अलख
रामू सेठ के पास अपार धन-संपत्ति थी, विशाल हवेली,नौकर-चाकर, सब तरह का आराम,फिर भी उसका मन अशांत रहता था। हर समय उसे कोई-न-कोई चिंता घेरे रहती थी। सेठ उदास रहता।
जब उसकी हालत बहुत खराब होने लगी तो एक दिन उसके एक मित्र ने उसे शहर से कुछ दूर आश्रम में रहने वाले साधु के पास जाने की सलाह दी। मित्र ने बताया,"वह पहुंचा हुआ साधु है। कैसा भी दुख लेकर जाओ, दूर कर देता है।"
रामू सेठ साधु के पास गया। अपनी सारी मुसीबत सुनाकर विनती करने लगा, "स्वामीजी! मैं जिंदगी से बेजार हो गया हूँ। मुझे बचाइए।"
साधु महात्मा बोले, "घबराओ नहीं,तुम्हारी सारी अशांति दूर हो जाएगी। प्रभु के चरणों में लौ लगाओ।"
साधु महात्मा ने रामू सेठ को ध्यान करने की सलाह दी और उसकी विधि भी समझा दी।
लेकिन,रामू सेठ का मन उसमें नहीं रमा। वह ज्योंही जप ध्यान करने बैठता, उसका मन कुरंग-चौकड़ी भरने लगता।
इस तरह कई दिन बीत गए। आखिर फिर पँहुच गया साधु महात्मा के आश्रम में।
उसने साधु महात्मा को अपनी परेशानी बताई। महात्मा जी ने सेठ को कुछ दिन आश्रम में ही बिताने को कहा। एक दिन सेठ साधु महात्मा जी के साथ आश्रम में घूम रहा था कि उसके पैर में एक कांटा चुभ गया।
सेठ वहीं बैठ गया और पैर पकड़कर चिल्लाने लगा - "स्वामीजी, मैं क्या करूं? बड़ा दर्द हो रहा है।"
"चिल्लाते क्यों हो? कांटे को निकाल दो।" महात्मा जी बोले।
सेठ जी ने हिम्मत कर कांटे को निकाल ही दिया। अब उन्हें चैन पड़ गया।
अब महात्मा जी ने गंभीर होकर कहा,"सेठ! तुम्हारे पैर में जरा-सा कांटा क्या चुभा कि तुम बेहाल हो गए, लेकिन यह तो सोचो कि तुम्हारे भीतर कितने बड़े-बड़े कांटे चुभे हुए हैं....
लोभ के, मोह के, क्रोध के, ईर्ष्या के, देश के और न जाने किस-किस के। जब तक तुम उन्हें नहीं उखाड़ोगे, तुम्हें शांति कैसे मिलेगी?"
साधु महात्मा के इन शब्दों ने सेठ के अंतर में ज्योति जला दी।
आईये हम भी उखाड़ फेंके अपने भीतर के राग,द्वेष लोभ,मोह,क्रोध,ईर्ष्या,
अहंकार रूपी कांटे और अलख जगाएं आपसी प्रेम भाईचारे और देशभक्ति की,इसी मङ्गल कामना के साथ.......
Wednesday, June 26, 2019
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