माँ ...बताओ न पापा कैसे बोलते थे
उनकी कुछ अवाजे सुनाओ न...करीब 10 साल की बेटी अपनी माँ पायल से जिद करती है..
तभी पायल अपने उन्हीं लम्हों मे खो जाती है जहाँ जिंदगी बेहद खूबसूरत थी...
दो प्रेमी एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे...मगर उनकी जाती एक न होने की वजह से उनके दोनों परिवार वाले इस रिश्ते से मंजूर नहीं थे। वह एक दूसरे के बिना बिलकुल भी जी नहीं सकते थे...इसलिए दोनों ने अपने अपने घरवालो के खिलाफ जाकर अपनी मर्जी से शादी करके एक दूसरे शहर मे जा बसे...लड़का बेहद मेहनती था इसलिए वह हर काम दिल लगाके करने लगा और इधर लड़की भी पढ़ी लिखी थी और खासकर math मे उसकी पकड़ बहुत ज्यादा थी...इसलिए वह घर पर ही tuition पढ़ाने लगी...देखते ही देखते 2 साल बित गये...इन दो सालों मे पैसे भी अच्छे जमा हो गये। इन दोनों का प्यार अब पहले से भी ज्यादा गहरा हो चुका था...फिर एक दिन ए दो...दो से तीन हो गये...घर मे एक खूबसूरत बेटी ने जन्म लिया। दोनों की खुशी का कोई ठीकाना न रहा। लड़का अब बाप बन चुका था अब वह और भी ज्यादा जिम्मेदार से अपना काम करने लगा। मगर....कुछ दिनों बाद ही लड़की की जिंदगी नरक जैसी बन गई..अब लड़का हर बात पे अपनी पत्नी की गलतियाँ निकालने लगा। चाहे खाना हो चाहे कपड़े हो चाहे कुछ भी हो,लड़की अक्सर अकेले मे रोती रहती थी...बेटी तो गोद मे थी, उसे कुछ पता नहीं था की मम्मी पापा के बिच क्या हो रहा है। कब तक बर्दाश्त करती लड़की, अब वह भी जवाब देने लगी थी..
घर मे हर वक्त अशांति का माहौल बन गया था,
पत्नी - शायद अब मैं एक बच्ची की माँ बन गया हूँ और तुम्हारा मन शायद किसी कुंवारी लड़की पर आ गया होगा इसलिए तुम रोज मुझसे झगडते हो।
पति- हाँ आया है क्या करोगी...मुझे छोड़ दोगी? छोड़ भी दिया तो तुमसे कौन शादी करेगा?
पत्नी- तुम्हें शायद पता नहीं की एक लड़की या एक औरत जब ठान ले कुछ करने को...तो दुनिया के हर मर्द को अपने काबू मे कर सकती है..मगर मैं ऐसा कभी नहीं करूँगी । शायद ये तुम्हारे घर के संस्कार होंगे मेरे नहीं।
- चलो देखता हूँ मेरे बाद तुम्हें कौन बेवकूफ अपनाता है।
पत्नी - सीधे क्यों नहीं बोलते की...बेटी हुई इसलिए तुम मुझसे पिछा छुडाना चाहते हो।
लड़का चिल्लाकर लड़की पर हाँथ उठा देता है मगर रूक जाता है।
पत्नी - रूक क्यों गये हाँ? सच कडुवा होता है न? शायद तुम निगल नहीं पाये।
लड़का गुस्से मे बाहर निकल जाता है। उस वक्त लड़की को अपने माँ बाप की बहुत याद आती है वह अपनी गलती पर पश्चाती है और अपनी मां को फोन करते करते रोने लगती है। फिर वह माँ को सब बता देती है। आखीर मां तो माँ ही होती है। फिर एक दिन लड़की के मां बाप अपनी बेटी को लेने आ जाते हैं । लड़के से बहुत कहासुनी होती है सास ससुर से। लड़की अपनी मां बाप की बेईज्जती सहन नहीं कर पाती और अपने पति पर हाँथ उठा देती है और गुस्से में समान पैक करके अपनी बेटी एंजल को लेकर माँ बाप के घर जाने को निकलती है तो लड़का कहता है। तू जा सकती है मगर मेरी बेटी एंजल तेरे साथ बिल्कुल नहीं जायेगी। लड़की के मां बाप लड़की से कहते है छोड़ दे इसकी बेटी को,
लड़की - नहीं मां, मुझे अब इसके सहारे तो जीना है फिर अपनी जिंदगी को कैसे इस दरिन्दे के हाथों छोड़ दूँ
माँ - आज तू चल...कल कोर्ट खुद तूझे तेरी बेटी दिलवा देगी।
लड़का - कोर्ट जाने की जरूरत नहीं है। मेरी बेटी कोर्ट कभी नहीं जायेगी इसलिए तुम ले जा सकती हो।
लड़की तो गुस्से में थी इसलिए कुछ कहे बिना चली गई। लड़का भी कुछ देर बाद निकल जाता है घर से। तीन दिन बाद लड़के के पास लड़की का हस्ताक्षर किया हुआ तलाक पेपर आता है लड़का भी जल्दी से पेपर साईन करके वापस भेज देता है जैसे उसे भी जल्दी हो अपनी पत्नी छुटकारे का। इधर लड़का रोज फोन कर करके परेशान करता है अपनी पत्नी को ए कहकर,
