहे थे। पीछे से हमारा बेटा भी खिलखिलाकर खुश हो रहा था।
अगले दिन यह काम थोडा सामान्य और आसान हो गया। वह मेरे सीने से लगी थी और मैं उसकी खुशबू महसूस कर रहा था। ऐसा लगा जेसे कई दिनों बाद मुझे ये खुशबू मिल रही थी या फिर कई दिनों से मैंने उसके होने का महसूस नहीं किया था। पहले जितनी उसमें वो कसाव नहीं था और चहरे पर कुछ हलकी झुर्रियाँ नजर आ रही थी। और बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। ये वही औरत थी जिसने अपने जीवन के 10 साल मुझे समर्पित किये थे।
चोथे दिन जब मैंने उसे उठाया तो वो पुरानी रोमाँच लौटने लगी थी। पांचवे और छठे दिन वो पुराना प्यार फिर जागने लगा। मैंने प्रिया को इस बारे में कुछ नहीं बताया था। अब उसे उठाना और आसन हो गया था। शायद हर रोज यह सब करने का मैं आदि हो गया था।
एक दिन वह अपनी पसंद की साड़ी निकाल रही थी। लेकिन कुछ खास नहीं ढूंढ पाई। उसने साँस भरते हुए कहा कि उसके सारे कपडे बड़े पड़ने लगे हैं। तब मुझे पता चला कि वह काफी दुबली हो गयी है और इसीलिए मैं उसे आसानी से उठा पा रहा था।
मेरे दिल को एक झटका सा लगा। उसने अपने दिल में काफी सारा दर्द छुपा रखा था पता नहीं कैसे मैं आगे बढ़ा और उसके सिर को छूकर देखा। अचानक हमारा बेटा आया और बोला कि पापा ये तो मम्मा को उठाकर बहार ले जाने का समय हो गया है। उसके लिए अपने पापा द्वारा मम्मा को इस तरह उठाकर ले जाते हुए देखना जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया था।
मेरी बीवी ने हमारे बच्चे को बुलाया और जोर से उसे गले लगा लिया। मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। मुझे लगा कहीं मैं अपना निर्णय न बदल लूँ। मैंने अपनी पत्नी को रोज की तरह उठाया और बेडरूम से सिटींग रूम होते हुए हॉल तक लाया। उसने प्यार से अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के आस-पास रख दिए। मैंने उसे जोर से पकड़ रखा था बिलकुल हमारे सुहागरात की तरह।
मगर उसका इतना कम वजन मुझे परेशान कर रहा था। महीने के आखरी दिन जब मैंने उसे उठाया तो मेरे लिए एक कदम भी चल पाना मुश्किल हो रहा था। हमारा बेटा स्कूल जा चूका था। मैं अपनी कार से ऑफिस गया और कार से कूद कर बाहर आ गया बिना कार को लॉक किये। मुझे डर था कि अब एक पल की भी देरी मेरा इरादा बदल देगी। मैं उपर गया। प्रिया ने दरवाज़ा खोला और मेने उससे कहा - सॉरी प्रिया ! अब मैं अपनी पत्नी से तलाक नहीं लेना चाहता।
उसने मुझे देखा और मेरे सिर पर हाथ फेरकर कहा - तुम्हें बुखार तो नहीं है ? मैंने उसका हाथ हटाया और कहा - सॉरी प्रिया ! अब मुझे अपनी पत्नी से तलाक नहीं चाहिए।
हमारी शादीसुदा जिंदगी शायद हम दोनों के ध्यान न देने की वजह से बोरिंग हो गयी थी। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम एक-दुसरे से प्यार नहीं करते। अब मुझे एहसास हुआ है कि जिस दिन मैं उसे शादी करके अपने घर लाया था उस दिन से जीवन के आखरी दिन तक मुझे उसका साथ निभाना है।
प्रिया के होश उड़ गए। उसने मुझे एक जोरदार चाँटा जड़ दिया मेरे मुह पर। वह रोने लगी और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा और आकर अपने कार में बेठ गया।
आगे एक फुल वाले की दुकान पर रुका और अपनी प्यारी पत्नी के लिए एक सुंदर सा गुलदस्ता लिया। दूकानदार ने पूछा कि इस पर क्या लिखना है ? मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि "मैं तुम्हें जीवन के आखरी दिन तक यूँ ही उठाता रहूँगा मेरी अर्धांगिनी। "
उस शाम जब मैं घर आया हाथों में गुलदस्ता लिए। मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी। मैं उपर अपने कमरे की तरफ भाग कर गया। लेकिन तब तक वह मुझे छोड़ कर इस दुनिया से जा चुकी थी हमेशा के लिए। वो कई महीनो से कैंसर से लड़ रही थी लेकिन मैं प्रिया के साथ इतना खोया हुआ था कि कभी ध्यान ही नहीं रहा।
उसे पता था वह जल्दी ही मुझे छोड़ कर जाने वाली है इसलिए वह मुझे और मेरे बेटे के रिश्ते को टूटने से बचाना चाहती थी। मैं नीच उससे तलाक लेना चाहता था लेकिन फिर भी उसने मुझे अपने बच्चे की नज़रों में एक प्यारा पति और पिता बना दिया था।
जीवन की छोटी-छोटी बातें रिश्तों में बहुत महत्त्व रखती है। बड़ा घर, बड़ी कार और बैंक बैलेंस ये खुशियों का हिस्सा जरुर बन सकते हैं मगर अपनों के बिना इनकी कोई कीमत नहीं।
मैंने उसके सवाल को अनसुना किया तो उसे गुस्सा आ गया। उसने चम्मच उठाकर फेंक दिया और जोर से चिल्लाई - तुम इन्सान नहीं हो ! उस रात, हमने एक दुसरे से बात नहीं की, वो रो रही थी !
मुझे पता था कि वो जानना चाहती थी कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो हमारा रिश्ता टूटने की कगार पर आ गया। पर मेरे लिए उसके सवालों का जवाब दे पाना नामुमकिन था। मैं अब किसी और से (प्रिया नाम था उसका) प्यार करने लगा हूँ। अब मुझे उससे प्यार नहीं रहा। मैंने उसे उसके बरसो के प्यार की सजा दी थी।
भरे मन से मैंने तलाक के पेपर तैयार किये। उसमें लिखा था कि वह पूरा घर, कार और कंपनी की 30% शेयर ले सकती है इस तलाक के बदले में। लेकिन उसने उन पेपर्स को देखा और उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
वो औरत जिसने मेरे साथ जीवन के दस साल बिताये थे वो आज मेरे लिए अनजान हो चुकी थी। मुझे इन दस सालों का जो उसने मेरे लिए बर्बाद किये। मगर मैं क्या करूँ जो हो चूका उसे मैं बदल नहीं सकता था। क्योंकि मैं किसी और से अपनी पत्नी से भी ज्यादा प्यार करने लगा था।
आख़िरकार उसके सब्र का बांध टूट गया और वो फुट-फुट कर मेरे सामने रोने लगी। मेरे लिए उसका रोना एक तरह से उसकी रिहाई की तरह था। तलाक की ये बात जो कई दिनों से मुझे परेशान कर रही थी अब बिलकुल साफ़ हो चुकी थी !
