लखनऊ विश्वविद्यालय के पीछे गोमती तट पर दीपा प्रकाश की गोद में सिर रख कर लेटी हुई थी. उसकी आंखों में अनगिनत सपने समाये हुए थे और चेहरे पर असीम शांति छायी हुई थी. प्रकाश के सानिध्य में उसे सुख के साथ-साथ सुरक्षा की अनुभूति भी होती थी.
अचानक आये तेज़ हवा के झोंके ने दीपा की लटों को बिखरा दिया. उसका पूरा चेहरा बालों से यूं ढंक गया जैसे बदली से चांद. प्रकाश ने हाथ बढ़ाकर उसकी बिखरी हुई लटों को संवारा, फिर उसके चेहरे को दोनों हाथों के बीच लेते हुए बोला, “दीप, हम लोग कब तक यूं छिप-छिप कर मिलते रहेंगे? आख़िर कब तुम इस प्रकाश के आंगन में प्रकाश बिखेरने के लिए राज़ी होगी.”
दीपा अपनी आंखें प्रकाश के चेहरे पर टिकाते हुए मुस्कुरायी, “प्रकाश तो दीप का अंतिम लक्ष्य होता है. प्रकाश के बिना उसका अस्तित्व अर्थहीन है, लेकिन…”
“लेकिन क्या?” प्रकाश अधीर हो उठा.
“तुम तो जानते हो, जो रिसर्च मैं कर रही हूं, वह कितना महत्वपूर्ण है. थीसिस पूरी करने के लिए मुझे 24 घंटे का समय भी कम पड़ रहा है. ऐसे में अगर मैं शादी कर लेती हूं तो अपने दायित्वों को पूरा नहीं कर पाऊंगी.” दीपा ने अपनी तर्जनी प्रकाश के होंठों पर टिकाते हुए कहा.
“हमारे घर में इतने नौकर हैं कि तुम्हें कोई काम करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. तुम आराम से अपनी थीसिस पूरी करना.” प्रकाश ने समझाने की कोशिश की.
दीपा खिलखिलाते हुए उठ बैठी और कपड़ों में लगी रेत को झाड़ते हुए बोली,?“जानती हूं बुद्धूराजा, लेकिन तुम भी ये जान लो कि मैं जो भी काम करती हूं, पूर्णता के साथ करती हूं. जब तक थीसिस लिख रही हूं स़िर्फ थीसिस लिखूंगी. जब प्यार करूंगी तो स़िर्फ प्यार करूंगी. उस समय मैं किसी नौकर को न तो तुम्हारे पास चाय की प्याली लेकर फटकने दूंगी और न ही किसी को तुम्हारे कपड़े छूने दूंगी. स़िर्फ मैं और तुम. हमारे बीच तीसरा कोई नहीं आने पाएगा. इसलिए फ़िलहाल थोड़ा-सा इंतज़ार और करो. मेरी थीसिस बस पूरी होने ही वाली है. उसके बाद हम अपने-अपने घरवालों को अपने प्यार के बारे में बता देंगे.”
“ठीक है भई, जैसी आज्ञा.” प्रकाश ने सिर झुकाते हुए इस अंदाज़ में कहा कि दीपा एक बार फिर खिलखिलाकर हंस पड़ी.
दीपा और प्रकाश बी.एससी. में सहपाठी थे. एम.बी.ए. करने के पश्चात् प्रकाश एक मल्टीनेशनल कंपनी में एक्ज़िक्यूटिव हो गया था. दीपा को एम.एससी के पश्चात् यू.जी.सी. से स्कॉलरशिप मिल गयी थी. एम.एससी में उसने सर्वोच्च अंक हासिल किये थे. इसलिए प्रो़फेसर कुमार सहर्ष उसे अपने अधीन रिसर्च कराने के लिए सहमत हो गए थे.
आकर्षक व्यक्तित्व के धनी प्रो़फेसर कुमार खानदानी व्यक्ति थे. पूरा विश्वविद्यालय उनकी योग्यता का कायल था. उनके अधीन रिसर्च करना सभी शोधार्थियों का सपना रहता था. सभी का मानना था कि प्रो. कुमार अगर मिट्टी पर भी हाथ रख देंगे तो वो सोना हो जाएगी.
दीपा पूरी मेहनत के साथ अपनी थीसिस लिखने में जुट गयी. दो वर्ष तक तो सब ठीक रहा. प्रो. कुमार उसका मार्गदर्शन करते रहे, किंतु तीसरे वर्ष जाने क्यूं वे उपेक्षा दिखाने लगे थे. विश्वविद्यायल की लायब्रेरी के साथ-साथ दीपा इंटरनेट के माध्यम से दूसरे देशों की लायब्रेरी को भी खंगाल डालती. रात-रात भर जाग कर पेपर्स तैयार करती, लेकिन प्रो. कुमार के पास उन्हें पढ़ने का समय ही नहीं रहता. महीनों वे उनकी अलमारी में अनछुए से पड़े रहते.
दीपा की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक उनके व्यवहार में परिवर्तन क्यूं आ गया है. उसने कई बार पूछने की कोशिश की, लेकिन प्रो. कुमार बात टाल जाते. तीन वर्ष पश्चात् स्कॉलरशिप मिलनी बंद हो गयी, लेकिन प्रो. कुमार की उपेक्षा के कारण दीपा की थीसिस पूरी नहीं हो पायी थी.
इसी बीच उसकी मुलाक़ात प्रकाश से हो गयी. दोनों एक-दूसरे को पहले से ही पसंद करते थे. शीघ्र ही दोनों में प्यार के अंकुर फूट गये. प्रकाश जल्दी ही शादी कर घर बसाना चाहता था, लेकिन दीपा थीसिस पूरी होने के बाद ही शादी करना चाहती थी.
प्रकाश का आग्रह देख उसने दिन-रात मेहनत कर थीसिस पूरी कर ली थी. उसे प्रो. कुमार को दिए हुए एक महीना हो गया था, लेकिन उन्होंने उसे अभी तक देखा भी नहीं था. इससे दीपा काफ़ी परेशान थी, क्योंकि उनकी संस्तुति के बिना दीपा को पी.एच.डी. की उपाधि नहीं मिल सकती थी.
उस दिन प्रकाश से मिलने के बाद दीपा ने प्रो. कुमार से स्पष्ट बात करने का निश्चय किया. अगले दिन मौक़ा देख कर उसने कहा, “सर, पिछले एक साल से मैं महसूस कर रही हूं कि आप मुझसे कुछ नाराज़ हैं.”
“ऐसी कोई बात नहीं है.” प्रो. कुमार ने उपेक्षा भरे स्वर में कहा.
“सर, अगर ऐसा नहीं है तो आप मेरी थीसिस को पढ़ क्यों नहीं रहे हैं? बताइये तो, क्या कमी है मेरी मेहनत में?” दीपा ने आग्रह किया.
“कमी बताने से क्या फ़ायदा?” प्रो. कुमार ने अपना चश्मा उतार कर मेज़ पर रख दिया.
“सर, आप आदेश करें. मैं उस कमी को हर हाल में पूरा करूंगी.” दीपा के स्वर में दृढ़ता झलक उठी.
प्रो. कुमार ने एक उचटती हुई दृष्टि दीपा के चेहरे पर डाली फिर बोले, “तुमने अपने गाइड को अभी तक गुरू दक्षिणा नहीं दी है.”
“बस इतनी-सी बात! अगर आप पहले बता देते तो मैं आपकी इच्छा कब की पूरी कर चुकी होती.” दीपा हल्का-सा मुस्कुरायी, फिर बोली, “बताइये, क्या गुरूदक्षिणा चाहिए आपको?”
“तुम अपने वादे से मुकर तो नहीं जाओगी?”
“सर, अगर आप आज्ञा करें तो मैं एकलव्य की तरह अपना अंगूठा काट कर आपके चरणों में अर्पित कर दूंगी.” दीपा की आंखों में सम्मान के चिह्न उभर आये.
“एकलव्य का अंगूठा…” प्रो. कुमार हल्का-सा मुस्कुराए फिर बोले, “यह उस ज़माने की बात थी. भावनाओं में बहकर एकलव्य ने अपना कैरियर बर्बाद कर डाला था. आज के युग में स़िर्फ कैरियर बनाने की बात सोची जाती है. आज गुरू और शिष्य दोनों ही प्रगतिशील विचारों के हैं. यदि गुरू कोई दक्षिणा लेता है तो बदले में शिष्य के कैरियर में चार चांद लगा देता है.”
“जानती हूं सर, आपके अधीन रिसर्च पूरी करने वाले को एक सम्मानजनक मुक़ाम अपने आप ही हासिल हो जाता है, इसीलिए तो मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए तत्पर हूं.” दीपा के स्वर से श्रद्धा झलक उठी.
यह सुन प्रो. कुमार अपनी आंखें बंद कुछ पल सोचते रहे, फिर फुसफुसाते हुए बोले,?“मुझे ़ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए, स़िर्फ उतना ही चाहिए जितना आजकल के दूसरे सुयोग्य गाइड लेते हैं.”
“क्या?”
“मेरे घरवाले कल बाहर जा रहे हैं. स़िर्फ दो रातों के लिए तुम मेरे घर आ जाओ. तुम्हारी थीसिस क्लीयर हो जायेगी.” प्रो. कुमार ने कहा.
जैसे अनेकों ज्वालामुखी एक साथ धधक उठे हों. जैसे सैकड़ों बिजलियां एक साथ गिर पड़ी हों. जैसे संपूर्ण ब्रह्मांड में विस्फोट हो गया हो. हतप्रभ दीपा का मुंह खुला-का-खुला रह गया. पलकें जैसे झपकना भूल गयीं. उसकी संपूर्ण चेतना जड़ हो गयी. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो कुछ भी उसके कानों ने सुना है, वो सत्य भी हो सकता है. उसके कानों में पिघला हुआ शीशा खौलने लगा था. काश, ऐसे वाक्यों के स्वर ध्वनिहीन हो जाते या कान श्रवणहीन.
“तुमने कोई उत्तर नहीं दिया.” तभी प्रो. कुमार ने?उसकी तंद्रा भंग कर दी.