देखा? मैंने कहा था न तूझे कोई लड़का नहीं मिलेगा? अब तूझे फिर मेरे पास ही आना होगा ।
लड़की इस बात को चैलेंज की तरह लेती है। इधर लड़की के घरवाले उससे समझा बुझाकर शादी के लिए तैयार करते हैं । वैसे लड़की बिलकुल नहीं चाहती थी फिर से शादी करना क्योंकि बेटी तो थी ही फिर क्या चाहिए था एक मां को मगर उसे उस दरिन्दे को जवाब भी देना था। इसलिये नफरत की आग मे जलकर वह दूसरी शादी के लिए तैयार हो जाती है
तलाक भी हो चुका था,
तलाक के बाद भी उसके पहले पति का फोन तो आता था मगर कयी दिन हो गये न फोन न कोई खबर आई थी उसकी
और इधर लड़की के घर मे जोर शोर से सगाई की तैयारी शुरू हो चुकी थी मगर
अचानक सगाई के एक दिन पहले लड़की के पास फोन आता है की..पुलीस थाने से की एक लवारीश लाश पड़ी मिली है और उसकी मोबाइल से आपका न0 मिला। हैरत की बात ए है की उस मोबाइल पे आपके अलावा कोई और न0 नहीं है। इसलिए आप एक बार आके लाश की शिनाख्त कर दीजिए।
लड़की अचानक परेशान हो जाती है और घर मे कीसी को न बताये बेटी को लेकर पुलिस स्टेशन पहुँच जाती है और देखते ही पहचान जाती है प्रिंस को। वह समझ नहीं पा रही थी की क्या करे और क्या कहे आखिर रिश्ता भी अब था ही कंहा
तलाक हो चुका था अब दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी थे बस कुछ रिश्ता था तो बेटी एंजल की वजह से,
मगर न जाने क्यों आज फिर से उसकी मासूम भरे चेहरे को देखकर उसपे फिर से वही प्यार आया जो पहले करती थी। मर चुका था प्रिंस मगर मासूमीएत अब भी वही थी चेहरे पर
वह प्रिंस जो कभी सिर्फ उसका था, लड़की न चाहते हुए भी रो पड़ती है। अभी तीन महीने भी तो नहीं हुए थे दोनों अलग हुए अचानक प्रिंस कैसे मर गया
फिर भी रोते हुए पुलिस को सबकुछ बताके कहती है कि
हाँ कभी हम पति पत्नी थे मगर अब हम तलाक लेकर अलग हो चुके थे।
वह इतना कह तो देती है मगर दिल मे हजारों सवाल लिए
वह जल्दी से अपने पुराने घर आती है। जहाँ एक बुढीया आके कहती है। लो बेटी ये चाभी आज से एक हफ्ते पहले प्रिंस ने दी थी । कहा की...पायल आये तो दे देना । फिर उसके बाद वह वापस नहीं आया। पायल जल्दी से घर खोलकर अंदर जाके देखती है..
पहली नजर दिवार जाती है जहाँ प्रिंस की तशबीर है और उसके उपर माला चढ़ा हुआ है और निचे लिखा था...I miss you payal forever
पायल गीरते गीरते बची..और जमीन पे बैठकें रोने लगी, अब वह सोचने लगी की...प्रिंस जानता था की वह मरने वाला है..मगर एक बात उसने मुझे क्यों छुपाई?
क्या मजबूरी थी अपनी बिमारी को छुपाने की आखिर मैं उसकी धर्मपत्नी थी
मैं जमीन आसमान एक कर देती मेरे प्रिंस को बचाने के लिए। फिर वह आलमारी खोलके देखती है तो वहाँ कुछ वसीयेत के कागजात जो उसने सारे अपनी पत्नी पायल और बेटी एंजल के नाम की थी,कुछ डाक्टर के पेपर थे और छोटी सी चिठ्ठी । लिखा था, मेरी मोहब्बत मेरी जिंदगी मेरी अच्छी पायल, sorry पगली,
वादा करके भी मुकर गया मैं, जिंदगी भर साथ साथ निभाने के वादे करके बिच राह से ही मैं भाग निकला मै
शायद तुम्हें ए चिठ्ठी मिले या न मिले मगर कभी मिले तो बस इतना याद रखना की प्रिंस सिर्फ तुम्हारा था, शायद तुम्हारी शादी हो चुकी होंगी पर एंजल को कभी खुद से जुदा मत करना।और हो सकता है कि शादी के बाद भी कुछ पल मेरी याद आये तो हमारी बेटी एंजलीज़ की
धडकनो को सुनना जरा गौर से...वहाँ तुम्हें मैं मिलूंगा सदा धडकते हुए।
तुम सदा खुश रहना, हैरान हो न, एक प्रेमी अचानक कैसे हैवान हो गया? पागल...मैं इतना नहीं करता तो तू मुझे कैसे नफरत करती। कैसे तुम मुझे छोड़ती हाँ ?