अगले दिन मैं घर काफी लेट आया। मैंने देखा कि वो टेबल पर बैठ कर कुछ लिख रही थी। मैंने शाम का खाना नहीं खाया था लेकिन फिर भी में सीधे ऊपर जाकर अपने कमरे में सो गया। क्योंकि पूरा दिन प्रिया के साथ रहने और कई जगह घूमने के बाद मैं थक गया था।
वो शायद रात को उसी टेबल पर लिखते-लिखते सो गई थी। सुबह उसने तलाक देने की शर्ते बताई। वो मुझसे कुछ भी लेना नहीं चाहती थी। उसे सिर्फ तलाक से पहले एक महीने का समय चाहिए था। उसने आग्रह किया कि इस एक महीने में हम दोनों वही पुराना वाला जीवन जीयें जितना संभव हो सके। क्योंकि आने वाले महीने में हमारे बेटे की परीक्षा है। वह नहीं चाहती थी कि हमारे टूटे रिश्ते का प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़े।
मुझे भी यह ठीक लगा। मगर वो कुछ और भी चाहती थी जेसे शादी के दिन मैं उसे उठा कर अपने शयनकक्ष तक ले गया था। उसी तरह हर रोज एक महीने तक मैं उसे शयनकक्ष से उठा कर मुख्य द्वार तक ले जाऊं। मुझे लगा यह पागलपन है मगर इन आखरी दिनों को थोडा अच्छा बनाने के लिए मैंने उसकी यह शर्त स्वीकार कर ली।
मेने प्रिया को अपनी पत्नी की सभी शर्ते बताई। वो हँसने लगी। उसे लगा मेरी पत्नी कितने भी तरीके अपना ले तलाक होना तो तय है।
मेरी पत्नी और मैं किसी से भी इस दौरान नहीं मिले थे। लेकिन उस दिन जब मैं उसे पहली बार उठाकर गेट तक लेकर गया तो हम दोनों काफी अजीब महसूस रहे थे। पीछे से हमारा बेटा भी खिलखिलाकर खुश हो रहा था।
अगले दिन यह काम थोडा सामान्य और आसान हो गया। वह मेरे सीने से लगी थी और मैं उसकी खुशबू महसूस कर रहा था। ऐसा लगा जेसे कई दिनों बाद मुझे ये खुशबू मिल रही थी या फिर कई दिनों से मैंने उसके होने का महसूस नहीं किया था। पहले जितनी उसमें वो कसाव नहीं था और चहरे पर कुछ हलकी झुर्रियाँ नजर आ रही थी। और बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। ये वही औरत थी जिसने अपने जीवन के 10 साल मुझे समर्पित किये थे।
चोथे दिन जब मैंने उसे उठाया तो वो पुरानी रोमाँच लौटने लगी थी। पांचवे और छठे दिन वो पुराना प्यार फिर जागने लगा। मैंने प्रिया को इस बारे में कुछ नहीं बताया था। अब उसे उठाना और आसन हो गया था। शायद हर रोज यह सब करने का मैं आदि हो गया था।
एक दिन वह अपनी पसंद की साड़ी निकाल रही थी। लेकिन कुछ खास नहीं ढूंढ पाई। उसने साँस भरते हुए कहा कि उसके सारे कपडे बड़े पड़ने लगे हैं। तब मुझे पता चला कि वह काफी दुबली हो गयी है और इसीलिए मैं उसे आसानी से उठा पा रहा था।
मेरे दिल को एक झटका सा लगा। उसने अपने दिल में काफी सारा दर्द छुपा रखा था पता नहीं कैसे मैं आगे बढ़ा और उसके सिर को छूकर देखा। अचानक हमारा बेटा आया और बोला कि पापा ये तो मम्मा को उठाकर बहार ले जाने का समय हो गया है। उसके लिए अपने पापा द्वारा मम्मा को इस तरह उठाकर ले जाते हुए देखना जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया था।
मेरी बीवी ने हमारे बच्चे को बुलाया और जोर से उसे गले लगा लिया। मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। मुझे लगा कहीं मैं अपना निर्णय न बदल लूँ। मैंने अपनी पत्नी को रोज की तरह उठाया और बेडरूम से सिटींग रूम होते हुए हॉल तक लाया। उसने प्यार से अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के आस-पास रख दिए। मैंने उसे जोर से पकड़ रखा था बिलकुल हमारे सुहागरात की तरह।
मगर उसका इतना कम वजन मुझे परेशान कर रहा था। महीने के आखरी दिन जब मैंने उसे उठाया तो मेरे लिए एक कदम भी चल पाना मुश्किल हो रहा था। हमारा बेटा स्कूल जा चूका था। मैं अपनी कार से ऑफिस गया और कार से कूद कर बाहर आ गया बिना कार को लॉक किये। मुझे डर था कि अब एक पल की भी देरी मेरा इरादा बदल देगी। मैं उपर गया। प्रिया ने दरवाज़ा खोला और मेने उससे कहा - सॉरी प्रिया ! अब मैं अपनी पत्नी से तलाक नहीं लेना चाहता।
उसने मुझे देखा और मेरे सिर पर हाथ फेरकर कहा - तुम्हें बुखार तो नहीं है ? मैंने उसका हाथ हटाया और कहा - सॉरी प्रिया ! अब मुझे अपनी पत्नी से तलाक नहीं चाहिए।
हमारी शादीसुदा जिंदगी शायद हम दोनों के ध्यान न देने की वजह से बोरिंग हो गयी थी। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम एक-दुसरे से प्यार नहीं करते। अब मुझे एहसास हुआ है कि जिस दिन मैं उसे शादी करके अपने घर लाया था उस दिन से जीवन के आखरी दिन तक मुझे उसका साथ निभाना है।
प्रिया के होश उड़ गए। उसने मुझे एक जोरदार चाँटा जड़ दिया मेरे मुह पर। वह रोने लगी और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा और आकर अपने कार में बेठ गया।
आगे एक फुल वाले की दुकान पर रुका और अपनी प्यारी पत्नी के लिए एक सुंदर सा गुलदस्ता लिया। दूकानदार ने पूछा कि इस पर क्या लिखना है ? मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि "मैं तुम्हें जीवन के आखरी दिन तक यूँ ही उठाता रहूँगा मेरी अर्धांगिनी। "
उस शाम जब मैं घर आया हाथों में गुलदस्ता लिए। मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी। मैं उपर अपने कमरे की तरफ भाग कर गया। लेकिन तब तक वह मुझे छोड़ कर इस दुनिया से जा चुकी थी हमेशा के लिए। वो कई महीनो से कैंसर से लड़ रही थी लेकिन मैं प्रिया के साथ इतना खोया हुआ था कि कभी ध्यान ही नहीं रहा।
उसे पता था वह जल्दी ही मुझे छोड़ कर जाने वाली है इसलिए वह मुझे और मेरे बेटे के रिश्ते को टूटने से बचाना चाहती थी। मैं नीच उससे तलाक लेना चाहता था लेकिन फिर भी उसने मुझे अपने बच्चे की नज़रों में एक प्यारा पति और पिता बना दिया था।
जीवन की छोटी-छोटी बातें रिश्तों में बहुत महत्त्व रखती है। बड़ा घर, बड़ी कार और बैंक बैलेंस ये खुशियों का हिस्सा जरुर बन सकते हैं मगर अपनों के बिना इनकी कोई कीमत नहीं।
मेरी बहु मेरा गुरूर....!!!
रश्मि...जब से वो घर में आयी ना, पूरा घर झिलमिला से गया। चेतन के माँ पापा को हमेशा से एक बेटी चाहिए थी, मगर इसे किस्मत का खेल ही कहिये कि चेतन के बाद उनकी कोई औलाद हुई ही नही। चेतन को उन्होंने बहुत लाड़ प्यार से पाला था, आखिर उनका इकलौता बेटा जो था।