संज्ञाशून्य दीपा की आंखों से अविरल अश्रुधार बह निकली. बहुत मुश्किल से उसके कंपकंपाते होंठों से स्वर फूटे, “सर, मैं आपकी बेटी के समान हूं.”
“ओह, कम ऑन बेबी, बी प्रैक्टिकल. आजकल गुरू-शिष्य का रिश्ता दोस्ती का होता है.” प्रो. कुमार भद्दे ढंग से मुस्कुराये, फिर अचानक ही उनका स्वर सख़्त हो गया, ⁛फैसला तुम्हारे हाथ में है. अगर मेरे साथ दोस्ती निभा दोगी तो मैं तुम्हारी ज़िंदगी संवार दूंगा, वरना अपनी इतने सालों की मेहनत पर पानी फिरा समझना.”
दीपा ने कोई उत्तर नहीं दिया. मुंह पर हाथ रख वो दौड़ती हुई वहां से चली गयी. सारे आदर्शों की छवि एक झटके में खंडित हो गयी थी. पुरुषों ने सदैव से स्त्री को उपभोग की वस्तु समझा है. प्रो. कुमार ने भी उसे मात्र एक स्त्री ही समझा. उसकी प्रतिभा, लगन, योग्यता और मेहनत का कोई मूल्य नहीं उनकी दृष्टि में.
वो इतने वर्षों से एक आदर्श गुरू के रूप में उन्हें पूजती चली आ रही है, किंतु वे देवता नहीं वासना के पुजारी निकले. दीपा को अपना वजूद अस्तित्वहीन होता-सा प्रतीत हो रहा था. प्रो. कुमार की दृष्टि में वो सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाली प्रतिभा संपन्न छात्रा नहीं, अपितु ज़िंदा गोश्त मात्र थी. नारी नहीं अपितु पुरुषों के तन की ज्वाला शांत करने वाला यंत्र मात्र? यही मूल्यांकन है उसके आज तक के श्रम का? यही सम्मान है उसकी प्रतिभा का?
दीपा जितना सोचती, उसके मन की पीड़ा उतनी ही बढ़ती जाती. अपमान की अधिकता से उसकी आंखों के आंसू सूख चले थे. उसकी रगों में दौड़ रहा ख़ून ब़र्फ होने लगा था. जिस दुनिया में उसका कोई महत्व नहीं, उसमें जीना व्यर्थ है. ऐसे अपमान से मृत्यु श्रेयस्कर है. उसे अपने जीवन का अंत कर लेना चाहिए. शायद उससे प्रो. कुमार को कोई सीख मिले. अपनी करनी पर उन्हें शर्म आये, किंतु यदि ऐसा नहीं हुआ तो? क्या कुशल शिकारी की भांति वे किसी दूसरे को अपने जाल में नहीं फंसा लेंगे? दीपा की सोच को एक झटका-सा लगा.
उसे इस अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए. प्रो. कुमार को?उसकी करतूतों का दंड मिलना चाहिए. लेकिन कैसे? विश्वविद्यालय के प्रबंध तंत्र पर उनकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि वो चाहकर भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी. उल्टे उसका कैरियर तबाह हो जाएगा. तो क्या उसे परिस्थितियों से समझौता कर लेना चाहिए? शोषण को नारी की नियति मान लेना चाहिए? दीपा चाह कर भी कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी.
वो रातभर करवटें बदलती रही. एक के बाद एक ख़याल आते रहे. अगले दिन जब वह उठी तो अपनी दिशा निर्धारित कर चुकी थी. उसने दोपहर में प्रो. कुमार को फ़ोन किया, “सर, आप मुझसे दो रात के लिए घर आने के लिए कह रहे थे, लेकिन मैं पूरी ज़िंदगी के लिए आपके घर आने के लिये तैयार हूं.”
“इसकी ज़रूरत नहीं है. तुम स़िर्फ दो रातों के लिए आ जाओ, इतना ही बहुत होगा.” प्रो. दूर जा रही हूं.” दीपा ने प्रकाश की और देखते हुए कहा. उसकी आंखों में अश्रुकण झिलमिला उठे थे.
“तुम माफ़ी किस बात की मांग रही हो?” प्रकाश का स्वर भीग उठा. पलभर के लिये उसके चेहरे पर तूफ़ान के चिह्न छा गए. फिर वो दृढ़ स्वर में बोला, “दीपा, आज तक मैं तुमसे प्यार करता था, लेकिन आज मेरे मन में तुम्हारी इ़ज़्ज़त और बढ़ गयी है. मैं हर हालत में तुम्हें स्वीकार करना चाहता हूं.”
“अब यह संभव नहीं हो सकता.” दीपा ने फ़ैसला सुनाया.
“क्यों संभव नहीं हो सकता?” प्रकाश तड़प उठा.
दीपा ने स्नेह भरी दृष्टि से प्रकाश की ओर देखा, फिर शांत स्वर में बोली, “यदि सत्य उजागर किये बिना मैं तुमसे शादी कर लेती तब भी तुम्हारे डैडी ज़िंदगीभर मुझसे आंखें न मिला पाते. वे भले ही गुरू का धर्म भूल गये हों, लेकिन मैं शिष्या का धर्म नहीं भूली हूं. अपनी बहू के सामने आजीवन ज़लील होने की ज़लालत से मैं उन्हें मुक्ति देती हूं. यही मेरी गुरूदक्षिणा होगी.”
इतना कह कर वो तेज़ी से वहां से निकल गयी. किसी में उसको रोक पाने का साहस न था.
कुमार ने हंसते हुए कहा.
“ओ. के. सर, मैं शाम को पहुंच जाऊंगी.” दीपा ने कहा और फ़ोन काट दिया.
इसके बाद उसने प्रकाश के ऑफ़िस फ़ोन किया, “प्रकाश, मैं आज ही तुम्हारे घर वालों से मिलना चाहती हूं.”
“लेकिन आज तो मैं ऑफ़िस के काम से बाहर जा रहा हूं.” प्रकाश ने कहा.
“प्रकाश प्लीज़, अपना कार्यक्रम बदल लो, क्योंकि मैं आज ही अपनी ज़िंदगी के बारे में ़फैसला करना चाहती हूं.” दीपा ने ज़ोर दिया.
“लेकिन…..”
“क्या मेरे लिए तुम इतना नहीं कर सकते?” दीपा का स्वर कातर हो उठा.
“तुम्हारे लिए तो मैं अपनी जान दे सकता हूं. घरवालों का सामना करना तो बहुत मामूली बात है.” प्रकाश हंस पड़ा.
“ओ. के. मैं पांच बजे तुम्हारे ऑफ़िस के सामने पहुंच जाऊंगी.” दीपा ने कहा और तुरंत फ़ोन काट दिया.
दीपा ने अपनी भूमिका तो तय कर ली थी, किंतु उसके अंतर्मन में हलचल मची हुई थी. समय काटे नहीं कट रहा था. घड़ी की सूइयां भी आज कुछ ़ज़्यादा ही धीमे चल रही थीं. शाम पांच बजे वह तैयार होकर प्रकाश के ऑफ़िस के सामने पहुंच गयी. प्रकाश अपनी कार में बैठा उसी की प्रतीक्षा कर रहा था. उसे लेकर तुरंत अपने घर की ओर चल पड़ा. रास्ते भर दीपा मौन रही. प्रकाश ने भी उसे टोकना उचित नहीं समझा. सोचा शायद वो अपने आपको आने वाली स्थिति के लिए तैयार कर रही है.
अपने विशाल बंगले के प्रांगण में पहुंच प्रकाश ने कार रोकी और दीपा के कंधे पर हाथ रख स्नेह भरे स्वर में बोला, “दीपा, घबराना बिल्कुल नहीं. डैडी बहुत अच्छे हैं. मुझे विश्वास है कि वे तुम्हें अवश्य स्वीकार कर लेंगे.”
“मैं तुम्हारे डैडी को बहुत अच्छी तरह से जानती हूं.” दीपा ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को उठाकर प्रकाश की ओर देखा.
“जानोगी क्यों नहीं, उनकी स्टूडेंट जो रह चुकी हो.” प्रकाश मुस्कुराया.
“स्टूडेंट रह नहीं चुकी हूं, बल्कि आज भी हूं.”
“क्या मतलब?”
“मैं अपनी रिसर्च उन्हीं के अंडर पूरी कर रही हूं.” दीपा ने धीमे स्वर में बताया.
“तुम डैडी के अंडर रिसर्च कर रही हो?” प्रकाश उछल पड़ा. फिर दीपा को घूरते हुए बोला, “मैंने तुमसे कितनी बार गाइड का नाम पूछा था, लेकिन तुमने बताया क्यों नहीं?”
“मैं अपनी रिसर्च अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर पूरा करना चाहती थी. अगर मैं तुम्हें गाइड का नाम बता देती तो तुम अपने डैडी से मेरी सिफ़ारिश अवश्य करते, फिर मेरे मन में ज़िंदगीभर ये एहसास बना रहता कि पी.एच.डी. की डिग्री मुझे अपनी योग्यता से नहीं, बल्कि सिफ़ारिश से मिली है.” दीपा का स्वर अचानक ही गंभीर हो उठा.
“यू आर ग्रेेट दीपा, रियली यू आर ग्रेट. आज डैडी तुम्हें नयी भूमिका में देख कर बुरी तरह चौंकेंगे.” प्रकाश ने स्नेह से दीपा के कंधे पर हाथ रख उसे नीचे उतरने का इशारा किया.
कार का दरवाज़ा बंद कर प्रकाश दीपा को लेकर घर के भीतर पहुंचा. दीपा के साथ प्रकाश को आता देख प्रो. कुमार बुरी तरह चौंक पड़े. उनकी समझ में ही नहीं आया कि ये दोनों एक साथ कैसे आये. बहुत मुश्किलों से उन्होंने अटकते हुए कहा, “प्रकाश, तुम तो आज ऑफ़िस से ही सीधे बाहर जाने वाले थे ना?”
“हां, लेकिन दीपा ने ज़िद की कि मैं आज ही उसकी मुलाक़ात आपसे करवा दूं.” प्रकाश ने मुस्कुराते हुए बताया.