मैं मरने से पहले तुम माँ बेटी को सुरक्षित देखना चाहता था,
मरने का बिलकुल डर या दुख नही था मुझे
मगर तुम दोनों की फिकर थी मुझे ।
इसलिए एक आशिक एक पति अपनों की फिकर मे दरिन्दा बन गया... तुम्हें भला बुरा कहा तुम्हारे मम्मी पापा को बुरा भला कहा मगर पगली...
मै बुरा नहीं था रे...बस जिंदगी मेरे खिलाफ थी
मैंने खुद की मौत की आहट सुन चुका था इसलिये मैंने अपनी जिंदगी के आखरी पलो मे अपनी पूरी ताकत लगा दी तुम्हारे नफरत के काबिल बनने का।
ताकी जब मेरे साँसें निकले तो तुम्हारी साँसें सलामत रहे
तुम मेरी बेटी की परवारीश कर सको
मुझे मांफ कर देना । बस तुम्हारा हैवान पति
पायल रोते रोते बेटी को लेकर उस डाक्टर के पास पहुँचती है जिसका पेपर घर मे मिला था,
पागलपन की हद से गुजर कर पायल एक साथ हजारों सवाल पूछती है डाक्टर से।
डाक्टर- बेटी - आज से 5 महीने पहले मेरे पास उसके दोस्त बेहोशी के हालात मे लाये थे। होश आने पर पूछा तो कहा की..पता नहीं डाक्टर मैं जल्दी थक जाता हूँ।
सिने मे कभी कभी सांसे रूक सी जाती है। कभी दर्द बरदास्त से बाहर होता है। मैंने ठीक से जांच की तो पाया की प्रिंस के दिल मे एक सुराख है और आखिरी स्टेज की ओर था, ऐसा नहीं की उसे बचाया नहीं जा सकता था मगर बड़ा जिद्दी निकला दिल का सुराख वाला, कहता है मेरे इलाज पे कम से कम 20 लाख तो लग जाएंगे। कहीं से उधार ले भी सकता हूँ मगर फिर भी नहीं बचा तो सारी मुसीबत मेरी मासूम बिबी और मेरी धड़कन मेरी बेटी पर आयेगी, बिधवा का मतलब ही सबके बिच खिलौना होना है जब आपके पास कुछ न हो,
मेरे बचने की उम्मीद है भी और नहीं भी
अकेला होता तो आज जिंदगी और मौत की जुआ जरूर खेलता डाक्टर साहब
लेकिन अब मैं जुआ खेलने की हालत मे नहीं रहा क्योंकि मेरे साथ मेरी और दो अनमोल जिंदगी जुड़ी है
मेरी अच्छी पत्नी और मेरी प्यारी बेटी
मेरे पास थोडे बहुत पैसे जरूर है मगर मैं मेरे इलाज से बेहतर मैं उन दोनों की जिंदगी सुरक्षित करके मरना चाहता हूँ। ताकि मेरे जाने के बाद भी वह सर उठाके इज्जत की जिंदगी जी सके,।
सच बेटी पागल था जिद्दी था मगर सिर्फ तुम दोनों के लिए। वरना ऐसी अद्भुत मोहब्बत देखने को कहाँ मिलती है इस जहाँ में।
पायल खुद को सम्भाल नहीं पा रही थी पागलों जैसी हालत हो चुकी थी
फिर रोते बिलखते जल्दी से जाके थाने से प्रिंस की पार्थिव शरीर लेती है और फिर अपने पुराने घर जाके गाँव वालों से मिलके पूरे सम्मान के साथ खुद अग्नि देती है प्रिंस को।
पायल फिर वापस अपने मां बाप के घर जाकर उनको प्रिंस का खत देती है फिर जवाब का इंतजार किये बिना
बिदा लेकर सदा सदा के लिए अपने घर आ गई अपनी बेटी के साथ जहाँ वह थी उन दोनों की बेटी और सिर्फ प्रिंस था...
तभी एंजल चिल्लाती है । अरे माँ तू कहाँ खो गई
बता न मेरे पापा कैसे बोलते थे।
पायल अपनी पलकों के आशुओ को साफ करते हुए भरे गले से मुस्कुराके कहती है बेटी से
करिब आ मै तेरे पापा मेरे प्रिंस की अवाज तूझे सुनाता हूँ.. तेरी धडकनो में
एंजल -मेरी धडकनो में? कैसे मां
पायल - तेरे पापा कहते थे की मेरी धड़कन मेरी बेटी को सदा सम्भाल के रखना । कभी भी मेरी अवाज सुनने को दिल करे...बेटी की धडकनो को सुन लेना
एंजल बड़ी मासूमीएत से अपनी मां से लिपटकर कहते है
तब तो मेरी धड़कन को सदा धड़कना होगा मेरे पापा के लिए है न मां?