मगर हेमा जी और मुकेश जी के मन की चाहत हमेशा एक टीस की तरह उनके दिल में रही कि काश एक बेटी तो होती, पर जब से रश्मि आयी है उनकी ये मुराद पूरी हो गयी है, रश्मि को तो आज तक लगा ही नही कि वो घर की बेटी नही बहु है।
रश्मि को आज भी याद है वो दिन जब चेतन अपने मम्मी पापा के साथ उसे देखने आया था, तब हेमा जी ने जिस तरह भरी आंखों से उसे गले लगाया वो समझ गई कि वो एक घर छोड़ कर दूसरे घर ही जा रही है।
"चेतन जा ना, क्यों नही जा रहा तू, आज तो संडे है और तू लैपटॉप पर लगा है देख मैंने टिकट भी बुक कर दी है।" हेमा जी चेतन से बोली।
"पर माँ मेरी कल बहुत इम्पोर्टेन्ट मीटिंग है, देखो माँ टाइम नही मेरे पास, मैं अगले हफ्ते ले जाऊंगा ना।" चेतन ने लैपटॉप में नजर गड़ाए हुए कहा।
हेमा जी ने रश्मि के चेहरे पर आई मायूसी को भांप लिया।
"ठीक है, तो एक काम कर तू अपना और पापा का खाना बाहर से आर्डर कर दे, मैं और रश्मि जा रहे है फ़िल्म देखने।" हेमा जी ने उठते हुए कहा।
"मगर माँ, आप तो कभी पिक्चर जाती नही।" चेतन ने हैरानी से पूछा।
"अब जाऊंगी, अपनी बेटी के साथ ...तू लैपटॉप पर काम कर।" हेमा जी मुस्कुराते हुए बोली।
"अरे मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा, मैं भी चलूंगा।" मुकेश जी भी उठ खड़े हुए।
"बेटा तुम बैठो, औऱ वो क्या कहते है उसको....हां पिज़्ज़ा...पिज्जा आर्डर कर लेना अपने लिए।" मुकेश जी मुस्कुराते हुए उनके साथ चले गए।
और बिचारा चेतन उनको जाते हुए देखता रहा। हेमा जी के तो पैरो को पंख लग गए थे, रश्मि के रूप में उन्हें एक नई सहेली जो मिल गयी थीं। वही मुकेश जी को बेटी मिल गयी,चेतन का तो काम ही ऐसा था कि उसे अपने मम्मी पापा के साथ ज्यादा समय बिताने को नही मिलता,उसका एक ही सपना था ग्रीन कार्ड पाना, वो अमेरिका में बसने के सपने देखता था, इसीलिए दिन रात काम मे डूबा रहता था।
जब से रश्मि आयी है हेमा जी और मुकेश जी की जिंदगी में चहल पहल हो गयी, अभी थोड़े समय पहले की बात थी मुकेश जी के घुटनो में बड़ा दर्द रहता था, रश्मि ने अब सख्त हिदायत दे दी, दिन भर tv के आगे बैठना बन्द और अब से मॉर्निंग वाक और योगा शुरू।
शुरुआत में तो उन्होंने थोड़ी आनाकानी की, पर अब रश्मि कहाँ आसानी से पीछा छोड़ने वाली थी, आखिर दोनों की उसकी बात माननी ही थीं। वही चेतन भी बहुत खुश था कि चलो मम्मी पापा का दिल लगा रहता है, अब वो बेफिक्र हो अपने सपने को पूरा कर सकता है।
"माँ.... रश्मि... पापा.... !!"चेतन लगभग चिल्लाते हुए आया।
"क्या हुआ?" माँ ने पूछा।
"माँ मेरा US का वीसा लग गया है अब मैं अगले हफ्ते ही अमेरिका जा रहा हूँ, कंपनी मुझे 2 साल के लिए अमरीका भेज रही है।' चेतन की खुशी की कोई सीमा ही नही थी।
"देखना माँ मैं जल्द ही वहाँ आप तीनों को बुला लूंगा, हम तीनों वहाँ साथ ही रहेंगे।' चेतन ने मां को गोल गोल घुमाते हुए कहा।
"बेटा, तू रश्मि को ले जा। हम बाद में आते रहेंगे।" पापा ने कहा।
"नही पापा, अभी पॉसिबल नही, पर मैं जल्द ही आप लोगो का वीसा लगवाने की कोशिश करता हूँ। जल्द ही हम सब अमेरिका में होंगे" चेतन ने चहकते हुए कहा।
चेतन की तैयारियां शुरू हो गयी, रश्मि का मन उदास था मगर वो ये सोच कर खुश थी कि आखिर चेतन का सपना सच होने जा रहा है।
"रश्मि, मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि तुम मेरी जिंदगी में हो, मैं जल्द ही तुम्हे अपने पास बुला लूंगा।अपना ख्याल रखना" चेतन ने रश्मि को गले लगाते हुए कहा।
सब एयरपोर्ट पर उसे छोड़ने गए। रश्मि भीगी आंखों के साथ उसे विदा कर आई।
रश्मि के प्रति हेमा जी मुकेश जी का प्यार और बढ़ गया, कब वो उनकी बहू से बेटी और न जाने कब वो बेटा बन गयी पता ही नही चला।
"पापा, आपने फिर से चॉकलेट खाई, कितनी बार मुझे आपको मना करना पड़ेगा, आप सच में ना, उस बिट्टू के बच्चे को बताती हूँ वही रोज चॉकलेट ला कर देता है न आपको।" रश्मि ने गुस्से में कहा।
मुकेश जी ने बचपना दिखाते हुये कान पकड़ लिए, रश्मि चाह कर भी अपनी हंसी रोक नही पायी। कहने को सब सही था मगर कुछ था जो सबको खटक रहा था।
चेतन को अमेरिका गए 8 महीने से ज्यादा हो गए, वो कोई न कोई बहाना बना कर वीजा टालता रहा। "माँ मुझे समय दो,यहाँ आप सब कैसे रहेंगे? मैं जल्द ही कुछ इतजाम करता हूँ, माँ रश्मि भी आपके साथ ही आ जायेगी। मैं फ़ोन रखता हूँ, मुझे काम है।" चेतन ने कहा।
धीरे धीरे सबके मन मे एक फांस घिरने लगी, मगर तीनो एक दूसरे के सामने चट्टान बने रहते। चेतन का फ़ोन भी आजकल कम हो गया। डेढ़ साल बीत रहा था। इसी दौरान रश्मि का मुंहबोला भाई अमेरिका गया।
"रश्मि दी, मुझे आपके कुछ बहुत जरूरी बात करनी है।" पुष्पक ने कहा।
"हाँ बोलो पुष्पक।" रश्मि ने कहा।
"दी, प्लीज आप खुद को संभालिएगा, जो मैं बता रहा हूँ।" पुष्पक ने जब कहा तो रश्मि का दिल धक से रह गया।
"दी, जीजू ने यहाँ किसी अमेरिकन लड़की से शादी कर ली है और वो उसी के साथ रह रहे है।" पुष्पक ने जैसे ही कहा रश्मि को लगा दुनिया गोल गोल घूम रही है वो गश कहा कर गिर गयी।
"चेतन, जो मैंने सुना सब सच है क्या? तुझे शर्म नही आई रश्मि को हम सब को इतना बड़ा धोखा देते हुए। क्या इस दिन के लिए हमने तुझे पाला पोसा पढ़ाया बड़ा किया।" मुकेश जी गुस्से में बोले जा रहे थे।
"पापा, आपने कुछ अलग तो नही किया, जानवर भी बच्चे पैदा करते है, बड़ा करते है लेकिन जब उनको उनको मंजिल मिल जाती है वो अपनी राह चले जाते है, पापा मेरे सपने बहुत बड़े है, आप मां और रश्मि कभी भी उनको समझ नही पाओगे।मैं जल्द ही डिवोर्स पेपर भेज दूंगा" चेतन ने कहा।
मुकेश जी को लगा सब कुछ चेतनाशून्य हो गया। घर मे एक मातम सा छा गया। कुछ दिनों बाद जब रश्मि के पिताजी रश्मि को लेने आये तो उसने उनके साथ जाने से मना कर दिया।
"पापा, मैंने कभी ये महसूस नही किया कि मैं कभी अपने घर से दूर आयी हूँ, ये मेरा घर है ये मेरे मम्मी पापा है मैं कैसे इन्हें छोड़ कर जा सकती हूँ। चेतन ने जो किया बहुत गलत किया मगर आज मैं इन्हें छोड़ कर जाती हूँ तो जिंदगी भर मैं खुद को माफ नही कर पाउंगी।" रश्मि ने दृढता से कहा।
मुकेश जी हेमा जी ने भी उसे बहुत समझाया पर वो टस से मस नही हुई। रश्मि ने भी जॉब शुरू कर दी, अब वो उस घर की बेटा बन चुकी थी, तीनो अपने अंदर ढेर सारा दर्द समेटे खुद को संभालने की कोशिश कर रहे थे, हेमा जी की आँखे रश्मि को देख भर आती।