“कैसी मुलाक़ात?” प्रो. कुमार का स्वर किसी अनहोनी आशंका से कांप उठा.
“सर, आप चाहते थे कि मैं केवल दो रातों के लिये आपके पास आ जाऊं, लेकिन आपका बेटा पूरी ज़िंदगी के लिये मुझे यहां लाना चाहता है.” दीपा ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा.
सड़ाक…. सड़ाक…. सड़ाक….. जैसे नंगी पीठ पर चाबुक पड़ रहे हों. प्रो. कुमार का सर्वांग कांप उठा. उन्होंने कभी स्वप्न में भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी. दीपा ने एक झटके में उनके चेहरे का नक़ाब नोंच डाला था. अपने बेटे के सामने ही उन्हें नंगा कर दिया था. उनका चेहरा स़फेद पड़ गया. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सारा ख़ून निचोड़ लिया हो.
अवाक् तो प्रकाश भी रह गया था. चंद क्षणों तक तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करे. फिर उसने दीपा की बांहों को पकड़ झिंझोड़ते हुये कहा, “दीपा, तुम होश में तो हो. तुम्हें मालूम है कि तुम क्या कह रही हो?”
“अच्छी तरह मालूम है, लेकिन शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे डैडी रिचर्स पूरी कराने के लिये मुझसे क्या गुरूदक्षिणा मांग रहे थे.” दीपा ने सर्द स्वर में कहा.
दीपा की बांह छोड़ प्रकाश ने उलझन भरी दृष्टि से प्रो. कुमार की ओर देखा. उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि दीपा जो कुछ कह रही है, वो सत्य हो सकता है. प्रो. कुमार की आंखों में बेटे की दृष्टि का सामना करने की ताब नहीं थी. उन्होंने अपनी आंखें झुका लीं.
“डैडी….” अविश्वास से प्रकाश का स्वर कांप उठा.
प्रकाश, अगर मैं चाहती तो ज़िंदगीभर ख़ामोश रहती, लेकिन इससे प्रो. कुमार का हौसला बढ़ जाता. वे किसी दूसरे शिकार को पकड़ लेते और गुरू-शिष्य के पवित्र रिश्ते को कलंकित करते रहते. इसलिये मैंने सच्चाई उजागर करना ज़रूरी समझा. अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर देना.
Tuesday, September 10, 2019
आदतें औकात बता देती हैं
एक राजा के दरबार मे एक अपरिचित व्यक्ति नौकरी मांगने के लीये आया।
उससे उसकी शैक्षणिक योग्यता तथा विशेषता पूछी ग ई, तो वो बोला, "मैं किसी भी मनुष्य अथवा पशु के व्यवहार को देखकर उसके बारे में सब कुछ बता सकता हूँ।
राजा ने उसे अपने खास घोडों के अस्तबल का मुखिया बना दिया।
कुछ दिनों बाद राजा ने उससे अपने मनपसंद और सबसे महंगे घोड़े के बारे में पूछा, तो उसने कहा, "ये घोडा नस्ली नही है।"
राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से उस घोडे बेचने वाले व्यापारी को बुला लिया, जिसने हजारों स्वर्ण मुद्राएं लेकर वह घोडा बेचा था।
उस व्यापारी ने बताया, यह घोड़ा तो एकदम नस्ली हैं, पर इसको जन्म देते ही इसकी मां मर गई थी, तो ये एक गाय का दूध पीकर उसीके साथ पला-बढा है।
राजा ने अपने अस्तबल प्रमुख को पास बुलाया और पूछा, "तुमको कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?"
उसने कहा, "जब ये घास खाता है, तो गायों की तरह सर नीचे करके खाता है। जबकि नस्ली घोड़ा घास मुंह में लेकर सर उठा लेता हैं।
राजा नवनियुक्त दास के इस गुण से बहुत प्रसन्न हुआ, उसके घर इनाम स्वरूप अनाज, घी, मुर्गे, और अंडे भिजवा दीये।
फिर उसे अस्तबल से हटाकर रानी के महल में नियुक्त कर दिया।
कुछ दिनो बाद राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी, तो उस दास ने कहा, "तौर तरीके तो रानी जैसे हैं, लेकिन रानी साहिबा पैदाइशी नहीं हैं।”
राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने तुरंत अपनी सास को बुलाया।
सास को पूरा मामला विस्तार पूर्वक बताया तो वह बोली,_* *_"दामादजी!_* *_वास्तविकता यह है कि, आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी के जन्म लेते ही रिश्ता मांग लिया था।
हमने आनंदित होकर घर बैठे आये हुये इस संबंध के लीये तुरंत हामी भी भर दी थी।
लेकिन हमारी बेटी 6 माह में ही मर गई थी, पर हमने आपके रजवाड़े से रिश्ता बनाये रखने के लीये किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।"
राजा ने फिर अपने दास से पूछा "यह सब तुमको कैसे पता चला ?"
दास बोला, "रानी साहिबा का अपने नौकरों के साथ जो व्यवहार है, वह गंवारों से भी बुरा हैं। एक खानदानी व्यक्ति का दूसरों से व्यवहार करने का एक अत्यंत शालीन तरीका होता हैं, जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही है।"
राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ और इनाम के रूप में अनाज की बोरियाँ और भेड़ बकरियां देदी और उसे अपने दरबार मे तैनात कर दिया।
कुछ वक्त गुज़रा, राजा ने फिर दास को बुलाया और अपने बारे में पूछा।
नौकर ने कहा, "हुजूर! प्राणों की सुरक्षा का वचन देते होंगे, तो कुछ कहूँ।”
राजा ने उसे वचन दे दिया।
उसने कहा, "न तो आप किसी राजा के बेटे हो और न ही आपका चालचलन एवं व्यवहार राजा-महाराजाओं वाला है।"
राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर वह दास को उसके प्राणों की सुरक्षा का वचन दे चुका था।
राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा।
मां ने कहा, "बेटा! यह सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो। हमारी खुदकी कोई औलाद नहीं थी, तो हमने तुम्हें गोद लेकर पाल लिया।”
राजा ने दास को बुलाया और पूछा, "ये बताओ कि, तुम्हें यह, कैसे पता चला ?”
दास ने कहा "जब भी खानदानी राजा-महाराजा प्रसन्न होकर किसी को इनाम दिया करते हैं, तो हीरे, मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं। लेकिन आप तो सदा भेड, बकरियां, खानपान की चीजें ही दिया करते हैं।
ये व्यवहार किसी राजा का नही, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।"
कोई भी व्यक्ति कितना भी धनी, बाहुबली एवं समृद्ध हो, ये सब बाहरी दिखावा है।
मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके व्यवहार और उसकी नियत से ही होती हैं।
Monday, September 9, 2019
बहू-बेटी
जया स्वयं को उतना उत्साहित नहीं पा रही थी, जितना कि छह माह पश्चात् घर लौटने पर उसे होना चाहिए था. स्पष्ट कुछ भी नहीं था. बस लौटना था, इसलिए लौट रही है. अमेरिका का उसका छह माह का वीज़ा समाप्त होने पर था. यह समय वह अपनी बेटी, दामाद और दो नटखट नातिओं के संग बिता कर अब अपने घर आ रही थी. यहां भी भरा-पूरा परिवार है. एक ही घर के ऊपर-नीचे की मंज़िल में दोनों बेटे सपरिवार रहते हैं. मकान तो उसके पति का ही बनवाया हुआ है और यहां उसका
निरादर होता हो, ऐसा भी नहीं है. तो फिर मन क्यों उचाट है? पिता की मृत्यु के बाद बेटी ने बुलवा भेजा था, ताकि मन बहल जाए कुछ दिन, पर रहना तो आख़िर यहीं है. अपने वतन और अपने लोगों के बीच और यही उसे पसन्द भी है.
हवाई जहाज के उड़ान भरते ही उसने अपनी दृष्टि पासवाली छोटी-सी बन्द खिड़की के पास ग़ड़ा दी. हवाई टिकट बुक कराते समय वह सदैव ही खिड़की वाली सीट के लिए भी आवेदन कर देती है. केबिन के खिड़की से बाहर देखना उसे बहुत अच्छा लगता है. एकदम अलौकिक दृश्य- दूर तक फैला अनन्त. दूर- बहुत दूर एक होते पृथ्वी और आकाश- बस और कुछ नहीं. कहां दिखता है ये सब महानगरों की बहुमंज़िली इमारतों के बीच. बादलों के आ जाने पर हवाई जहाज उनके भी ऊपर चला जाता है. स़फेद रूई के फाहों जैसे बादलों के ऊपर यह दृश्य एकदम अलग होता है.
पहले तो ये नज़ारे सदैव ही उसके मन में पुलक जगा जाते थे, पर आज ये भी उसे अधिक समय तक नहीं बांध सके. वह आंखें मूंद अपने अतीत के गलियारों में घूमने लगी. कितना बदल गया है समय. जब उसका विवाह हुआ था तो सास अर्थात् बिना ताज की एकछत्र साम्राज्ञी. तिस पर उसकी सास तो कठोर और निर्मम भी थी. पति भी तो ऐसे नहीं थे कि कभी दबी ज़ुबान से ही पत्नी के पक्ष में बोल देते. घोर अन्याय तक की बात में भी ख़ामोश ही रहते. पुरुष जो ठहरे.
पर जया को अपने बड़े बेटे समीर का बहुत सहारा है. जाने किस मिट्टी का बना है वह. कभी किसी का दिल नहीं दुखाया होगा उसने. मां की पूरी देखभाल करता है और पत्नी वसुधा भी प्रसन्न है. और क्यों न हो? अपनी इच्छा से ही तो विवाह किया है दोनों ने. बैंगलौर में दोनों ने एक संग मैनेजमेन्ट का कोर्स किया है. दोस्ती हुई और विवाह का फ़ैसला कर लिया. कितना परेशान हो गए थे वे दोनों. ‘वसुधा को एक शब्द भी हिन्दी बोलनी नहीं आती’ बताया था समीर ने.
“अब हमें क्या अपने घर में अंग्रेज़ी बोलनी पड़ेगी? या फिर तमिल ही सीखनी पड़ेगी?” झुंझलाकर कहते उसके पिता.