पायल जोर से बेटी को अपने सीने मे लिपटाकर कहती है
हाँ मेरी गुड़िया हाँ |
Sunday, September 8, 2019
कछुए और खरगोश की कहानी (नया वर्जन)
आपने कछुए और खरगोश की कहानी ज़रूर सुनी होगी, जो कि संक्षेप में इस प्रकार है:
एक बार खरगोश को अपनी तेज चाल पर घमंड हो गया और वह जो कोई मिलता उससे रेस लगाने के लिए चुनौती देता रहता।
कछुए ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली।
रेस हुई। खरगोश तेजी से भागा और काफी आगे जाने पर पीछे मुड़ कर देखा, कछुआ कहीं आता नज़र नहीं आया, उसने मन ही मन सोचा कछुए को तो यहाँ तक आने में बहुत समय लगेगा, चलो थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, और वह एक पेड़ के नीचे लेट गया। लेटे-लेटे कब उसकी आँख लग गयी पता ही नहीं चला।
उधर कछुआ धीरे-धीरे मगर लगातार चलता रहा। बहुत देर बाद जब खरगोश की आँख खुली तो कछुआ फिनिशिंग लाइन तक पहुँचने वाला था। खरगोश तेजी से भागा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कछुआ रेस जीत गया।
Moral of the story: Slow and steady wins the race. धीमा और लगातार चलने वाला रेस जीतता है।
ये कहानी तो हम सब जानते हैं, अब आगे की कहानी देखते हैं:
रेस हारने के बाद खरगोश निराश हो जाता है, वो अपनी हार पर चिंतन करता है और उसे समझ में आ गया कि वह over-confident होने के कारण यह रेस हार गया…उसे अपनी मंजिल तक पहुँच कर ही रुकना चाहिए था।
अगले दिन वह फिर से कछुए को दौड़ की चुनौती देता है। कछुआ पहली रेस जीत कर आत्मविश्वाश से भरा होता है और तुरंत मान जाता है।
रेस होती है, इस बार खरगोश बिना रुके अंत तक दौड़ता जाता है, और कछुए को एक बहुत बड़े अंतर से हराता है।
Moral of the story: Fast and consistent will always beat the slow and steady. / तेज और लगातार चलने वाला धीमे और लगातार चलने वाले से हमेशा जीत जाता है।
यानि slow and steady होना अच्छा है लेकिन fast and consistent होना और भी अच्छा है।
For example, अगर किसी ऑफिस में इन दो टाइप्स के लोग हैं तो वे ज्यादा तेजी से आगे बढ़ते हैं जो fast भी हैं और अपने फील्ड में consistent भी हैं।
कहानी अभी बाकी है …. :)
इस बार कछुआ कुछ सोच-विचार करता है और उसे ये बात समझ आती है कि जिस तरह से अभी रेस हो रही है वह कभी-भी इसे जीत नहीं सकता।
वह एक बार फिर खरगोश को एक नयी रेस के लिए चैलेंज करता है, पर इस बार वह रेस का रूट अपने मुताबिक रखने को कहता है। खरगोश तैयार हो जाता है।
रेस शुरू होती है। खरगोश तेजी से तय स्थान की ओर भागता है, पर उस रास्ते में एक तेज धार नदी बह रही होती है, बेचारे खरगोश को वहीँ रुकना पड़ता है। कछुआ धीरे-धीरे चलता हुआ वहां पहुँचता है, आराम से नदी पार करता है और लक्ष्य तक पहुँच कर रेस जीत जाता है।
Moral of the story: Know your core competencies and work accordingly to succeed. / पहले अपनी strengths को जानो और उसके मुताबिक काम करो जीत ज़रुर मिलेगी.
For Ex: अगर आप एक अच्छे वक्ता हैं तो आपको आगे बढ़कर ऐसे अवसरों को लेना चाहिए जहाँ public speaking का मौका मिले। ऐसा करके आप अपनी organization में तेजी से ग्रो कर सकते हैं।
कहानी अभी भी बाकी है ….. :)
इतनी रेस करने के बाद अब कछुआ और खरगोश अच्छे दोस्त बन गए थे और एक दूसरे की ताकत और कमजोरी समझने लगे थे। दोनों ने मिलकर विचार किया कि अगर हम एक दूसरे का साथ दें तो कोई भी रेस आसानी से जीत सकते हैं।
इसलिए दोनों ने आखिरी रेस एक बार फिर से मिलकर दौड़ने का फैसला किया, पर इस बार as a competitor नहीं बल्कि as a team काम करने का निश्चय लिया।
दोनों स्टार्टिंग लाइन पर खड़े हो गए….get set go…. और तुरंत ही खरगोश ने कछुए को ऊपर उठा लिया और तेजी से दौड़ने लगा। दोनों जल्द ही नदी के किनारे पहुँच गए। अब कछुए की बारी थी, कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ बैठाया और दोनों आराम से नदी पार कर गए। अब एक बार फिर खरगोश कछुए को उठा फिनिशिंग लाइन की ओर दौड़ पड़ा और दोनों ने साथ मिलकर रिकॉर्ड टाइम में रेस पूरी कर ली। दोनों बहुत ही खुश और संतुष्ट थे, आज से पहले कोई रेस जीत कर उन्हें इतनी ख़ुशी नहीं मिली थी।
Moral of the story: cooperation is better than competitionअर्थात Team Work is always better than individual performance. / टीम वर्क हमेशा व्यक्तिगत प्रदर्शन से बेहतर होता है। Team work के लिए आपस में संवाद ,एक दूसरे की विशिष्टता को जानना और strategy के लिए मतैक्य होना बहुत ही आवश्यक है I
किसी भी मैच में Individually आप चाहे जितने बड़े performer हों लेकिन अकेले दम पर मैच नहीं जिता सकते।
अगर लगातार जीतना है तो आपको टीम में काम करना सीखना होगा, आपको अपनी काबिलियत के अलावा दूसरों की ताकत को भी समझना होगा। और जब जैसी situation हो, उसके हिसाब से टीम की strengths को use करना होगा।
इस कहानी में बहुत सी शिक्षाएं हैं केवल ध्यान देने की बात है । खरगोश और कछुआ दोनों ही अपनी हार के बाद निराश हो कर बैठ नहीं गए, बल्कि उन्होंने स्थिति को समझने की कोशिश की और अपने आप को नयी चुनौती के लिए तैयार किया। जहाँ खरगोश ने अपनी हार के बाद और अधिक मेहनत की वहीँ कछुए ने अपनी हार को जीत में बदलने के लिए अपनी strategy में बदलाव किया।
जब कभी आप फेल हों तो या तो अधिक मेहनत करें या अपनी रणनीति में बदलाव लाएं या दोनों ही करें, पर कभी भी हार को आखिरी मान कर निराश न हों…बड़ी से बड़ी हार के बाद भी जीत हासिल की जा सकती है!