"लगता है हमने पिछले जन्म में जरूर कोई पुण्य किये थे जो रश्मि हमारी जिंदगी में आई, वो मेरी बहु नही मेरा बेटा है मेरा गुरुर है।" मुकेश जी ने हेमा से कहा।
धीरे धीरे जिंदगी पटरी पर दौड़ने लगी। एक रात मुकेश जी ऐसे सोये की अगले दिन उठ न सके।
"चेतन, पापा नही रहे।" रश्मि बस इतना ही कह पायी।
2 मिनट की चुप्पी के बाद जो चेतन ने कहा उसकी कल्पना रश्मि सपने में भी नही कर सकती थी।चेतन ने आने में अपनी असमर्थता जता दी, हेमा जी ने रश्मि की आंखों को पढ़ लिया।
धीरे धीरे सब रिश्तेदार इक्ट्ठा हो गए। ये निर्णय हुआ कि चेतन का चचेरा भाई सुदीप मुखग्नि देगा। अर्थी सज चुकी थी। मुकेश जी अपनी अंतिम यात्रा पर थे।
मुखग्नि का समय आया, जैसे ही सुदीप आगे आया हेमा जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"ये अंतिम अधिकार तो सिर्फ एक बेटा ही निभा सकता है औऱ जब मेरा बेटा यहाँ है तो कोई और क्यों ये करेगा?" हेमा जी ने कहा।
"रश्मि...... अपने बाबूजी को मुखग्नि तुम ही दोगी।" हेमा जी ने कहा।
दूर कहीं आसमान में मुकेश जी एक मुस्कुराहट के साथ अपने बेटे को अपना आखिरी कर्तव्य निभाते देख रहे थे।
दोस्तो, ये कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है। ससुराल कभी घर नही बन सकता.... बहु कभी बेटी नही बन सकती....सास कभी माँ नही बन सकती इन सब बातों को झुठलाते हुए रश्मि ने एक बहु से बेटे के सफर को तय किया।
मगर हेमा जी और मुकेश जी के मन की चाहत हमेशा एक टीस की तरह उनके दिल में रही कि काश एक बेटी तो होती, पर जब से रश्मि आयी है उनकी ये मुराद पूरी हो गयी है, रश्मि को तो आज तक लगा ही नही कि वो घर की बेटी नही बहु है।
रश्मि को आज भी याद है वो दिन जब चेतन अपने मम्मी पापा के साथ उसे देखने आया था, तब हेमा जी ने जिस तरह भरी आंखों से उसे गले लगाया वो समझ गई कि वो एक घर छोड़ कर दूसरे घर ही जा रही है।
"चेतन जा ना, क्यों नही जा रहा तू, आज तो संडे है और तू लैपटॉप पर लगा है देख मैंने टिकट भी बुक कर दी है।" हेमा जी चेतन से बोली।
"पर माँ मेरी कल बहुत इम्पोर्टेन्ट मीटिंग है, देखो माँ टाइम नही मेरे पास, मैं अगले हफ्ते ले जाऊंगा ना।" चेतन ने लैपटॉप में नजर गड़ाए हुए कहा।
हेमा जी ने रश्मि के चेहरे पर आई मायूसी को भांप लिया।
"ठीक है, तो एक काम कर तू अपना और पापा का खाना बाहर से आर्डर कर दे, मैं और रश्मि जा रहे है फ़िल्म देखने।" हेमा जी ने उठते हुए कहा।
"मगर माँ, आप तो कभी पिक्चर जाती नही।" चेतन ने हैरानी से पूछा।
"अब जाऊंगी, अपनी बेटी के साथ ...तू लैपटॉप पर काम कर।" हेमा जी मुस्कुराते हुए बोली।
"अरे मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा, मैं भी चलूंगा।" मुकेश जी भी उठ खड़े हुए।
"बेटा तुम बैठो, औऱ वो क्या कहते है उसको....हां पिज़्ज़ा...पिज्जा आर्डर कर लेना अपने लिए।" मुकेश जी मुस्कुराते हुए उनके साथ चले गए।
और बिचारा चेतन उनको जाते हुए देखता रहा। हेमा जी के तो पैरो को पंख लग गए थे, रश्मि के रूप में उन्हें एक नई सहेली जो मिल गयी थीं। वही मुकेश जी को बेटी मिल गयी,चेतन का तो काम ही ऐसा था कि उसे अपने मम्मी पापा के साथ ज्यादा समय बिताने को नही मिलता,उसका एक ही सपना था ग्रीन कार्ड पाना, वो अमेरिका में बसने के सपने देखता था, इसीलिए दिन रात काम मे डूबा रहता था।
जब से रश्मि आयी है हेमा जी और मुकेश जी की जिंदगी में चहल पहल हो गयी, अभी थोड़े समय पहले की बात थी मुकेश जी के घुटनो में बड़ा दर्द रहता था, रश्मि ने अब सख्त हिदायत दे दी, दिन भर tv के आगे बैठना बन्द और अब से मॉर्निंग वाक और योगा शुरू।
शुरुआत में तो उन्होंने थोड़ी आनाकानी की, पर अब रश्मि कहाँ आसानी से पीछा छोड़ने वाली थी, आखिर दोनों की उसकी बात माननी ही थीं। वही चेतन भी बहुत खुश था कि चलो मम्मी पापा का दिल लगा रहता है, अब वो बेफिक्र हो अपने सपने को पूरा कर सकता है।
"माँ.... रश्मि... पापा.... !!"चेतन लगभग चिल्लाते हुए आया।
"क्या हुआ?" माँ ने पूछा।
"माँ मेरा US का वीसा लग गया है अब मैं अगले हफ्ते ही अमेरिका जा रहा हूँ, कंपनी मुझे 2 साल के लिए अमरीका भेज रही है।' चेतन की खुशी की कोई सीमा ही नही थी।
"देखना माँ मैं जल्द ही वहाँ आप तीनों को बुला लूंगा, हम तीनों वहाँ साथ ही रहेंगे।' चेतन ने मां को गोल गोल घुमाते हुए कहा।
"बेटा, तू रश्मि को ले जा। हम बाद में आते रहेंगे।" पापा ने कहा।
"नही पापा, अभी पॉसिबल नही, पर मैं जल्द ही आप लोगो का वीसा लगवाने की कोशिश करता हूँ। जल्द ही हम सब अमेरिका में होंगे" चेतन ने चहकते हुए कहा।
चेतन की तैयारियां शुरू हो गयी, रश्मि का मन उदास था मगर वो ये सोच कर खुश थी कि आखिर चेतन का सपना सच होने जा रहा है।
"रश्मि, मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि तुम मेरी जिंदगी में हो, मैं जल्द ही तुम्हे अपने पास बुला लूंगा।अपना ख्याल रखना" चेतन ने रश्मि को गले लगाते हुए कहा।
सब एयरपोर्ट पर उसे छोड़ने गए। रश्मि भीगी आंखों के साथ उसे विदा कर आई।
रश्मि के प्रति हेमा जी मुकेश जी का प्यार और बढ़ गया, कब वो उनकी बहू से बेटी और न जाने कब वो बेटा बन गयी पता ही नही चला।
"पापा, आपने फिर से चॉकलेट खाई, कितनी बार मुझे आपको मना करना पड़ेगा, आप सच में ना, उस बिट्टू के बच्चे को बताती हूँ वही रोज चॉकलेट ला कर देता है न आपको।" रश्मि ने गुस्से में कहा।
मुकेश जी ने बचपना दिखाते हुये कान पकड़ लिए, रश्मि चाह कर भी अपनी हंसी रोक नही पायी। कहने को सब सही था मगर कुछ था जो सबको खटक रहा था।
चेतन को अमेरिका गए 8 महीने से ज्यादा हो गए, वो कोई न कोई बहाना बना कर वीजा टालता रहा। "माँ मुझे समय दो,यहाँ आप सब कैसे रहेंगे? मैं जल्द ही कुछ इतजाम करता हूँ, माँ रश्मि भी आपके साथ ही आ जायेगी। मैं फ़ोन रखता हूँ, मुझे काम है।" चेतन ने कहा।
धीरे धीरे सबके मन मे एक फांस घिरने लगी, मगर तीनो एक दूसरे के सामने चट्टान बने रहते। चेतन का फ़ोन भी आजकल कम हो गया। डेढ़ साल बीत रहा था। इसी दौरान रश्मि का मुंहबोला भाई अमेरिका गया।