पर ऐसा कुछ भी नहीं करना पड़ा था. सादे-से विवाह समारोह के पश्चात् बेटे-बहू ने प्रयत्न करके उसी शहर में नौकरी ढूंढ़ी और एक संग रहने का फैसला भी किया. वसुधा ने एक दिन भी महसूस नहीं होने दिया कि उन्हें अंग्रेज़ी सीखनी पड़ेगी, बल्कि सालभर के भीतर हिन्दी बोलने-समझने तो लगी ही थी, साथ में कुछ शब्द पंजाबी के भी सीख लिए थे. बहुत आदर-सम्मान करती थी सब का. उसके नौकरी करने से सास पर ही काम का सब बोझ न आन पड़े, इसलिए दिनभर के लिए आया की भी व्यवस्था कर दी थी और जल्द ही घर नन्हीं किलकारियों से भी गूंज उठा.
इतना कुछ पाकर भी एक अरमान रह गया था जया के मन में. दूसरी बहू तो वह अपने कुल-गोत्र की ही लाएगी. अपने सब अरमान पूरे करेगी वह अपने बेटे रंजन के ज़रिए. पूरे रस्मो-रिवाज़ के साथ व्याह रचाएगी. बहुत-सी लड़कियों से मिलवाने के बाद ही रंजन ने माधवी को पसन्द किया था. पूरे विधि-विधान से विवाह सम्पन्न हुआ. जया ने बहू माधवी का बहुत खुलेदिल से स्वागत किया और अपनत्व देने का प्रयत्न किया. पर वह सबसे खिंची-खिंची अलग-थलग ही रहती. अपने कमरे में चुपचाप कुछ पढ़ती रहती अथवा रेडियो चला कर आंखें मूंदे लेटी रहती.
जया उससे बात करने का प्रयत्न भी करती लेकिन वह या तो चुप ही रहती अथवा रूखा, संक्षिप्त-सा उत्तर देकर चली जाती.
जया को अपने प्रति किया व्यवहार न अखरता, यदि रंजन-माधवी आपस में ही हंसी-ख़ुशी रह लेते, पर दोनों का ही मुंह अलग-अलग दिशा में रहता. वह यह भी नहीं कह सकती कि पूरा दोष माधवी का ही था. उसका बेटा भी तो कम आत्मकेन्द्रित नहीं. साथ ही पूरी तरह से पुरुष सत्तात्मक सोच भी थी उसकी. कहां ग़लती हो गई
उसके लालन-पालन में? संस्कार तो उसने अपने दोनों पुत्रों में एक-से ही डाले थे. वह इस आशा में थी कि मेरी परवाह भले ही न करे, लेकिन कम-से-कम अपनी पत्नी को तो प्यार करेगा. वह किसी तरह आपस
में ही सामंजस्य बिठा ले, यही सोचकर उसने ऊपर वाला हिस्सा उन्हें अलग रहने के लिए दे दिया.
प्रायः ऐसा होता है कि बहू सास से प्रताड़ना पाती है और अपना समय आने पर ब्याज सहित अपनी बहू से वसूलती है. पर जया ने इसके विपरीत यह तय किया कि जो कुछ उसने सहा-सुना, वह उसकी बहुओं के साथ न हो. वह उन्हें बेटियों-सा ही स्नेह देती. बड़ी से तो ख़ैर उसे कोई शिकायत नहीं थी. पर माधवी…? और जब उसे मालूम था कि वसुधा अपनी बीमार मां को देखने गई हुई है, तब भी क्यों उसे घर पहुंचने का उत्साह नहीं हो रहा? समीर उसे हवाई अड्डे लेने आया. रास्ते में उसने बताया कि रंजन और माधवी में तनातनी कुछ बढ़ी ही है, कम नहीं हुई और उनके बीच होते तकरार प्राय: ही नीचे सुनाई देते रहते हैं.
दूसरे दिन इतवार था. दोपहर के भोजन के पश्चात वह लेटी ही थी कि बाहर आहट हुई. बाहर के दरवाज़े की सांकल भी खुली. नीचे के हिस्से में उस व़क़्त कौन जा रहा है? यह देखने कमरे से बाहर आई तो पाया माधवी खड़ी है. द्वार के पास एक अटैचीकेस भी रखा है.
“कहां जा रही हो इस तपती दोपहरी में?” उसने पूछा.
“अभी सोचा नहीं.”
“मतलब?”
“आपके बेटे ने कहा है कि यह घर उसका है और मैं यहां से चली जाऊं.”
जया उसका हाथ थाम अपने कमरे में ले आई. उसे स्नेहपूर्वक अपने पास बिठाया और कहा.
“हां, अब बताओ.”
पर वह तो मुंह खोलने को ही तैयार नहीं थी.
“माधवी, तुम इस घर में व्याह कर आई हो. अतः अब यह घर उतना ही तुम्हारा है, जितना रंजन का.”
“घर तो आप लोगों का है, रंजन का है. मेरा कैसे हो सकता है?”
“फिर तो यह घर मेरा भी न हुआ. मैं भी तो तुम्हारी तरह बाहर से आई हूं… अच्छा, फिर यह बताओ मेरा और तुम्हारा घर कौन-सा है?”
माधवी चुप ही बैठी रही.
“मां के घर सुनते रहे कि बेटी पराया धन है और ससुराल का घर तो पति का होता है, भले ही यह घर स्त्री ही तिनका-तिनका जोड़कर बनाती है. उस घर की दिन-रात देखभाल करती है. अपने से पहले पति और बच्चों की ज़रूरत पूरी करती है. फिर भी घर उसका नहीं. अच्छा, फिर यह बताओ उसका घर कौन-सा है?”
“क्या पता?” माधवी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.
“हमने कभी संग बैठ बातें नहीं की. दुख-सुख नहीं बांटा. चलो आज ही शुरुआत करते हैं…”
माधवी की तरफ़ से कुछ हरकत न पा जया ने ही आगे जोड़ा.
“मायके में जब भी तुम्हें कोई समस्या होती थी तो तुम मां से अथवा घर के किसी अन्य सदस्य से बात कर मन का बोझ
हल्का कर लेती थी न? वैसे ही आज भी कर लो… चलो पहले मैं ही तुम्हें आपबीती सुनाती हूं. तब तुम्हें शायद मन की बात कहने का हौसला मिल जाए.
मेरा विवाह हुआ तो मेरे साथ क्या होता था, जानती हो? शाम को बेटे के घर में घुसते ही दिनभर की शिकायतों का पुलिन्दा खोल कर बैठ जाती थीं अम्मा. कूप मण्डूक-सा ही जीवन जीया था उन्होंने और मैं सह शिक्षा में पढ़ी हुई थी. अत: अम्मा को तो मेरी हर बात नागवार गुज़रती. मेरी हर बात पर नुक्ताचीनी करतीं वह. पति के मित्रों के साथ हंसकर बात कर लेना उन्हें अक्षम्य अपराध लगता. पति भी तो ऐसे नहीं थे कि मां से कहते- ‘मां अब सिर ढंककर रहने का ज़माना नहीं रहा.’ अपनी पत्नी की हर बात, हर ज़रूरत को नज़रअंदाज़ कर अपने माता-पिता की ही हर बात सुनना- यही तो उस ज़माने में आदर्श बेटा होने का प्रमाण था.
यूं पूरा दोष अम्मा का भी नहीं था. पढ़ी-लिखी वह थीं नहीं. उस समय स्त्रियों की बातचीत का मुद्दा प्राय: इधर-उधर की शिकायतें, मीन-मेख निकालने का ही होता था. फिर उन्होंने स्वयं बहुत प्रताड़ना सही थी. युवावस्था में ही पति की मृत्यु हो गई.
पहले की महिला आर्थिक, सामाजिक रूप से पूर्णत: पति पर निर्भर थी तो ससुराल की सब धौंस चुपचाप सहती थी. पर अब शिक्षित होने पर वह उतनी निर्भर नहीं है. उसमें आत्मविश्वास भी आ चुका है तो वह ये सब क्यों सहे? पर सास की छवि आज भी वही है और इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ है कि संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं. जबकि दरअसल उनकी ज़रूरत बढ़ी है, कम नहीं हुई. मिल-जुलकर रहने से दोनों का ही लाभ है. मां के नौकरी करने पर छोटे बच्चे दादा-दादी की स्नेह की छत्रछाया में पलते हैं और वृद्धावस्था में बच्चे मां-बाप का सहारा बन जाते हैं.
लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, आधुनिक हो- परिचित माहौल को छोड़कर नई जगह में बसने का भय, एक झिझक तो होती ही है. उस पर यदि घर की प्रमुख स्त्री यानी सास विद्रोही खेमे में ही खड़ी हो तो समस्या और भी बढ़ जाती है. तुम्हारे मन में भी शायद मेरी यही छवि बनी हुई है.
सदियों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना इतना आसान न भी हो, पर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि नई नवेली दुल्हन का विशाल हृदय से स्वागत करें. यह तो संभव है कि हम आपस में मां-बेटी-सा रिश्ता कायम कर लें, दोस्ताना व्यवहार करें. एक-दूसरे के दुख-दर्द को समझें.
हमें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है और इसके लिए पुरुषों के विरुद्ध झण्डा उठाने की भी ज़रूरत नहीं. हमें ही एक-दूसरे का सहारा बनना है, एक-दूसरे का दर्द पहचानना है. सौभाग्यवश आज की सास शिक्षित है. उसकी सोच संकुचित नहीं रह गई. अब वह घर बैठ हर समय बहू की नुक्ताचीनी करने में अपना समय नहीं गंवाती. उसकी अपनी रुचियां हैं, सामाजिक दायरा है.
अब आई बात रंजन और तुम्हारी. ज़िन्दगी की प्रत्येक समस्या का हल न हो तो भी अनेक का होता ही है, बशर्ते हम उसे शान्तिपूर्वक बैठ कर सुलझाने का प्रयत्न करें. यदि रंजन कुछ ग़लत करता है और सोचता है कि पुरुष होने के नाते अथवा इस घर का सदस्य होने के नाते उसकी मनमानी चल जाएगी तो वह ग़लत सोच रहा है. यदि वह तुम पर अन्यायपूर्ण बात थोपता है तो
मैं तुम्हारे साथ हूं और उसकी मां होने के नाते सही राह दिखाना मेरा फ़र्ज़ है और यदि तुम कोई ग़लती करोगी तो मैं तुम्हें भी डांट सकती हूं, क्योंकि तुम भी अब इसी घर की बेटी हो.”