Wednesday, August 21, 2019
मै न होता तो क्या होता
"मैं ना होता तो क्या होता" पर एक प्रसंग ।

एक बार हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम से कहा कि अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा, तब मुझे लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर मैं गदगद हो गया ! यदि मैं कूद पड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो क्या होता ?
बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मुझे भी लगता कि यदि मै न होता तो सीताजी को कौन बचाता ? परन्तु आज आपने उन्हें बचाया ही नहीं बल्कि बचाने का काम रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब मै समझ गया कि आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं, किसी का कोई महत्व नहीं है !
आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो मै बड़ी चिंता मे पड़ गया कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है तो मै क्या करुं ?
पर जब रावण के सैनिक तलवार लेकर मुझे मारने के लिये दौड़े तो मैंने अपने को बचाने की तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो मै समझ गया कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया !
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो मैं गदगद् हो गया कि उस लंका वाली संत त्रिजटा की ही बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !
इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...
मै न होता तो क्या होता
Saturday, August 17, 2019
ऐसी होती है "माँ"
एक माँ चटाई पर लेटी आराम से सो रही थी,
मीठे सपनों से अपने मन को भिगो रही थी...
तभी उसका बच्चा यूँ ही घूमते हुये समीप आया,
माँ के तन को छूकर हल्के हल्के से हिलाया...
माँ अलसाई सी चटाई से बस थोड़ा उठी ही थी,
तभी उस नन्हें ने हलवा खाने की जिद कर दी...
माँ ने उसे पुचकारा और अपनी गोदी में ले लिया,
फिर पास ही रखे ईटों के चूल्हे का रुख किया...
फिर उसने चूल्हे पर एक छोटी सी कढाई रख दी,
और आग जलाकर कुछ देर मुन्ने को ताकती रही...
फिर बोली बेटा जब तक उबल रहा है ये पानी,
क्या सुनोगे तब तक कोई परियों बाली कहानी...
मुन्ने की आंखें अचानक खुशी से थी खिल गयी,
जैसे उसको कोई मुँह मांगी मुराद ही मिल गयी...
माँ उबलते हुये पानी में कल्छी ही चलती रही,
परियों का कोई किस्सा मुन्ने को सुनाती रही...
फिर वो बच्चा उन परियों में ही जैसे खो गया,
चटाई पर बैठे बैठे ही लेटा और फिर वहीं सो गया...
माँ ने उसे गोद में ले लिया और धीरे से मुस्कायी,
फिर न जाने क्यूँ उसकी आंख भर आयी...
जैसा दिख रहा था वहां पर, सब वैसा नहीं था,
घर में रोटी की खातिर एक पैसा भी नहीं था...
राशन के डिब्बों में तो बस सन्नाटा पसरा था,
कुछ बनाने के लिए घर में कहाँ कुछ धरा था...?
न जाने कब से घर में चूल्हा ही नहीं जला था,
चूल्हा भी तो माँ के आंसुओं से ही बुझा था...
फिर मुन्ने को वो बेचारी हलवा कहां से खिलाती,
अपने जिगर के टुकड़े को रोता भी कैसे देख पाती...
अपनी मजबूरी उस नन्हें मन को मां कैसे समझाती,
या फिर फालतू में ही मुन्नें पर क्यों झुंझलाती...?
हलवे की बात वो कहानी में टालती रही,
जब तक वो सोया नहीं बस पानी उबालती रही...
ऐसी होती है "माँ"
Tuesday, July 2, 2019
इंसान की काबिलियत
इंसान की काबिलियत
एक बार एक टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे|
बच्चों को कुछ नया सिखाने के लिए टीचर ने जेब से 100 रुपये का एक नोट निकाला|
अब बच्चों की तरफ वह नोट दिखाकर कहा - क्या आप लोग बता सकते हैं कि यह कितने रुपये का नोट है ?