"रश्मि दी, मुझे आपके कुछ बहुत जरूरी बात करनी है।" पुष्पक ने कहा।
"हाँ बोलो पुष्पक।" रश्मि ने कहा।
"दी, प्लीज आप खुद को संभालिएगा, जो मैं बता रहा हूँ।" पुष्पक ने जब कहा तो रश्मि का दिल धक से रह गया।
"दी, जीजू ने यहाँ किसी अमेरिकन लड़की से शादी कर ली है और वो उसी के साथ रह रहे है।" पुष्पक ने जैसे ही कहा रश्मि को लगा दुनिया गोल गोल घूम रही है वो गश कहा कर गिर गयी।
"चेतन, जो मैंने सुना सब सच है क्या? तुझे शर्म नही आई रश्मि को हम सब को इतना बड़ा धोखा देते हुए। क्या इस दिन के लिए हमने तुझे पाला पोसा पढ़ाया बड़ा किया।" मुकेश जी गुस्से में बोले जा रहे थे।
"पापा, आपने कुछ अलग तो नही किया, जानवर भी बच्चे पैदा करते है, बड़ा करते है लेकिन जब उनको उनको मंजिल मिल जाती है वो अपनी राह चले जाते है, पापा मेरे सपने बहुत बड़े है, आप मां और रश्मि कभी भी उनको समझ नही पाओगे।मैं जल्द ही डिवोर्स पेपर भेज दूंगा" चेतन ने कहा।
मुकेश जी को लगा सब कुछ चेतनाशून्य हो गया। घर मे एक मातम सा छा गया। कुछ दिनों बाद जब रश्मि के पिताजी रश्मि को लेने आये तो उसने उनके साथ जाने से मना कर दिया।
"पापा, मैंने कभी ये महसूस नही किया कि मैं कभी अपने घर से दूर आयी हूँ, ये मेरा घर है ये मेरे मम्मी पापा है मैं कैसे इन्हें छोड़ कर जा सकती हूँ। चेतन ने जो किया बहुत गलत किया मगर आज मैं इन्हें छोड़ कर जाती हूँ तो जिंदगी भर मैं खुद को माफ नही कर पाउंगी।" रश्मि ने दृढता से कहा।
मुकेश जी हेमा जी ने भी उसे बहुत समझाया पर वो टस से मस नही हुई। रश्मि ने भी जॉब शुरू कर दी, अब वो उस घर की बेटा बन चुकी थी, तीनो अपने अंदर ढेर सारा दर्द समेटे खुद को संभालने की कोशिश कर रहे थे, हेमा जी की आँखे रश्मि को देख भर आती।
"लगता है हमने पिछले जन्म में जरूर कोई पुण्य किये थे जो रश्मि हमारी जिंदगी में आई, वो मेरी बहु नही मेरा बेटा है मेरा गुरुर है।" मुकेश जी ने हेमा से कहा।
धीरे धीरे जिंदगी पटरी पर दौड़ने लगी। एक रात मुकेश जी ऐसे सोये की अगले दिन उठ न सके।
"चेतन, पापा नही रहे।" रश्मि बस इतना ही कह पायी।
2 मिनट की चुप्पी के बाद जो चेतन ने कहा उसकी कल्पना रश्मि सपने में भी नही कर सकती थी।चेतन ने आने में अपनी असमर्थता जता दी, हेमा जी ने रश्मि की आंखों को पढ़ लिया।
धीरे धीरे सब रिश्तेदार इक्ट्ठा हो गए। ये निर्णय हुआ कि चेतन का चचेरा भाई सुदीप मुखग्नि देगा। अर्थी सज चुकी थी। मुकेश जी अपनी अंतिम यात्रा पर थे।
मुखग्नि का समय आया, जैसे ही सुदीप आगे आया हेमा जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"ये अंतिम अधिकार तो सिर्फ एक बेटा ही निभा सकता है औऱ जब मेरा बेटा यहाँ है तो कोई और क्यों ये करेगा?" हेमा जी ने कहा।
"रश्मि...... अपने बाबूजी को मुखग्नि तुम ही दोगी।" हेमा जी ने कहा।
दूर कहीं आसमान में मुकेश जी एक मुस्कुराहट के साथ अपने बेटे को अपना आखिरी कर्तव्य निभाते देख रहे थे।
दोस्तो, ये कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है। ससुराल कभी घर नही बन सकता.... बहु कभी बेटी नही बन सकती....सास कभी माँ नही बन सकती इन सब बातों को झुठलाते हुए रश्मि ने एक बहु से बेटे के सफर को तय किया।
Saturday, September 28, 2019
बुढ़िया की सुई
एक बार किसी गाँव में एक बुढ़िया रात के अँधेरे में अपनी झोपडी के बहार कुछ खोज रही थी .तभी गाँव के ही एक व्यक्ति की नजर उस पर पड़ी , “अम्मा इतनी रात में रोड लाइट के नीचे क्या ढूंढ रही हो ?” , व्यक्ति ने पूछा.
” कुछ नहीं मेरी सुई गुम हो गयी है बस वही खोज रही हूँ .”, बुढ़िया ने उत्तर दिया.
फिर क्या था, वो व्यक्ति भी महिला की मदद करने के लिए रुक गया और साथ में सुई खोजने लगा. कुछ देर में और भी लोग इस खोज अभियान में शामिल हो गए और देखते- देखते लगभग पूरा गाँव ही इकठ्ठा हो गया.
सभी बड़े ध्यान से सुई खोजने में लगे हुए थे कि तभी किसी ने बुढ़िया से पूछा ,” अरे अम्मा ! ज़रा ये तो बताओ कि सुई गिरी कहाँ थी?”
” बेटा , सुई तो झोपड़ी के अन्दर गिरी थी .”, बुढ़िया ने ज़वाब दिया .
ये सुनते ही सभी बड़े क्रोधित हो गए और भीड़ में से किसी ने ऊँची आवाज में कहा , ” कमाल करती हो अम्मा ,हम इतनी देर से सुई यहाँ ढूंढ रहे हैं जबकि सुई अन्दर झोपड़े में गिरी थी , आखिर सुई वहां खोजने की बजाये यहाँ बाहर क्यों खोज रही हो ?”
” क्योंकि रोड पर लाइट जल रही है…इसलिए .”, बुढ़िया बोली.
शायद ऐसा ही आज के युवा अपने भविष्य को लेकर सोचते हैं कि लाइट कहाँ जल रही है वो ये नहीं सोचते कि हमारा दिल क्या कह रहा है ; हमारी सुई कहाँ गिरी है . हमें चाहिए कि हम ये जानने की कोशिश करें कि हम किस फील्ड में अच्छा कर सकते हैं और उसी में अपना करीयर बनाएं ना कि भेड़ चाल चलते हुए किसी ऐसी फील्ड में घुस जाएं जिसमे बाकी लोग जा रहे हों या जिसमे हमें अधिक पैसा नज़र आ रहा हो .
” कुछ नहीं मेरी सुई गुम हो गयी है बस वही खोज रही हूँ .”, बुढ़िया ने उत्तर दिया.
फिर क्या था, वो व्यक्ति भी महिला की मदद करने के लिए रुक गया और साथ में सुई खोजने लगा. कुछ देर में और भी लोग इस खोज अभियान में शामिल हो गए और देखते- देखते लगभग पूरा गाँव ही इकठ्ठा हो गया.
सभी बड़े ध्यान से सुई खोजने में लगे हुए थे कि तभी किसी ने बुढ़िया से पूछा ,” अरे अम्मा ! ज़रा ये तो बताओ कि सुई गिरी कहाँ थी?”
” बेटा , सुई तो झोपड़ी के अन्दर गिरी थी .”, बुढ़िया ने ज़वाब दिया .
ये सुनते ही सभी बड़े क्रोधित हो गए और भीड़ में से किसी ने ऊँची आवाज में कहा , ” कमाल करती हो अम्मा ,हम इतनी देर से सुई यहाँ ढूंढ रहे हैं जबकि सुई अन्दर झोपड़े में गिरी थी , आखिर सुई वहां खोजने की बजाये यहाँ बाहर क्यों खोज रही हो ?”
” क्योंकि रोड पर लाइट जल रही है…इसलिए .”, बुढ़िया बोली.
शायद ऐसा ही आज के युवा अपने भविष्य को लेकर सोचते हैं कि लाइट कहाँ जल रही है वो ये नहीं सोचते कि हमारा दिल क्या कह रहा है ; हमारी सुई कहाँ गिरी है . हमें चाहिए कि हम ये जानने की कोशिश करें कि हम किस फील्ड में अच्छा कर सकते हैं और उसी में अपना करीयर बनाएं ना कि भेड़ चाल चलते हुए किसी ऐसी फील्ड में घुस जाएं जिसमे बाकी लोग जा रहे हों या जिसमे हमें अधिक पैसा नज़र आ रहा हो .