जया खिसक कर माधवी के क़रीब आ गई और स्नेहपूर्वक उसे आलिंगनबद्ध कर लिया. माधवी एक पल के लिए रुकी रही. पर उसके चेहरे से लग रहा था कि ब़र्फ पिघल रही है. उसने पहले झिझकते हुए, फिर कस के जया का आलिंगन किया और अपना सिर उसके कंधे पर टिका कर आंखें मूंद लीं. फिर आंसुओं को पीते हुए बोली, “मां, मैंने तो हमेशा ही इस घर को और आप सभी को अपना समझा, पर इनका रूखा व्यवहार मुझे निराश करता चला गया. लेकिन धीरे-धीरे मैं बहुत-कुछ समझने और जानने लगी हूं. बस, एक परायेपन की फांस थी, जो आपने बहुत कुछ कह कर और प्रेम, अपनेपन से दूर कर दी है. सच, मैं ख़ुद को बेहद भाग्यशाली मानती हूं कि हमारा रिश्ता सास-बहू का नहीं, बल्कि मां-बेटी का है.”
जया प्यार से माधवी के सिर पर हाथ फेरने लगी.
शनिवार व्रत कथा
एक समय स्वर्गलोक में 'सबसे बड़ा कौन?' के प्रश्न पर नौ ग्रहों में वाद-विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ा कि परस्पर भयंकर युद्ध की स्थिति बन गई। निर्णय के लिए सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुँचे और बोले- 'हे देवराज! आपको निर्णय करना होगा कि हममें से सबसे बड़ा कौन है?' देवताओं का प्रश्न सुनकर देवराज इंद्र उलझन में पड़ गए।
इंद्र बोले- 'मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ। हम सभी पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं।
देवराज इंद्र सहित सभी ग्रह (देवता) उज्जयिनी नगरी पहुँचे। महल में पहुँचकर जब देवताओं ने उनसे अपना प्रश्न पूछा तो राजा विक्रमादित्य भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे क्योंकि सभी देवता अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान थे। किसी को भी छोटा या बड़ा कह देने से उनके क्रोध के प्रकोप से भयंकर हानि पहुँच सकती थी।
अचानक राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं- स्वर्ण, रजत (चाँदी), कांसा, ताम्र (तांबा), सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे के नौ आसन बनवाए। धातुओं के गुणों के अनुसार सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवाकर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा।
देवताओं के बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य ने कहा- 'आपका निर्णय तो स्वयं हो गया। जो सबसे पहले सिंहासन पर विराजमान है, वहीं सबसे बड़ा है।'
राजा विक्रमादित्य के निर्णय को सुनकर शनि देवता ने सबसे पीछे आसन पर बैठने के कारण अपने को छोटा जानकर क्रोधित होकर कहा- 'राजा विक्रमादित्य! तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हो। मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा।'
शनि ने कहा- 'सूर्य एक राशि पर एक महीने, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं, लेकिन मैं किसी राशि पर साढ़े सात वर्ष (साढ़े साती) तक रहता हूँ। बड़े-बड़े देवताओं को मैंने अपने प्रकोप से पीड़ित किया है।
राम को साढ़े साती के कारण ही वन में जाकर रहना पड़ा और रावण को साढ़े साती के कारण ही युद्ध में मृत्यु का शिकार बनना पड़ा। राजा! अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बच सकेगा।'
इसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ चले गए, परंतु शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहाँ से विदा हुए।
राजा विक्रमादित्य पहले की तरह ही न्याय करते रहे। उनके राज्य में सभी स्त्री-पुरुष बहुत आनंद से जीवन-यापन कर रहे थे। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। उधर शनि देवता अपने अपमान को भूले नहीं थे।
विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्जयिनी नगरी पहुँचे। राजा विक्रमादित्य ने राज्य में किसी घोड़े के व्यापारी के आने का समाचार सुना तो अपने अश्वपाल को कुछ घोड़े खरीदने के लिए भेजा।.
घोड़े बहुत कीमती थे। अश्वपाल ने जब वापस लौटकर इस संबंध में बताया तो राजा विक्रमादित्य ने स्वयं आकर एक सुंदर व शक्तिशाली घोड़े को पसंद किया।
घोड़े की चाल देखने के लिए राजा उस घोड़े पर सवार हुए तो वह घोड़ा बिजली की गति से दौड़ पड़ा।
तेजी से दौड़ता घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में ले गया और फिर राजा को वहाँ गिराकर जंगल में कहीं गायब हो गया। राजा अपने नगर को लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा। लेकिन उन्हें लौटने का कोई रास्ता नहीं मिला। राजा को भूख-प्यास लग आई। बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला।
राजा ने उससे पानी माँगा। पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को अपनी अँगूठी दे दी। फिर उससे रास्ता पूछकर वह जंगल से निकलकर पास के नगर में पहुँचा।
राजा ने एक सेठ की दुकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया। उस सेठ ने राजा से बातचीत की तो राजा ने उसे बताया कि मैं उज्जयिनी नगरी से आया हूँ। राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठजी की बहुत बिक्री हुई।
सेठ ने राजा को बहुत भाग्यवान समझा और खुश होकर उसे अपने घर भोजन के लिए ले गया। सेठ के घर में सोने का एक हार खूँटी पर लटका हुआ था। राजा को उस कमरे में छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर गया।
तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। राजा के देखते-देखते सोने के उस हार को खूँटी निगल गई।
सेठ ने कमरे में लौटकर हार को गायब देखा तो चोरी का संदेह राजा पर ही किया क्योंकि उस कमरे में राजा ही अकेला बैठा था। सेठ ने अपने नौकरों से कहा कि इस परदेसी को रस्सियों से बाँधकर नगर के राजा के पास ले चलो। राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके देखते ही देखते खूँटी ने हार को निगल लिया था। इस पर राजा ने क्रोधित होकर चोरी करने के अपराध में विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटने का आदेश दे दिया। राजा विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटकर उसे नगर की सड़क पर छोड़ दिया गया।
कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया। राजा आवाज देकर बैलों को हाँकता रहता। इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा। शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई।
राजा विक्रमादित्य एक रात मेघ मल्हार गा रहा था कि तभी नगर के राजा की लड़की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस तेली के घर के पास से गुजरी। उसने मेघ मल्हार सुना तो उसे बहुत अच्छा लगा और दासी को भेजकर गाने वाले को बुला लाने को कहा।
दासी ने लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया। राजकुमारी उसके मेघ मल्हार से बहुत मोहित हुई। अतः उसने सब कुछ जानकर भी अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय कर लिया।
राजकुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वे हैरान रह गए। रानी ने मोहिनी को समझाया- 'बेटी! तेरे भाग्य में तो किसी राजा की रानी होना लिखा है। फिर तू उस अपंग से विवाह करके अपने पाँव पर कुल्हाड़ी क्यों मार रही है?'
राजकुमारी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी। अपनी जिद पूरी कराने के लिए उसने भोजन करना छोड़ दिया और प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया।
आखिर राजा-रानी को विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे। उसी रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा- 'राजा तुमने मेरा प्रकोप देख लिया।
मैंने तुम्हें अपने अपमान का दंड दिया है।' राजा ने शनिदेव से क्षमा करने को कहा और प्रार्थना की- 'हे शनिदेव! आपने जितना दुःख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना।'
शनिदेव ने कुछ सोचकर कहा- 'राजा! मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, शनिवार को व्रत करके मेरी व्रतकथा सुनेगा, उस पर मेरी अनुकम्पा बनी रहेगी।
प्रातःकाल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पाँव देखकर राजा को बहुत खुशी हुई। उसने मन ही मन शनिदेव को प्रणाम किया। राजकुमारी भी राजा के हाथ-पाँव सही-सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई।
तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी सुनाई।
सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुँचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा। राजा ने उसे क्षमा कर दिया क्योंकि यह सब तो शनिदेव के प्रकोप के कारण हुआ था।
सेठ राजा को अपने घर ले गया और उसे भोजन कराया। भोजन करते समय वहाँ एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सबके देखते-देखते उस खूँटी ने हार उगल दिया। सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया।
राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मोहिनी और सेठ की बेटी के साथ उज्जयिनी पहुँचे तो नगरवासियों ने हर्ष से उनका स्वागत किया। अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि शनिदेव सब देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं। प्रत्येक स्त्री-पुरुष शनिवार को उनका व्रत करें और व्रतकथा अवश्य सुनें।
राजा विक्रमादित्य की घोषणा से शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए। शनिवार का व्रत करने और व्रत कथा सुनने के कारण सभी लोगों की मनोकामनाएँ शनिदेव की अनुकम्पा से पूरी होने लगीं। सभी लोग आनंदपूर्वक रहने लगे।
Sunday, September 8, 2019
कौन थी शबरी और क्या थी उसकी कहानी ज़रूर पढ़े -
शबरी की कहानी रामायण के अरण्य काण्ड मैं आती है. वह भीलराज की अकेली पुत्री थी. जाति प्रथा के आधार पर वह एक निम्न जाति मैं पैदा हुई थी. विवाह मैं उनके होने वाले पति ने अनेक जानवरों को मारने के लिए मंगवाया. इससे दुखी होकर उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया. फिर वह अपने पिता का घर त्यागकर जंगल मैं चली गई और वहाँ ऋषि मतंग के आश्रम मैं शरण ली. ऋषि मतंग ने उन्हें अपनी शिष्या स्वीकार कर लिया. इसका भारी विरोध हुआ. दूसरे ऋषि इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि किसी निम्न जाति की स्त्री को कोई ऋषि अपनी शिष्या बनाये. ऋषि मतंग ने इस विरोध की परवाह नहीं की. ऋषि समाज ने उनका वहिष्कार कर दिया और ऋषि मतंग ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया.