सभी बच्चों ने कहा - “100 रुपये का”
टीचर : इस नोट को कौन कौन लेना चाहेगा ? सभी बच्चों ने हाथ खड़ा कर दिया|
अब उस टीचर ने उस नोट को मुट्ठी में बंद करके बुरी तरह मसला जिससे वह नोट बुरी तरह कुचल सा गया|
अब टीचर ने फिर से बच्चों को नोट दिखाकर कहा कि अब यह नोट कुचल सा गया है अब इसे कौन लेना चाहेगा ?
सभी बच्चों ने फिर हाथ उठा दिया|
अब उस टीचर ने उस नोट को जमीन पर फेंका और अपने जूते से बुरी तरह कुचला|
फिर टीचर ने नोट उठाकर फिर से बच्चों को दिखाया और पूछा कि अब इसे कौन लेना चाहेगा ?
सभी बच्चों ने फिर से हाथ उठा दिया|
अब टीचर ने कहा कि बच्चों आज मैंने तुमको एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ाया है|
ये 100 रुपये का नोट था, जब मैंने इसे हाथ से कुचला तो ये नोट कुचल गया लेकिन इसकी कीमत 100 रुपये ही रही, इसके बाद जब मैंने इसे जूते से मसला तो ये नोट गन्दा हो गया लेकिन फिर भी इसकी कीमत 100 रुपये ही रही|
ठीक वैसे ही इंसान की जो कीमत है और इंसान की जो काबिलियत है वो हमेशा वही रहती है|
आपके ऊपर चाहे कितनी भी मुश्किलें आ जाएँ, चाहें जितनी मुसीबतों की धूल आपके ऊपर गिरे लेकिन आपको अपनी कीमत नहीं गंवानी है|
आप कल भी बेहतर थे और आज भी बेहतर हैं.
एक बार एक टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे|
बच्चों को कुछ नया सिखाने के लिए टीचर ने जेब से 100 रुपये का एक नोट निकाला|
अब बच्चों की तरफ वह नोट दिखाकर कहा - क्या आप लोग बता सकते हैं कि यह कितने रुपये का नोट है ?
सभी बच्चों ने कहा - “100 रुपये का”
टीचर : इस नोट को कौन कौन लेना चाहेगा ? सभी बच्चों ने हाथ खड़ा कर दिया|
अब उस टीचर ने उस नोट को मुट्ठी में बंद करके बुरी तरह मसला जिससे वह नोट बुरी तरह कुचल सा गया|
अब टीचर ने फिर से बच्चों को नोट दिखाकर कहा कि अब यह नोट कुचल सा गया है अब इसे कौन लेना चाहेगा ?
सभी बच्चों ने फिर हाथ उठा दिया|
अब उस टीचर ने उस नोट को जमीन पर फेंका और अपने जूते से बुरी तरह कुचला|
फिर टीचर ने नोट उठाकर फिर से बच्चों को दिखाया और पूछा कि अब इसे कौन लेना चाहेगा ?
सभी बच्चों ने फिर से हाथ उठा दिया|
अब टीचर ने कहा कि बच्चों आज मैंने तुमको एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ाया है|
ये 100 रुपये का नोट था, जब मैंने इसे हाथ से कुचला तो ये नोट कुचल गया लेकिन इसकी कीमत 100 रुपये ही रही, इसके बाद जब मैंने इसे जूते से मसला तो ये नोट गन्दा हो गया लेकिन फिर भी इसकी कीमत 100 रुपये ही रही|
ठीक वैसे ही इंसान की जो कीमत है और इंसान की जो काबिलियत है वो हमेशा वही रहती है|
आपके ऊपर चाहे कितनी भी मुश्किलें आ जाएँ, चाहें जितनी मुसीबतों की धूल आपके ऊपर गिरे लेकिन आपको अपनी कीमत नहीं गंवानी है|
आप कल भी बेहतर थे और आज भी बेहतर हैं.
संस्कार - एक कहानी
संस्कार - एक कहानी
एक गांव में एक बहुत समझदार और संस्कारी औरत रहती थी।
एक बार वह अपने बेटे के साथ सुबह-सुबह कहीं जा रही थी तभी एक पागल औरत उन दोनों मां-बेटे के रास्ते में आ गई और उस लड़के की मां को बहुत बुरा-भला कहने लगी।
इस पागल औरत ने लड़के की मां को बहुत सारे अपशब्द कहे लेकिन फिर भी उस औरत की बातों का मां पर कोई असर नहीं हुआ और वह मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई।
जब उस पागल औरत ने देखा कि इस औरत पर तो उसकी बातों का कोई असर ही नहीं हो रहा है, तो वह और भी गुस्सा हो गई और उसने सोचा कि मैं और ज्यादा बुरा बोलती हूं।
अब वो पागल औरत उस लड़के की मां, उसके पति और परिवार के लिए भला-बुरा कहने लगी।
लड़के की मां फिर भी बिना कुछ बोले आगे बढ़ते रही।
काफी देर भला-बुरा कहने के बाद भी जब सामने से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो पागल औरत थककर लड़के की मां के रास्ते से हट गई और दूसरे रास्ते पर चली गई।
उस औरत के जाते ही बेटे ने अपनी मां से पूछा कि मां उस औरत ने आपको इतना बुरा-भला कहा, पिताजी और घर के अन्य लोगों तक के लिए बुरी बातें कही, आपने उस दुष्ट की बातों का कोई जवाब क्यों नहीं दिया ??