मेजर ध्यानचंद जी का जीवन परिचय -- Major Dhyanchand's life introduction
ध्यान चंद हॉकी के एक महान जादूगर खिलाड़ी थे, उन्होंने अपने खेल के प्रदर्शन से पूरी दुनियां में हॉकी का नाम रोशन कर दिया और इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अपने नाम को अंकित कर दिया जिसका नाम ध्यान चंद था।
जब वह खेल के मैदान में आते थे तो विरोधी टीमें पनाहे मांगने लगती थी और अपना सिर उनकी टीम के आगे झुका लेती थी। वह एक ऐसे खिलाड़ी थे, कि वे किसी भी कोण का निशाना बनाकर गोल कर सकते थे। उनकी इसी योग्यता को देखते हुये उन्हें विश्व भर में हॉकी का जादूगर भी कहते थे।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा :
ध्यानचंद का जन्म उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद में 29 अगस्त 1905 को हुआ था। वे कुशवाहा, मौर्य परिवार के थे। उनके पिता का नाम समेश्वर सिंह था, जो ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक सूबेदार के रूप में काम कर रहे थे, साथ ही हाकी गेम भी खेलते थे। ध्यानचंद के दो भाई थे, मूल सिंह और रूप सिंह। रूप सिंह भी ध्यानचंद की तरह हाकी खेला करते थे, जो अच्छे खिलाड़ी थे।
इनके पिता आर्मी में थे। कुछ समय पश्चात उनके पिता का स्थानान्तरण झाँसी में हो गया और तब ध्यान चंद भी अपने पिता के साथ वही रहने लगे पिता का बार-बार स्थानान्तरण होने के कारण वह पढाई में ध्यान अच्छी तरह नहीं लगा पाये और उनका मन हॉकी खेलने में लगा रहा उन्होंने केवल छठी कक्षा तक ही पढाई की है।
हॉकी में उनकी दिलचस्पी :
बचपन में लोग इन्हें ध्यान सिंह के नाम से पुकारा करते थे जब वह छोटे थे तो वे अपने दोस्तों के साथ मिलकर पेड़ की डाली की हॉकी बना लिया करते थे और कपड़े की गेंद बनाकर खेलते थे। एक बार वह अपने पिता के साथ हॉकी का खेल देखने गये वहां उन्होंने एक पक्ष को हारता देख वह दुखी होने लगे तब वह चिल्लाकर अपने पिता से कहने लगे कि अगर मै कमज़ोर पक्ष की तरफ से खेलूँगा तो परिणाम कुछ और ही होगा।
तभी वहां खड़े एक आर्मी आफिसर ने उन्हें खेल के मैदान में जाने की इजाजत दे दी। वहां जाकर उन्होंने लगातार 4 गोल किये और वहां के लोगों को आश्चर्य चकित कर दिया उस समय वह केवल 14 साल के बालक थे, उनकी इस प्रतिभा को देखकर 16 साल की उम्र में उन्हें आर्मी में भर्ती कर लिया गया इसके बाद भी वह अपने आपको हॉकी से अलग नहीं कर पाये।
ध्यान चंद के पहले कोच का नाम भोले तिवारी था चूँकि आर्मी में कार्यरत होने के कारण उनके पास हॉकी खेलने का समय नहीं होता था पर फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और उस समय वे रात को चाँद की रोशनी में हॉकी खेला करते थे।
वे हॉकी के दीवाने थे। आर्मी के साथ-साथ ही उन्होंने हॉकी में भी अपना कैरियर बनाया और 21वर्ष की उम्र में उन्हें न्यूजीलैंड जा रही भारतीय टीम में चुना गया। इस खेल में भारत ने 21 में 18 मैच जीते।
1928 एम्सटरडम ओलंपिक :
23 साल की उम्र में ध्यान चंद को 1928 में एम्सटरडम ओलंपिक में पहली बार भारतीय टीम के सदस्य के रूप में चुना गया यहाँ भारतीय टीम द्वारा खेले गये चार मैचों में 23 गोल किये और स्वर्ण पदक हासिल किया 1932 में वर्लिन ओलंपिक में ध्यान चंद को कप्तान बनाया गया।
15 अगस्त 1936 को हुये मैच में भारत ने जर्मनी को 8 –1 से हरा दिया और स्वर्ण पदक जीता। इस मैच को जर्मनी का हिटलर भी देख रहा था और जब खेल खत्म हुआ तो उसने ध्यान से मिलने की इच्छा जताई और उनसे मिलकर उनकी बहुत तारीफ भी की। हिटलर ने ध्यानचंद को अपनी टीम में आने के लिए भी कहा परन्तु मेजर ध्यानचंद ने पूर्ण रूप से मना कर दिया।
1932 में भारतीय टीम ने 37 मैच खेले और 338 गोल किये जिसमें से 133 अकेले ध्यान चंद ने किये थे। इनमें से 11 पर ध्यान चंद का नाम लिखा था।
इंटरनेशनल मैचों में 300 गोल का रिकॉर्ड भी ध्यान चंद के खाते में ही जाता है। उन्होंने अपने हॉकी जीवन में इतने गोल किये जितने गोल खिलाड़ी अपने पूरे जीवन के दौरान नहीं कर पाते है।
उनके ऐसे करिश्मायी खेल से हालैंड में उनकी हॉकी को तोड़कर देखा गया कि कही उसमें चुम्बक तो नहीं लगी है। जापान में उनकी हॉकी का प्रयोगशाला में परीक्षण भी हुआ कि कही इनकी हॉकी में गोंद उपयोग तो नही हुयी है।
1948 में 43 वर्ष की उम्र में वह आर्मी से सेवानिर्वृत्त हुये तो उसी वर्ष भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से पुरुस्कृत किया
29 अगस्त, उनके जन्म को हम राष्ट्रिय खेल दिवस के रूप में मनाते है। राजीव गाँधी खेल रत्न पुरुष्कार, अर्जुन पुरुष्कार, गुरुद्रोणाचार्य पुरुष्कार वियना के एक स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गयी है।
जिनमें उनके चार हाथ है और चारों में स्टिक पकड़े हुये है।
दिल्ली के एक स्टेडियम के नाम को उनके नाम पर रखा गया है मेजर ध्यान चंद भारतीय ओलंपिक संघ द्वारा उन्हें शताव्दी का खिलाडी कहा गया है।
मेजर ध्यानचंद के बारे में खास बातें :
ध्यानचंद ने 16 साल की उम्र में भारतीय सेना जॉइन की। भर्ती होने के बाद उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया। ध्यानचंद काफी प्रैक्टिस किया करते थे। रात को उनके प्रैक्टिस सेशन को चांद निकलने से जोड़कर देखा जाता। इसलिए उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें 'चांद' नाम दे दिया।
1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलिंपिक खेलों में वह भारत की ओर से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी रहे। उस टूर्नामेंट में ध्यानचंद ने 4 मैचों में 24 गोल किए। एक स्थानीय समाचार पत्र में लिखा था, 'यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था। और ध्यानचंद हॉकी के जादूगर हैं।
हालांकि ध्यानचंद ने कई यादगार मैच खेले, लेकिन क्या आप जानते हैं कि व्यक्तिगत रूप से कौन सा मैच उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था। ध्यानचंद ने बताया कि 1933 में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया बिगटन क्लब फाइनल उनका सबसे ज्यादा पसंदीदा मुकाबला था।
1932 के ओलिंपिक फाइनल में भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को 24-1 से हराया था। उस मैच में ध्यानचंद ने 8 गोल किए थे। उनके भाई रूप सिंह ने 10 गोल किए थे। उस टूर्नमेंट में भारत की ओर से किए गए 35 गोलों में से 25 गोल दो भाइयों की जोड़ी ने किए थे। ये थे रूप सिंह (15 गोल) और मेजर ध्यानचंद (10 गोल)। (एक मैच में 24 गोल दागने का 86 साल पुराना यह रेकॉर्ड भारतीय हॉकी टीम ने इंडोनेशिया में जारी एशियाई खेलों में हाल ही में तोड़ा है। हाल ही में भारत ने हॉन्ग कॉन्ग को 26-0 से मात देकर यह रेकॉर्ड तोड़ा।)
ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट दिग्गज सर डॉन ब्रैडमैन ने 1935 में एडिलेड में ध्यानचंद से मुलाकात की। ध्यानचंद को खेलते देख, ब्रैडमैन ने कहा कि ध्यानचंद ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं।
विएना के एक स्पोर्ट्स क्लब में ध्यानचंद के चार हाथों वाली मूर्ति लगी है, उनके हाथों में हॉकी स्टिक हैं। यह मूर्ति यह दिखाने का परिचायक है कि उनकी हॉकी में कितना जादू था।
ध्यानचंद की महानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह दूसरे खिलाड़ियों की अपेक्षा इतने गोल कैसे कर लेते हैं। इसके लिए उनकी हॉकी स्टिक को ही तोड़ कर जांचा गया। नीदरलैंड्स में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक तोड़कर यह चेक किया गया था कि कहीं इसमें चुंबक तो नहीं लगी।
ध्यानचंद ने 1928, 1932 और 1936 ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। तीनों ही बार भारत ने ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीता।
दुनिया के सबसे महान हॉकी खिलाड़ियों में से एक मेजर ध्यानचंद ने अतंरराष्ट्रीय हॉकी में बहुत ज्यादा गोल दागे। 22 साल के हॉकी करियर में उन्होंने अपने खेल से पूरी दुनिया को हैरान किया।
बर्लिन ओलिंपिक में ध्यानचंद के शानदार प्रदर्शन से प्रभावित होकर हिटलर ने उन्हें डिनर के लिए आमंत्रित किया था। जर्मन तानाशाह ने उन्हें जर्मनी की फौज में बड़े पद का लालच दिया और जर्मनी की ओर से हॉकी खेलने को कहा। लेकिन ध्यानचंद ने उसे ठुकराते हुए हिटलर को दो टूक अंदाज में जवाब दिया, 'हिंदुस्तान ही मेरा वतन है और मैं उसी के लिए आजीवन हॉकी खेलता रहूंगा।'
मृत्यु :
3 दिसम्बर 1979 को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में लीवर कैंसर के कारण उनकी मृत्यु हो गयी।