ऋषि मतंग जब परम धाम को जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखें. उन्होंने कहा कि परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं. उनके लिए कोई इंसान उच्च या निम्न जाति का नहीं है. उनके लिए सब समान हैं. फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन प्रभु राम उनके द्वार पर आयेंगे.
ऋषि मतंग के स्वर्गवास के बाद शबरी ईश्वर भजन मैं लगी रही और प्रभु राम के आने की प्रतीक्षा करती रहीं. लोग उन्हें भला बुरा कहते, उनकी हँसी उड़ाते पर वह परवाह नहीं करती. उनकी आंखें बस प्रभु राम का ही रास्ता देखती रहतीं. और एक दिन प्रभु राम उनके दरवाजे पर आ गए.
शबरी धन्य हो गयीं. उनका ध्यान और विश्वास उनके इष्टदेव को उनके द्वार तक खींच लाया. भगवान् भक्त के वश मैं हैं यह उन्होंने साबित कर दिखाया. उन्होंने प्रभु राम को अपने झूठे फल खिलाये और दयामय प्रभु ने उन्हें स्वाद लेकर खाया. फ़िर वह प्रभु के आदेशानुसार प्रभुधाम को चली गयीं.
शबरी की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? आइये इस पर विचार करें. कोई जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता. व्यक्ति के कर्म उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं. ब्राहमण परिवार मैं जन्मे ऋषि ईश्वर का दर्शन तक न कर सके पर निम्न जाति मैं जन्मीं शबरी के घर ईश्वर ख़ुद चलकर आए और झूठे फल खाए. हम किस परिवार मैं जन्म लेंगे इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं हैं पर हम क्या कर्म करें इस पर हमारा पूरा अधिकार है. जिस काम पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं हैं वह हमारी जाति का कारण कैसे हो सकता है. व्यक्ति की जाति उसके कर्म से ही तय होती है, ऐसा भगवान् ख़ुद कहते हैं.
कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,
मानहु एक भगति कर नाता.
प्रभु राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया. भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है. प्रभु राम ने कहा की हे भामिनी सुनो मैं केवल प्रेम के रिश्ते को मानता हूँ. तुम कौन हो, तुम किस परिवार मैं पैदा हुईं, तुम्हारी जाति क्या है, यह सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता. तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम ही मुझे तम्हारे द्वार पर लेकर आया है.
फिकर - एक मार्मिक कहानी रिश्तों की
माँ ...बताओ न पापा कैसे बोलते थे
उनकी कुछ अवाजे सुनाओ न...करीब 10 साल की बेटी अपनी माँ पायल से जिद करती है..
तभी पायल अपने उन्हीं लम्हों मे खो जाती है जहाँ जिंदगी बेहद खूबसूरत थी...
दो प्रेमी एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे...मगर उनकी जाती एक न होने की वजह से उनके दोनों परिवार वाले इस रिश्ते से मंजूर नहीं थे। वह एक दूसरे के बिना बिलकुल भी जी नहीं सकते थे...इसलिए दोनों ने अपने अपने घरवालो के खिलाफ जाकर अपनी मर्जी से शादी करके एक दूसरे शहर मे जा बसे...लड़का बेहद मेहनती था इसलिए वह हर काम दिल लगाके करने लगा और इधर लड़की भी पढ़ी लिखी थी और खासकर math मे उसकी पकड़ बहुत ज्यादा थी...इसलिए वह घर पर ही tuition पढ़ाने लगी...देखते ही देखते 2 साल बित गये...इन दो सालों मे पैसे भी अच्छे जमा हो गये। इन दोनों का प्यार अब पहले से भी ज्यादा गहरा हो चुका था...फिर एक दिन ए दो...दो से तीन हो गये...घर मे एक खूबसूरत बेटी ने जन्म लिया। दोनों की खुशी का कोई ठीकाना न रहा। लड़का अब बाप बन चुका था अब वह और भी ज्यादा जिम्मेदार से अपना काम करने लगा। मगर....कुछ दिनों बाद ही लड़की की जिंदगी नरक जैसी बन गई..अब लड़का हर बात पे अपनी पत्नी की गलतियाँ निकालने लगा। चाहे खाना हो चाहे कपड़े हो चाहे कुछ भी हो,लड़की अक्सर अकेले मे रोती रहती थी...बेटी तो गोद मे थी, उसे कुछ पता नहीं था की मम्मी पापा के बिच क्या हो रहा है। कब तक बर्दाश्त करती लड़की, अब वह भी जवाब देने लगी थी..
घर मे हर वक्त अशांति का माहौल बन गया था,
पत्नी - शायद अब मैं एक बच्ची की माँ बन गया हूँ और तुम्हारा मन शायद किसी कुंवारी लड़की पर आ गया होगा इसलिए तुम रोज मुझसे झगडते हो।
पति- हाँ आया है क्या करोगी...मुझे छोड़ दोगी? छोड़ भी दिया तो तुमसे कौन शादी करेगा?
पत्नी- तुम्हें शायद पता नहीं की एक लड़की या एक औरत जब ठान ले कुछ करने को...तो दुनिया के हर मर्द को अपने काबू मे कर सकती है..मगर मैं ऐसा कभी नहीं करूँगी । शायद ये तुम्हारे घर के संस्कार होंगे मेरे नहीं।
- चलो देखता हूँ मेरे बाद तुम्हें कौन बेवकूफ अपनाता है।
पत्नी - सीधे क्यों नहीं बोलते की...बेटी हुई इसलिए तुम मुझसे पिछा छुडाना चाहते हो।
लड़का चिल्लाकर लड़की पर हाँथ उठा देता है मगर रूक जाता है।
पत्नी - रूक क्यों गये हाँ? सच कडुवा होता है न? शायद तुम निगल नहीं पाये।
लड़का गुस्से मे बाहर निकल जाता है। उस वक्त लड़की को अपने माँ बाप की बहुत याद आती है वह अपनी गलती पर पश्चाती है और अपनी मां को फोन करते करते रोने लगती है। फिर वह माँ को सब बता देती है। आखीर मां तो माँ ही होती है। फिर एक दिन लड़की के मां बाप अपनी बेटी को लेने आ जाते हैं । लड़के से बहुत कहासुनी होती है सास ससुर से। लड़की अपनी मां बाप की बेईज्जती सहन नहीं कर पाती और अपने पति पर हाँथ उठा देती है और गुस्से में समान पैक करके अपनी बेटी एंजल को लेकर माँ बाप के घर जाने को निकलती है तो लड़का कहता है। तू जा सकती है मगर मेरी बेटी एंजल तेरे साथ बिल्कुल नहीं जायेगी। लड़की के मां बाप लड़की से कहते है छोड़ दे इसकी बेटी को,
लड़की - नहीं मां, मुझे अब इसके सहारे तो जीना है फिर अपनी जिंदगी को कैसे इस दरिन्दे के हाथों छोड़ दूँ
माँ - आज तू चल...कल कोर्ट खुद तूझे तेरी बेटी दिलवा देगी।
लड़का - कोर्ट जाने की जरूरत नहीं है। मेरी बेटी कोर्ट कभी नहीं जायेगी इसलिए तुम ले जा सकती हो।
लड़की तो गुस्से में थी इसलिए कुछ कहे बिना चली गई। लड़का भी कुछ देर बाद निकल जाता है घर से। तीन दिन बाद लड़के के पास लड़की का हस्ताक्षर किया हुआ तलाक पेपर आता है लड़का भी जल्दी से पेपर साईन करके वापस भेज देता है जैसे उसे भी जल्दी हो अपनी पत्नी छुटकारे का। इधर लड़का रोज फोन कर करके परेशान करता है अपनी पत्नी को ए कहकर,
देखा? मैंने कहा था न तूझे कोई लड़का नहीं मिलेगा? अब तूझे फिर मेरे पास ही आना होगा ।
लड़की इस बात को चैलेंज की तरह लेती है। इधर लड़की के घरवाले उससे समझा बुझाकर शादी के लिए तैयार करते हैं । वैसे लड़की बिलकुल नहीं चाहती थी फिर से शादी करना क्योंकि बेटी तो थी ही फिर क्या चाहिए था एक मां को मगर उसे उस दरिन्दे को जवाब भी देना था। इसलिये नफरत की आग मे जलकर वह दूसरी शादी के लिए तैयार हो जाती है
तलाक भी हो चुका था,
तलाक के बाद भी उसके पहले पति का फोन तो आता था मगर कयी दिन हो गये न फोन न कोई खबर आई थी उसकी
और इधर लड़की के घर मे जोर शोर से सगाई की तैयारी शुरू हो चुकी थी मगर
अचानक सगाई के एक दिन पहले लड़की के पास फोन आता है की..पुलीस थाने से की एक लवारीश लाश पड़ी मिली है और उसकी मोबाइल से आपका न0 मिला। हैरत की बात ए है की उस मोबाइल पे आपके अलावा कोई और न0 नहीं है। इसलिए आप एक बार आके लाश की शिनाख्त कर दीजिए।
लड़की अचानक परेशान हो जाती है और घर मे कीसी को न बताये बेटी को लेकर पुलिस स्टेशन पहुँच जाती है और देखते ही पहचान जाती है प्रिंस को। वह समझ नहीं पा रही थी की क्या करे और क्या कहे आखिर रिश्ता भी अब था ही कंहा
तलाक हो चुका था अब दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी थे बस कुछ रिश्ता था तो बेटी एंजल की वजह से,
मगर न जाने क्यों आज फिर से उसकी मासूम भरे चेहरे को देखकर उसपे फिर से वही प्यार आया जो पहले करती थी। मर चुका था प्रिंस मगर मासूमीएत अब भी वही थी चेहरे पर
वह प्रिंस जो कभी सिर्फ उसका था, लड़की न चाहते हुए भी रो पड़ती है। अभी तीन महीने भी तो नहीं हुए थे दोनों अलग हुए अचानक प्रिंस कैसे मर गया
फिर भी रोते हुए पुलिस को सबकुछ बताके कहती है कि
हाँ कभी हम पति पत्नी थे मगर अब हम तलाक लेकर अलग हो चुके थे।
वह इतना कह तो देती है मगर दिल मे हजारों सवाल लिए
वह जल्दी से अपने पुराने घर आती है। जहाँ एक बुढीया आके कहती है। लो बेटी ये चाभी आज से एक हफ्ते पहले प्रिंस ने दी थी । कहा की...पायल आये तो दे देना । फिर उसके बाद वह वापस नहीं आया। पायल जल्दी से घर खोलकर अंदर जाके देखती है..
