जब कभी भी मैं अपने बचपन के दिन याद करती हूं तो पापा का पहला थप्पड़ जरूर याद आता है। पहला थप्पड़ मेरे लिए एक बहुत बड़ी सीख भी बना। जब मैं 4 साल की थी तब मैं पहली बार बड़ी बहन के साथ स्कूल गयी। मेरी बहन जब स्कूल जाती थी तो मेरा भी मन होता की मैं भी स्कूल जाऊं। छोटी और ज्यादा शरारती होने के कारण घरवाले मुझे उसके साथ स्कूल नहीं भेजते थे। मेरे अंदर बहुत जिज्ञासा रहती थी स्कूल देखने की। जब बड़ी बहन घर आकर आपना होमवर्क करती तो मैं उनके पास बैठ कर लिखने के लिए जिद करती थी। उन्होंने स्कूल जाने से पहले मुझे काफी कुछ सिखा दिया था। फिर वो दिन भी आया जब मुझे भी अपनी बहन के साथ स्कूल भेजा गया। स्कूल में देखा कि बहुत सारे बच्चे हैं। इतने में एक घण्टी बजी। सारे बच्चे एक ग्राउंड की तरफ भागने लगे। हम भी वहां चले गए। सारे लाइन बना कर आंखें बंद करके और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। मुझे भी ऐसे ही खड़ा कर दिया गया। सारे बच्चे प्रार्थना करने लगे। मैंने बीच मैं एक आंख खोली और देखा कि सब वैसे ही खड़े हैं। मैंने झट से आंख बंद की और सीधी खड़ी हो गई। उसके बाद दीदी मुझे मेरी क्लास में छोड़ने गई। वहां मेरी उम्र के बहुत सारे बच्चे थे। उनके बीच मुझे भी बैठा दिया। उसके बाद क्लास टीचर ने मुझसे मेरा नाम पूछा और बाकी बच्चों से मेरा इंट्रोडक्शन करवाया और हमें फलों और सब्जियों के नाम याद करवाये। बीच-बीच में दीदी आकर मुझे देख भी जाती थी कि कहीं मैं रो तो नहीं रही हूं। खेलकूद में पता नहीं लगा
कब स्कूल का टाइम पूरा हो गया। उसके बाद मैं दीदी के साथ घर चली गई। मेरे मम्मी पापा भी इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने पूछा -आज कैसा रहा मेरा पहला दिन तो उनको मैं सब डिटेल्स बताती रही। फिर थोड़ी देर बाद पापा बोले-चलो बेटा, आज तुम्हें तुम्हारा नाम लिखना सिखाते हैं। अब तुम स्कूल भी जाने लगी हो तो अपना नाम लिखना भी सीख लो। पापा ने मेरा नाम कॉपी पर लिखा और मुझे बताया कि कैसे लिखना है। मैं बार-बार नाम लिखने मैं गलती कर रही थी। पापा के बहुत बार बताने के बाद भी मैं गलत लिखती जा रही थी। अंत में पापा ने एक चांटा रसीद कर दिया। थप्पड़ लगते ही मैंने नाम झट से सही लिख दिया। पापा का वह पहला थप्पड़ आज भी कोई गलती करने से रोकता है। इस थप्पड़ ने स्कूल का वो पहला दिन हमेशा के लिए यादगार बना दिया।
असली पूजा
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