जब वह खेल के मैदान में आते थे तो विरोधी टीमें पनाहे मांगने लगती थी और अपना सिर उनकी टीम के आगे झुका लेती थी। वह एक ऐसे खिलाड़ी थे, कि वे किसी भी कोण का निशाना बनाकर गोल कर सकते थे। उनकी इसी योग्यता को देखते हुये उन्हें विश्व भर में हॉकी का जादूगर भी कहते थे।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा :
ध्यानचंद का जन्म उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद में 29 अगस्त 1905 को हुआ था। वे कुशवाहा, मौर्य परिवार के थे। उनके पिता का नाम समेश्वर सिंह था, जो ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक सूबेदार के रूप में काम कर रहे थे, साथ ही हाकी गेम भी खेलते थे। ध्यानचंद के दो भाई थे, मूल सिंह और रूप सिंह। रूप सिंह भी ध्यानचंद की तरह हाकी खेला करते थे, जो अच्छे खिलाड़ी थे।
इनके पिता आर्मी में थे। कुछ समय पश्चात उनके पिता का स्थानान्तरण झाँसी में हो गया और तब ध्यान चंद भी अपने पिता के साथ वही रहने लगे पिता का बार-बार स्थानान्तरण होने के कारण वह पढाई में ध्यान अच्छी तरह नहीं लगा पाये और उनका मन हॉकी खेलने में लगा रहा उन्होंने केवल छठी कक्षा तक ही पढाई की है।
हॉकी में उनकी दिलचस्पी :
बचपन में लोग इन्हें ध्यान सिंह के नाम से पुकारा करते थे जब वह छोटे थे तो वे अपने दोस्तों के साथ मिलकर पेड़ की डाली की हॉकी बना लिया करते थे और कपड़े की गेंद बनाकर खेलते थे। एक बार वह अपने पिता के साथ हॉकी का खेल देखने गये वहां उन्होंने एक पक्ष को हारता देख वह दुखी होने लगे तब वह चिल्लाकर अपने पिता से कहने लगे कि अगर मै कमज़ोर पक्ष की तरफ से खेलूँगा तो परिणाम कुछ और ही होगा।
तभी वहां खड़े एक आर्मी आफिसर ने उन्हें खेल के मैदान में जाने की इजाजत दे दी। वहां जाकर उन्होंने लगातार 4 गोल किये और वहां के लोगों को आश्चर्य चकित कर दिया उस समय वह केवल 14 साल के बालक थे, उनकी इस प्रतिभा को देखकर 16 साल की उम्र में उन्हें आर्मी में भर्ती कर लिया गया इसके बाद भी वह अपने आपको हॉकी से अलग नहीं कर पाये।
ध्यान चंद के पहले कोच का नाम भोले तिवारी था चूँकि आर्मी में कार्यरत होने के कारण उनके पास हॉकी खेलने का समय नहीं होता था पर फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और उस समय वे रात को चाँद की रोशनी में हॉकी खेला करते थे।
वे हॉकी के दीवाने थे। आर्मी के साथ-साथ ही उन्होंने हॉकी में भी अपना कैरियर बनाया और 21वर्ष की उम्र में उन्हें न्यूजीलैंड जा रही भारतीय टीम में चुना गया। इस खेल में भारत ने 21 में 18 मैच जीते।
1928 एम्सटरडम ओलंपिक :
23 साल की उम्र में ध्यान चंद को 1928 में एम्सटरडम ओलंपिक में पहली बार भारतीय टीम के सदस्य के रूप में चुना गया यहाँ भारतीय टीम द्वारा खेले गये चार मैचों में 23 गोल किये और स्वर्ण पदक हासिल किया 1932 में वर्लिन ओलंपिक में ध्यान चंद को कप्तान बनाया गया।
15 अगस्त 1936 को हुये मैच में भारत ने जर्मनी को 8 –1 से हरा दिया और स्वर्ण पदक जीता। इस मैच को जर्मनी का हिटलर भी देख रहा था और जब खेल खत्म हुआ तो उसने ध्यान से मिलने की इच्छा जताई और उनसे मिलकर उनकी बहुत तारीफ भी की। हिटलर ने ध्यानचंद को अपनी टीम में आने के लिए भी कहा परन्तु मेजर ध्यानचंद ने पूर्ण रूप से मना कर दिया।
1932 में भारतीय टीम ने 37 मैच खेले और 338 गोल किये जिसमें से 133 अकेले ध्यान चंद ने किये थे। इनमें से 11 पर ध्यान चंद का नाम लिखा था।
इंटरनेशनल मैचों में 300 गोल का रिकॉर्ड भी ध्यान चंद के खाते में ही जाता है। उन्होंने अपने हॉकी जीवन में इतने गोल किये जितने गोल खिलाड़ी अपने पूरे जीवन के दौरान नहीं कर पाते है।
उनके ऐसे करिश्मायी खेल से हालैंड में उनकी हॉकी को तोड़कर देखा गया कि कही उसमें चुम्बक तो नहीं लगी है। जापान में उनकी हॉकी का प्रयोगशाला में परीक्षण भी हुआ कि कही इनकी हॉकी में गोंद उपयोग तो नही हुयी है।
1948 में 43 वर्ष की उम्र में वह आर्मी से सेवानिर्वृत्त हुये तो उसी वर्ष भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से पुरुस्कृत किया
29 अगस्त, उनके जन्म को हम राष्ट्रिय खेल दिवस के रूप में मनाते है। राजीव गाँधी खेल रत्न पुरुष्कार, अर्जुन पुरुष्कार, गुरुद्रोणाचार्य पुरुष्कार वियना के एक स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गयी है।
जिनमें उनके चार हाथ है और चारों में स्टिक पकड़े हुये है।
दिल्ली के एक स्टेडियम के नाम को उनके नाम पर रखा गया है मेजर ध्यान चंद भारतीय ओलंपिक संघ द्वारा उन्हें शताव्दी का खिलाडी कहा गया है।
मेजर ध्यानचंद के बारे में खास बातें :
ध्यानचंद ने 16 साल की उम्र में भारतीय सेना जॉइन की। भर्ती होने के बाद उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया। ध्यानचंद काफी प्रैक्टिस किया करते थे। रात को उनके प्रैक्टिस सेशन को चांद निकलने से जोड़कर देखा जाता। इसलिए उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें 'चांद' नाम दे दिया।
1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलिंपिक खेलों में वह भारत की ओर से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी रहे। उस टूर्नामेंट में ध्यानचंद ने 4 मैचों में 24 गोल किए। एक स्थानीय समाचार पत्र में लिखा था, 'यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था। और ध्यानचंद हॉकी के जादूगर हैं।
हालांकि ध्यानचंद ने कई यादगार मैच खेले, लेकिन क्या आप जानते हैं कि व्यक्तिगत रूप से कौन सा मैच उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था। ध्यानचंद ने बताया कि 1933 में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया बिगटन क्लब फाइनल उनका सबसे ज्यादा पसंदीदा मुकाबला था।
1932 के ओलिंपिक फाइनल में भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को 24-1 से हराया था। उस मैच में ध्यानचंद ने 8 गोल किए थे। उनके भाई रूप सिंह ने 10 गोल किए थे। उस टूर्नमेंट में भारत की ओर से किए गए 35 गोलों में से 25 गोल दो भाइयों की जोड़ी ने किए थे। ये थे रूप सिंह (15 गोल) और मेजर ध्यानचंद (10 गोल)। (एक मैच में 24 गोल दागने का 86 साल पुराना यह रेकॉर्ड भारतीय हॉकी टीम ने इंडोनेशिया में जारी एशियाई खेलों में हाल ही में तोड़ा है। हाल ही में भारत ने हॉन्ग कॉन्ग को 26-0 से मात देकर यह रेकॉर्ड तोड़ा।)
ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट दिग्गज सर डॉन ब्रैडमैन ने 1935 में एडिलेड में ध्यानचंद से मुलाकात की। ध्यानचंद को खेलते देख, ब्रैडमैन ने कहा कि ध्यानचंद ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं।
विएना के एक स्पोर्ट्स क्लब में ध्यानचंद के चार हाथों वाली मूर्ति लगी है, उनके हाथों में हॉकी स्टिक हैं। यह मूर्ति यह दिखाने का परिचायक है कि उनकी हॉकी में कितना जादू था।
ध्यानचंद की महानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह दूसरे खिलाड़ियों की अपेक्षा इतने गोल कैसे कर लेते हैं। इसके लिए उनकी हॉकी स्टिक को ही तोड़ कर जांचा गया। नीदरलैंड्स में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक तोड़कर यह चेक किया गया था कि कहीं इसमें चुंबक तो नहीं लगी।
ध्यानचंद ने 1928, 1932 और 1936 ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। तीनों ही बार भारत ने ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीता।
दुनिया के सबसे महान हॉकी खिलाड़ियों में से एक मेजर ध्यानचंद ने अतंरराष्ट्रीय हॉकी में बहुत ज्यादा गोल दागे। 22 साल के हॉकी करियर में उन्होंने अपने खेल से पूरी दुनिया को हैरान किया।
बर्लिन ओलिंपिक में ध्यानचंद के शानदार प्रदर्शन से प्रभावित होकर हिटलर ने उन्हें डिनर के लिए आमंत्रित किया था। जर्मन तानाशाह ने उन्हें जर्मनी की फौज में बड़े पद का लालच दिया और जर्मनी की ओर से हॉकी खेलने को कहा। लेकिन ध्यानचंद ने उसे ठुकराते हुए हिटलर को दो टूक अंदाज में जवाब दिया, 'हिंदुस्तान ही मेरा वतन है और मैं उसी के लिए आजीवन हॉकी खेलता रहूंगा।'
मृत्यु :
3 दिसम्बर 1979 को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में लीवर कैंसर के कारण उनकी मृत्यु हो गयी।
Friday, September 27, 2019
जीवन में चार का महत्व
गृहस्थ गीता के अनमोल वचन
1. चार बातों को याद रखे :- बड़े बूढ़ों का आदर करना, छोटों की रक्षा करना एवं उनपर स्नेह करना, बुद्धिमानों से सलाह लेना और मूर्खों के साथ कभी न उलझना !