पहली नजर दिवार जाती है जहाँ प्रिंस की तशबीर है और उसके उपर माला चढ़ा हुआ है और निचे लिखा था...I miss you payal forever
पायल गीरते गीरते बची..और जमीन पे बैठकें रोने लगी, अब वह सोचने लगी की...प्रिंस जानता था की वह मरने वाला है..मगर एक बात उसने मुझे क्यों छुपाई?
क्या मजबूरी थी अपनी बिमारी को छुपाने की आखिर मैं उसकी धर्मपत्नी थी
मैं जमीन आसमान एक कर देती मेरे प्रिंस को बचाने के लिए। फिर वह आलमारी खोलके देखती है तो वहाँ कुछ वसीयेत के कागजात जो उसने सारे अपनी पत्नी पायल और बेटी एंजल के नाम की थी,कुछ डाक्टर के पेपर थे और छोटी सी चिठ्ठी । लिखा था, मेरी मोहब्बत मेरी जिंदगी मेरी अच्छी पायल, sorry पगली,
वादा करके भी मुकर गया मैं, जिंदगी भर साथ साथ निभाने के वादे करके बिच राह से ही मैं भाग निकला मै
शायद तुम्हें ए चिठ्ठी मिले या न मिले मगर कभी मिले तो बस इतना याद रखना की प्रिंस सिर्फ तुम्हारा था, शायद तुम्हारी शादी हो चुकी होंगी पर एंजल को कभी खुद से जुदा मत करना।और हो सकता है कि शादी के बाद भी कुछ पल मेरी याद आये तो हमारी बेटी एंजलीज़ की
धडकनो को सुनना जरा गौर से...वहाँ तुम्हें मैं मिलूंगा सदा धडकते हुए।
तुम सदा खुश रहना, हैरान हो न, एक प्रेमी अचानक कैसे हैवान हो गया? पागल...मैं इतना नहीं करता तो तू मुझे कैसे नफरत करती। कैसे तुम मुझे छोड़ती हाँ ?
मैं मरने से पहले तुम माँ बेटी को सुरक्षित देखना चाहता था,
मरने का बिलकुल डर या दुख नही था मुझे
मगर तुम दोनों की फिकर थी मुझे ।
इसलिए एक आशिक एक पति अपनों की फिकर मे दरिन्दा बन गया... तुम्हें भला बुरा कहा तुम्हारे मम्मी पापा को बुरा भला कहा मगर पगली...
मै बुरा नहीं था रे...बस जिंदगी मेरे खिलाफ थी
मैंने खुद की मौत की आहट सुन चुका था इसलिये मैंने अपनी जिंदगी के आखरी पलो मे अपनी पूरी ताकत लगा दी तुम्हारे नफरत के काबिल बनने का।
ताकी जब मेरे साँसें निकले तो तुम्हारी साँसें सलामत रहे
तुम मेरी बेटी की परवारीश कर सको
मुझे मांफ कर देना । बस तुम्हारा हैवान पति
पायल रोते रोते बेटी को लेकर उस डाक्टर के पास पहुँचती है जिसका पेपर घर मे मिला था,
पागलपन की हद से गुजर कर पायल एक साथ हजारों सवाल पूछती है डाक्टर से।
डाक्टर- बेटी - आज से 5 महीने पहले मेरे पास उसके दोस्त बेहोशी के हालात मे लाये थे। होश आने पर पूछा तो कहा की..पता नहीं डाक्टर मैं जल्दी थक जाता हूँ।
सिने मे कभी कभी सांसे रूक सी जाती है। कभी दर्द बरदास्त से बाहर होता है। मैंने ठीक से जांच की तो पाया की प्रिंस के दिल मे एक सुराख है और आखिरी स्टेज की ओर था, ऐसा नहीं की उसे बचाया नहीं जा सकता था मगर बड़ा जिद्दी निकला दिल का सुराख वाला, कहता है मेरे इलाज पे कम से कम 20 लाख तो लग जाएंगे। कहीं से उधार ले भी सकता हूँ मगर फिर भी नहीं बचा तो सारी मुसीबत मेरी मासूम बिबी और मेरी धड़कन मेरी बेटी पर आयेगी, बिधवा का मतलब ही सबके बिच खिलौना होना है जब आपके पास कुछ न हो,
मेरे बचने की उम्मीद है भी और नहीं भी
अकेला होता तो आज जिंदगी और मौत की जुआ जरूर खेलता डाक्टर साहब
लेकिन अब मैं जुआ खेलने की हालत मे नहीं रहा क्योंकि मेरे साथ मेरी और दो अनमोल जिंदगी जुड़ी है
मेरी अच्छी पत्नी और मेरी प्यारी बेटी
मेरे पास थोडे बहुत पैसे जरूर है मगर मैं मेरे इलाज से बेहतर मैं उन दोनों की जिंदगी सुरक्षित करके मरना चाहता हूँ। ताकि मेरे जाने के बाद भी वह सर उठाके इज्जत की जिंदगी जी सके,।
सच बेटी पागल था जिद्दी था मगर सिर्फ तुम दोनों के लिए। वरना ऐसी अद्भुत मोहब्बत देखने को कहाँ मिलती है इस जहाँ में।
पायल खुद को सम्भाल नहीं पा रही थी पागलों जैसी हालत हो चुकी थी
फिर रोते बिलखते जल्दी से जाके थाने से प्रिंस की पार्थिव शरीर लेती है और फिर अपने पुराने घर जाके गाँव वालों से मिलके पूरे सम्मान के साथ खुद अग्नि देती है प्रिंस को।
पायल फिर वापस अपने मां बाप के घर जाकर उनको प्रिंस का खत देती है फिर जवाब का इंतजार किये बिना
बिदा लेकर सदा सदा के लिए अपने घर आ गई अपनी बेटी के साथ जहाँ वह थी उन दोनों की बेटी और सिर्फ प्रिंस था...
तभी एंजल चिल्लाती है । अरे माँ तू कहाँ खो गई
बता न मेरे पापा कैसे बोलते थे।
पायल अपनी पलकों के आशुओ को साफ करते हुए भरे गले से मुस्कुराके कहती है बेटी से
करिब आ मै तेरे पापा मेरे प्रिंस की अवाज तूझे सुनाता हूँ.. तेरी धडकनो में
एंजल -मेरी धडकनो में? कैसे मां
पायल - तेरे पापा कहते थे की मेरी धड़कन मेरी बेटी को सदा सम्भाल के रखना । कभी भी मेरी अवाज सुनने को दिल करे...बेटी की धडकनो को सुन लेना
एंजल बड़ी मासूमीएत से अपनी मां से लिपटकर कहते है
तब तो मेरी धड़कन को सदा धड़कना होगा मेरे पापा के लिए है न मां?
पायल जोर से बेटी को अपने सीने मे लिपटाकर कहती है
हाँ मेरी गुड़िया हाँ |
उनकी कुछ अवाजे सुनाओ न...करीब 10 साल की बेटी अपनी माँ पायल से जिद करती है..
तभी पायल अपने उन्हीं लम्हों मे खो जाती है जहाँ जिंदगी बेहद खूबसूरत थी...
दो प्रेमी एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे...मगर उनकी जाती एक न होने की वजह से उनके दोनों परिवार वाले इस रिश्ते से मंजूर नहीं थे। वह एक दूसरे के बिना बिलकुल भी जी नहीं सकते थे...इसलिए दोनों ने अपने अपने घरवालो के खिलाफ जाकर अपनी मर्जी से शादी करके एक दूसरे शहर मे जा बसे...लड़का बेहद मेहनती था इसलिए वह हर काम दिल लगाके करने लगा और इधर लड़की भी पढ़ी लिखी थी और खासकर math मे उसकी पकड़ बहुत ज्यादा थी...इसलिए वह घर पर ही tuition पढ़ाने लगी...देखते ही देखते 2 साल बित गये...इन दो सालों मे पैसे भी अच्छे जमा हो गये। इन दोनों का प्यार अब पहले से भी ज्यादा गहरा हो चुका था...फिर एक दिन ए दो...दो से तीन हो गये...घर मे एक खूबसूरत बेटी ने जन्म लिया। दोनों की खुशी का कोई ठीकाना न रहा। लड़का अब बाप बन चुका था अब वह और भी ज्यादा जिम्मेदार से अपना काम करने लगा। मगर....कुछ दिनों बाद ही लड़की की जिंदगी नरक जैसी बन गई..अब लड़का हर बात पे अपनी पत्नी की गलतियाँ निकालने लगा। चाहे खाना हो चाहे कपड़े हो चाहे कुछ भी हो,लड़की अक्सर अकेले मे रोती रहती थी...बेटी तो गोद मे थी, उसे कुछ पता नहीं था की मम्मी पापा के बिच क्या हो रहा है। कब तक बर्दाश्त करती लड़की, अब वह भी जवाब देने लगी थी..
घर मे हर वक्त अशांति का माहौल बन गया था,
पत्नी - शायद अब मैं एक बच्ची की माँ बन गया हूँ और तुम्हारा मन शायद किसी कुंवारी लड़की पर आ गया होगा इसलिए तुम रोज मुझसे झगडते हो।
पति- हाँ आया है क्या करोगी...मुझे छोड़ दोगी? छोड़ भी दिया तो तुमसे कौन शादी करेगा?