वो औरत कुछ भी जो मन में आया बोलती रही और आप मुस्कुराती रही, क्या आपको उसकी बातों से जरा भी कष्ट नहीं हुआ ??
उस समय मां ने बेटे को कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप घर चलने को कहा।
जब दोनों अपने घर के अंदर पहुच गए तब मां ने कहा कि तुम यहा बैठो, मैं आती हूं।
कुछ देर बाद मां अपने कमरे से कुछ मैले कपड़े लाई और बेटे को बोली कि यह लो, तुम अपने कपड़े उतारकर ये कपड़े पहन लो।
इस पर बेटे ने कहा कि ये कपड़े तो बहुत ही गंदे हो रहे हैं और इनमें से तो तेज दुर्गंध आ रही है। बेटे ने उन मैले कपड़ों को हाथ में लेते ही उन्हें दूर फेंक दिया।
अब मां ने बेटे को समझाया कि जब कोई तुमसे बिना मतलब उलझता है और भला-बुरा कहता है, तब उसके मैले शब्दों का असर क्या तुम्हें अपने साफ-सुथरे मन पर होने देना चाहिए ???
ऐसे समय में गुस्सा होकर अपना साफ-सुथरा मन क्यों खराब करना ???
किसी के फेंके हुए मैले अपशब्द हमें अपने मन में धारण करके अपना मन नहीं खराब करना चाहिए और न ही ऐसी किसी बात पर प्रतिक्रिया देकर अपना समय ही नष्ट करना चाहिए।
जिस तरह तुम अपने साफ-सुथरे कपड़ों की जगह ये मैले कपड़े धारण नहीं कर सकते, उसी तरह मैं भी उस औरत के फेंके हुए मैले शब्दों को अपने साफ मन में कैसे धारण करती ???
यही वजह थी कि मुझे उसकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।
एक बार वह अपने बेटे के साथ सुबह-सुबह कहीं जा रही थी तभी एक पागल औरत उन दोनों मां-बेटे के रास्ते में आ गई और उस लड़के की मां को बहुत बुरा-भला कहने लगी।
इस पागल औरत ने लड़के की मां को बहुत सारे अपशब्द कहे लेकिन फिर भी उस औरत की बातों का मां पर कोई असर नहीं हुआ और वह मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई।
जब उस पागल औरत ने देखा कि इस औरत पर तो उसकी बातों का कोई असर ही नहीं हो रहा है, तो वह और भी गुस्सा हो गई और उसने सोचा कि मैं और ज्यादा बुरा बोलती हूं।
अब वो पागल औरत उस लड़के की मां, उसके पति और परिवार के लिए भला-बुरा कहने लगी।
लड़के की मां फिर भी बिना कुछ बोले आगे बढ़ते रही।
काफी देर भला-बुरा कहने के बाद भी जब सामने से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो पागल औरत थककर लड़के की मां के रास्ते से हट गई और दूसरे रास्ते पर चली गई।
उस औरत के जाते ही बेटे ने अपनी मां से पूछा कि मां उस औरत ने आपको इतना बुरा-भला कहा, पिताजी और घर के अन्य लोगों तक के लिए बुरी बातें कही, आपने उस दुष्ट की बातों का कोई जवाब क्यों नहीं दिया ??
वो औरत कुछ भी जो मन में आया बोलती रही और आप मुस्कुराती रही, क्या आपको उसकी बातों से जरा भी कष्ट नहीं हुआ ??
उस समय मां ने बेटे को कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप घर चलने को कहा।
जब दोनों अपने घर के अंदर पहुच गए तब मां ने कहा कि तुम यहा बैठो, मैं आती हूं।
कुछ देर बाद मां अपने कमरे से कुछ मैले कपड़े लाई और बेटे को बोली कि यह लो, तुम अपने कपड़े उतारकर ये कपड़े पहन लो।
इस पर बेटे ने कहा कि ये कपड़े तो बहुत ही गंदे हो रहे हैं और इनमें से तो तेज दुर्गंध आ रही है। बेटे ने उन मैले कपड़ों को हाथ में लेते ही उन्हें दूर फेंक दिया।
अब मां ने बेटे को समझाया कि जब कोई तुमसे बिना मतलब उलझता है और भला-बुरा कहता है, तब उसके मैले शब्दों का असर क्या तुम्हें अपने साफ-सुथरे मन पर होने देना चाहिए ???
ऐसे समय में गुस्सा होकर अपना साफ-सुथरा मन क्यों खराब करना ???
किसी के फेंके हुए मैले अपशब्द हमें अपने मन में धारण करके अपना मन नहीं खराब करना चाहिए और न ही ऐसी किसी बात पर प्रतिक्रिया देकर अपना समय ही नष्ट करना चाहिए।
जिस तरह तुम अपने साफ-सुथरे कपड़ों की जगह ये मैले कपड़े धारण नहीं कर सकते, उसी तरह मैं भी उस औरत के फेंके हुए मैले शब्दों को अपने साफ मन में कैसे धारण करती ???