2. चार चीजें पहले दुर्बल दिखती हैं परन्तु परवाह न करने पर बढक़र दु:ख का कारण बनती हैं :- अग्नि, रोग, ऋण और पाप !
3. चार चीजों का सदा सेवन करना चाहिए :- सत्संग, संतोष, दान और दया !
4. चार अवस्थाओं में आदमी बिगड़ता है :- जवानी, धन, अधिकार और अविवेक !
5. चार चीजें मनुष्य को बड़े भाग्य से मिलती हैं :- भगवान को याद रखने की लगन, संतों की संगति, चरित्र की निर्मलता और उदारता !
6. चार गुण बहुत दुर्लभ है :- धन में पवित्रता, दान में विनय, वीरता में दया और अधिकार में निराभिमानता !
7. चार चीजों पर भरोसा मत करो :- बिना जीता हुआ मन, शत्रु की प्रीति, स्वार्थी की खुशामद और बाजारू ज्योतिषियों की भविष्यवाणी !
8. चार चीजों पर भरोसा रखो :- सत्य, पुरुषार्थ, स्वार्थहीन और मित्र !
9. चार चीजें जाकर फिर नहीं लौटतीं :- मुह से निकली बात, कमान से निकला तीर, बीती हुई उम्र और मिटा हुआ ज्ञान !
10. चार बातों को हमेशा याद रखें :- दूसरे के द्वारा अपने ऊपर किया गया उपकार, अपने द्वारा दूसरे पर किया गया अपकार, मृत्यु और भगवान !
11. चार के संग से बचने की चेष्टा करें :- नास्तिक, अन्याय का धन, पर(परायी) नारी और परनिन्दा !
12. चार चीजों पर मनुष्य का बस नहीं चलता :- जीवन, मरण, यश और अपयश !
13. चार पर परिचय चार अवस्थाओं में मिलता है :- दरिद्रता में मित्र का, निर्धनता में स्त्री का, रण में शूरवीर का और बदनामी में बंधु-बान्धवों का !
14. चार बातों में मनुष्य का कल्याण है :- वाणी के संयम में, अल्प निद्रा में, अल्प आहार में और एकांत के भगवत्स्मरण में !
15. शुद्ध साधना के लिए चार बातों का पालन आवश्यक है :- भूख से कम खाना, लोक प्रतिष्ठा का त्याग, निर्धनता का स्वीकार और ईश्वर की इच्छा में संतोष !
16. चार प्रकार के मनुष्य होते हैं : (क) मक्खीचूस - न आप खाये और न दूसरों को दे ! (ख) कंजूस - आप तो खाये पर दूसरों को न दे ! (ग) उदार - आप भी खाये और दूसरे को भी दे ! (घ) दाता - आप न खाय और दूसरे को दे ! यदि दाता नहीं बन सकते तो कम से कम उदार तो बनना ही चाहिए !
17. मन के चार प्रकार हैं :- धर्म से विमुख जीव का मन मुर्दा है, पापी का मन रोगी है, लोभी तथा स्वार्थी का मन आलसी है और भजन साधना में तत्पर का मन स्वस्थ है.
1. चार बातों को याद रखे :- बड़े बूढ़ों का आदर करना, छोटों की रक्षा करना एवं उनपर स्नेह करना, बुद्धिमानों से सलाह लेना और मूर्खों के साथ कभी न उलझना !
2. चार चीजें पहले दुर्बल दिखती हैं परन्तु परवाह न करने पर बढक़र दु:ख का कारण बनती हैं :- अग्नि, रोग, ऋण और पाप !
3. चार चीजों का सदा सेवन करना चाहिए :- सत्संग, संतोष, दान और दया !
4. चार अवस्थाओं में आदमी बिगड़ता है :- जवानी, धन, अधिकार और अविवेक !
5. चार चीजें मनुष्य को बड़े भाग्य से मिलती हैं :- भगवान को याद रखने की लगन, संतों की संगति, चरित्र की निर्मलता और उदारता !
6. चार गुण बहुत दुर्लभ है :- धन में पवित्रता, दान में विनय, वीरता में दया और अधिकार में निराभिमानता !
7. चार चीजों पर भरोसा मत करो :- बिना जीता हुआ मन, शत्रु की प्रीति, स्वार्थी की खुशामद और बाजारू ज्योतिषियों की भविष्यवाणी !
8. चार चीजों पर भरोसा रखो :- सत्य, पुरुषार्थ, स्वार्थहीन और मित्र !
9. चार चीजें जाकर फिर नहीं लौटतीं :- मुह से निकली बात, कमान से निकला तीर, बीती हुई उम्र और मिटा हुआ ज्ञान !
10. चार बातों को हमेशा याद रखें :- दूसरे के द्वारा अपने ऊपर किया गया उपकार, अपने द्वारा दूसरे पर किया गया अपकार, मृत्यु और भगवान !
11. चार के संग से बचने की चेष्टा करें :- नास्तिक, अन्याय का धन, पर(परायी) नारी और परनिन्दा !
12. चार चीजों पर मनुष्य का बस नहीं चलता :- जीवन, मरण, यश और अपयश !
13. चार पर परिचय चार अवस्थाओं में मिलता है :- दरिद्रता में मित्र का, निर्धनता में स्त्री का, रण में शूरवीर का और बदनामी में बंधु-बान्धवों का !
14. चार बातों में मनुष्य का कल्याण है :- वाणी के संयम में, अल्प निद्रा में, अल्प आहार में और एकांत के भगवत्स्मरण में !
15. शुद्ध साधना के लिए चार बातों का पालन आवश्यक है :- भूख से कम खाना, लोक प्रतिष्ठा का त्याग, निर्धनता का स्वीकार और ईश्वर की इच्छा में संतोष !
16. चार प्रकार के मनुष्य होते हैं : (क) मक्खीचूस - न आप खाये और न दूसरों को दे ! (ख) कंजूस - आप तो खाये पर दूसरों को न दे ! (ग) उदार - आप भी खाये और दूसरे को भी दे ! (घ) दाता - आप न खाय और दूसरे को दे ! यदि दाता नहीं बन सकते तो कम से कम उदार तो बनना ही चाहिए !
17. मन के चार प्रकार हैं :- धर्म से विमुख जीव का मन मुर्दा है, पापी का मन रोगी है, लोभी तथा स्वार्थी का मन आलसी है और भजन साधना में तत्पर का मन स्वस्थ है.
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असली पूजा
ये लड़की कितनी नास्तिक है ...हर रोज मंदिर के सामने से गुजरेगी मगर अंदर आकर आरती में शामिल होना तो दूर, भगवान की मूर्ति ...
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इन 60-65 साल के अंकल आंटी का झगड़ा ख़त्म ही नहीं होता..... एक बार मैंने सोचा अंकल और आंटी से बात करू क्यों लड़ते हैं, हर वक़्त आख़ि...
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फ़ुर्सत में था , सोचा चलो आज थोड़ी सी जिंदगी सुलझा लूँ । अलमारी खोली तो ढ़ेर सारे सपनें नीचे गिर गये , ना जाने कब से रखे थे वहाँ , बे...