यही वजह थी कि मुझे उसकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।
जागरूक माँ - खुशहाल विवाहिता बेटी
जागरूक माँ - खुशहाल विवाहिता बेटी
एक सब्जी की दुकान पर जहाँ से मैं अक्सर सब्जियाँ लेता हूँ, जब मैं पहुँचा तो सब्जी वाली महिला फोन पर किसी से बात कर रही थी अत: मैंने कुछ क्षण रुकना ही ठीक समझा, उस महिला ने रुकने का संकेत भी किया तो रुक गया और उसकी बात मेरे कान में भी पड़ रही थी।
वह अपनी उस बेटी से बात कर रही थी जिसकी शादी मात्र तीन चार दिन पहले ही हुई थी।
वह कह रही थी "देखो बेटी मायके की याद आती है यह तो ठीक है लेकिन ससुराल ही अब तुम्हारा अपना घर है"। तुम्हें अब अपना सारा ध्यान केवल अपने घर के लिए ही लगाना है। बार बार फोन मत किया करो और अपने ससुराल वालों से छिपकर तो बिलकुल भी नहीं।
जब भी यहाँ फोन करना तो सास या पति के सामने करना।
तुम अपने फोन पर मेरे फोन आने का इंतजार कभी मत करना। मुझे जब भी बात करना होगा तो मैं तुम्हारी सास के नंबर पर लगाऊँगी।तब तुम भी बात कर लिया करना।
बेटी! "अब ससुराल में हो जरा जरा सी बात पर तुनकना छोड़ दो, सहनशक्ति रखो। अपना घर कैसे चलाना है ये सब अपनी सास से सीखो। एक बात ध्यान रखो प्यार एवं इज्जत दोगी तो ही स्नेह और इज्जत पाओगी। ठीक है। सुखी रहो"
मैंने प्रशंसा के भाव में कहा "बहुत सुंदर समझाया आपने"
उस महिला ने कहा कि "बहन एवं माँ को बेटी के परिवार में कभी भी अनावश्यक दखल नहीं देनी चाहिये"। उन्हें अपने घर की बातों को भी बिना मतलब के इधर उधर नहीं करना चाहिये। वहाँ यदि कोई समस्या हो तो समस्या का हल खुद ही ढूँढ़ो।
मैं उस देवी का मुँह देखता रह गया। सभी माँ को इसी तरह से सोचना चाहिए ताकि बेटी अपने ससुराल रूपी घर को खुद का ही घर समझे।
स्वर्ग तो खुद के आचरण, संस्कार, व्यवहार एवं किरदार में छिपा है लेकिन हिरन के समान मृगतृष्णा में भ्रमित हैं और इसी कारण स्वर्ग जैसा घर नरक में तब्दील होकर रह गया होता है।
एक सब्जी की दुकान पर जहाँ से मैं अक्सर सब्जियाँ लेता हूँ, जब मैं पहुँचा तो सब्जी वाली महिला फोन पर किसी से बात कर रही थी अत: मैंने कुछ क्षण रुकना ही ठीक समझा, उस महिला ने रुकने का संकेत भी किया तो रुक गया और उसकी बात मेरे कान में भी पड़ रही थी।
वह अपनी उस बेटी से बात कर रही थी जिसकी शादी मात्र तीन चार दिन पहले ही हुई थी।
वह कह रही थी "देखो बेटी मायके की याद आती है यह तो ठीक है लेकिन ससुराल ही अब तुम्हारा अपना घर है"। तुम्हें अब अपना सारा ध्यान केवल अपने घर के लिए ही लगाना है। बार बार फोन मत किया करो और अपने ससुराल वालों से छिपकर तो बिलकुल भी नहीं।
जब भी यहाँ फोन करना तो सास या पति के सामने करना।
तुम अपने फोन पर मेरे फोन आने का इंतजार कभी मत करना। मुझे जब भी बात करना होगा तो मैं तुम्हारी सास के नंबर पर लगाऊँगी।तब तुम भी बात कर लिया करना।
बेटी! "अब ससुराल में हो जरा जरा सी बात पर तुनकना छोड़ दो, सहनशक्ति रखो। अपना घर कैसे चलाना है ये सब अपनी सास से सीखो। एक बात ध्यान रखो प्यार एवं इज्जत दोगी तो ही स्नेह और इज्जत पाओगी। ठीक है। सुखी रहो"
मैंने प्रशंसा के भाव में कहा "बहुत सुंदर समझाया आपने"
उस महिला ने कहा कि "बहन एवं माँ को बेटी के परिवार में कभी भी अनावश्यक दखल नहीं देनी चाहिये"। उन्हें अपने घर की बातों को भी बिना मतलब के इधर उधर नहीं करना चाहिये। वहाँ यदि कोई समस्या हो तो समस्या का हल खुद ही ढूँढ़ो।
मैं उस देवी का मुँह देखता रह गया। सभी माँ को इसी तरह से सोचना चाहिए ताकि बेटी अपने ससुराल रूपी घर को खुद का ही घर समझे।
स्वर्ग तो खुद के आचरण, संस्कार, व्यवहार एवं किरदार में छिपा है लेकिन हिरन के समान मृगतृष्णा में भ्रमित हैं और इसी कारण स्वर्ग जैसा घर नरक में तब्दील होकर रह गया होता है।
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