पत्नी- तुम्हें शायद पता नहीं की एक लड़की या एक औरत जब ठान ले कुछ करने को...तो दुनिया के हर मर्द को अपने काबू मे कर सकती है..मगर मैं ऐसा कभी नहीं करूँगी । शायद ये तुम्हारे घर के संस्कार होंगे मेरे नहीं।
- चलो देखता हूँ मेरे बाद तुम्हें कौन बेवकूफ अपनाता है।
पत्नी - सीधे क्यों नहीं बोलते की...बेटी हुई इसलिए तुम मुझसे पिछा छुडाना चाहते हो।
लड़का चिल्लाकर लड़की पर हाँथ उठा देता है मगर रूक जाता है।
पत्नी - रूक क्यों गये हाँ? सच कडुवा होता है न? शायद तुम निगल नहीं पाये।
लड़का गुस्से मे बाहर निकल जाता है। उस वक्त लड़की को अपने माँ बाप की बहुत याद आती है वह अपनी गलती पर पश्चाती है और अपनी मां को फोन करते करते रोने लगती है। फिर वह माँ को सब बता देती है। आखीर मां तो माँ ही होती है। फिर एक दिन लड़की के मां बाप अपनी बेटी को लेने आ जाते हैं । लड़के से बहुत कहासुनी होती है सास ससुर से। लड़की अपनी मां बाप की बेईज्जती सहन नहीं कर पाती और अपने पति पर हाँथ उठा देती है और गुस्से में समान पैक करके अपनी बेटी एंजल को लेकर माँ बाप के घर जाने को निकलती है तो लड़का कहता है। तू जा सकती है मगर मेरी बेटी एंजल तेरे साथ बिल्कुल नहीं जायेगी। लड़की के मां बाप लड़की से कहते है छोड़ दे इसकी बेटी को,
लड़की - नहीं मां, मुझे अब इसके सहारे तो जीना है फिर अपनी जिंदगी को कैसे इस दरिन्दे के हाथों छोड़ दूँ
माँ - आज तू चल...कल कोर्ट खुद तूझे तेरी बेटी दिलवा देगी।
लड़का - कोर्ट जाने की जरूरत नहीं है। मेरी बेटी कोर्ट कभी नहीं जायेगी इसलिए तुम ले जा सकती हो।
लड़की तो गुस्से में थी इसलिए कुछ कहे बिना चली गई। लड़का भी कुछ देर बाद निकल जाता है घर से। तीन दिन बाद लड़के के पास लड़की का हस्ताक्षर किया हुआ तलाक पेपर आता है लड़का भी जल्दी से पेपर साईन करके वापस भेज देता है जैसे उसे भी जल्दी हो अपनी पत्नी छुटकारे का। इधर लड़का रोज फोन कर करके परेशान करता है अपनी पत्नी को ए कहकर,
देखा? मैंने कहा था न तूझे कोई लड़का नहीं मिलेगा? अब तूझे फिर मेरे पास ही आना होगा ।
लड़की इस बात को चैलेंज की तरह लेती है। इधर लड़की के घरवाले उससे समझा बुझाकर शादी के लिए तैयार करते हैं । वैसे लड़की बिलकुल नहीं चाहती थी फिर से शादी करना क्योंकि बेटी तो थी ही फिर क्या चाहिए था एक मां को मगर उसे उस दरिन्दे को जवाब भी देना था। इसलिये नफरत की आग मे जलकर वह दूसरी शादी के लिए तैयार हो जाती है
तलाक भी हो चुका था,
तलाक के बाद भी उसके पहले पति का फोन तो आता था मगर कयी दिन हो गये न फोन न कोई खबर आई थी उसकी
और इधर लड़की के घर मे जोर शोर से सगाई की तैयारी शुरू हो चुकी थी मगर
अचानक सगाई के एक दिन पहले लड़की के पास फोन आता है की..पुलीस थाने से की एक लवारीश लाश पड़ी मिली है और उसकी मोबाइल से आपका न0 मिला। हैरत की बात ए है की उस मोबाइल पे आपके अलावा कोई और न0 नहीं है। इसलिए आप एक बार आके लाश की शिनाख्त कर दीजिए।
लड़की अचानक परेशान हो जाती है और घर मे कीसी को न बताये बेटी को लेकर पुलिस स्टेशन पहुँच जाती है और देखते ही पहचान जाती है प्रिंस को। वह समझ नहीं पा रही थी की क्या करे और क्या कहे आखिर रिश्ता भी अब था ही कंहा
तलाक हो चुका था अब दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी थे बस कुछ रिश्ता था तो बेटी एंजल की वजह से,
मगर न जाने क्यों आज फिर से उसकी मासूम भरे चेहरे को देखकर उसपे फिर से वही प्यार आया जो पहले करती थी। मर चुका था प्रिंस मगर मासूमीएत अब भी वही थी चेहरे पर
वह प्रिंस जो कभी सिर्फ उसका था, लड़की न चाहते हुए भी रो पड़ती है। अभी तीन महीने भी तो नहीं हुए थे दोनों अलग हुए अचानक प्रिंस कैसे मर गया
फिर भी रोते हुए पुलिस को सबकुछ बताके कहती है कि
हाँ कभी हम पति पत्नी थे मगर अब हम तलाक लेकर अलग हो चुके थे।
वह इतना कह तो देती है मगर दिल मे हजारों सवाल लिए
वह जल्दी से अपने पुराने घर आती है। जहाँ एक बुढीया आके कहती है। लो बेटी ये चाभी आज से एक हफ्ते पहले प्रिंस ने दी थी । कहा की...पायल आये तो दे देना । फिर उसके बाद वह वापस नहीं आया। पायल जल्दी से घर खोलकर अंदर जाके देखती है..
पहली नजर दिवार जाती है जहाँ प्रिंस की तशबीर है और उसके उपर माला चढ़ा हुआ है और निचे लिखा था...I miss you payal forever
पायल गीरते गीरते बची..और जमीन पे बैठकें रोने लगी, अब वह सोचने लगी की...प्रिंस जानता था की वह मरने वाला है..मगर एक बात उसने मुझे क्यों छुपाई?
क्या मजबूरी थी अपनी बिमारी को छुपाने की आखिर मैं उसकी धर्मपत्नी थी
मैं जमीन आसमान एक कर देती मेरे प्रिंस को बचाने के लिए। फिर वह आलमारी खोलके देखती है तो वहाँ कुछ वसीयेत के कागजात जो उसने सारे अपनी पत्नी पायल और बेटी एंजल के नाम की थी,कुछ डाक्टर के पेपर थे और छोटी सी चिठ्ठी । लिखा था, मेरी मोहब्बत मेरी जिंदगी मेरी अच्छी पायल, sorry पगली,
वादा करके भी मुकर गया मैं, जिंदगी भर साथ साथ निभाने के वादे करके बिच राह से ही मैं भाग निकला मै
शायद तुम्हें ए चिठ्ठी मिले या न मिले मगर कभी मिले तो बस इतना याद रखना की प्रिंस सिर्फ तुम्हारा था, शायद तुम्हारी शादी हो चुकी होंगी पर एंजल को कभी खुद से जुदा मत करना।और हो सकता है कि शादी के बाद भी कुछ पल मेरी याद आये तो हमारी बेटी एंजलीज़ की
धडकनो को सुनना जरा गौर से...वहाँ तुम्हें मैं मिलूंगा सदा धडकते हुए।
तुम सदा खुश रहना, हैरान हो न, एक प्रेमी अचानक कैसे हैवान हो गया? पागल...मैं इतना नहीं करता तो तू मुझे कैसे नफरत करती। कैसे तुम मुझे छोड़ती हाँ ?
मैं मरने से पहले तुम माँ बेटी को सुरक्षित देखना चाहता था,
मरने का बिलकुल डर या दुख नही था मुझे
मगर तुम दोनों की फिकर थी मुझे ।
इसलिए एक आशिक एक पति अपनों की फिकर मे दरिन्दा बन गया... तुम्हें भला बुरा कहा तुम्हारे मम्मी पापा को बुरा भला कहा मगर पगली...
मै बुरा नहीं था रे...बस जिंदगी मेरे खिलाफ थी
मैंने खुद की मौत की आहट सुन चुका था इसलिये मैंने अपनी जिंदगी के आखरी पलो मे अपनी पूरी ताकत लगा दी तुम्हारे नफरत के काबिल बनने का।
ताकी जब मेरे साँसें निकले तो तुम्हारी साँसें सलामत रहे
तुम मेरी बेटी की परवारीश कर सको
मुझे मांफ कर देना । बस तुम्हारा हैवान पति
पायल रोते रोते बेटी को लेकर उस डाक्टर के पास पहुँचती है जिसका पेपर घर मे मिला था,
पागलपन की हद से गुजर कर पायल एक साथ हजारों सवाल पूछती है डाक्टर से।
डाक्टर- बेटी - आज से 5 महीने पहले मेरे पास उसके दोस्त बेहोशी के हालात मे लाये थे। होश आने पर पूछा तो कहा की..पता नहीं डाक्टर मैं जल्दी थक जाता हूँ।
सिने मे कभी कभी सांसे रूक सी जाती है। कभी दर्द बरदास्त से बाहर होता है। मैंने ठीक से जांच की तो पाया की प्रिंस के दिल मे एक सुराख है और आखिरी स्टेज की ओर था, ऐसा नहीं की उसे बचाया नहीं जा सकता था मगर बड़ा जिद्दी निकला दिल का सुराख वाला, कहता है मेरे इलाज पे कम से कम 20 लाख तो लग जाएंगे। कहीं से उधार ले भी सकता हूँ मगर फिर भी नहीं बचा तो सारी मुसीबत मेरी मासूम बिबी और मेरी धड़कन मेरी बेटी पर आयेगी, बिधवा का मतलब ही सबके बिच खिलौना होना है जब आपके पास कुछ न हो,
मेरे बचने की उम्मीद है भी और नहीं भी
अकेला होता तो आज जिंदगी और मौत की जुआ जरूर खेलता डाक्टर साहब
लेकिन अब मैं जुआ खेलने की हालत मे नहीं रहा क्योंकि मेरे साथ मेरी और दो अनमोल जिंदगी जुड़ी है
मेरी अच्छी पत्नी और मेरी प्यारी बेटी
मेरे पास थोडे बहुत पैसे जरूर है मगर मैं मेरे इलाज से बेहतर मैं उन दोनों की जिंदगी सुरक्षित करके मरना चाहता हूँ। ताकि मेरे जाने के बाद भी वह सर उठाके इज्जत की जिंदगी जी सके,।
सच बेटी पागल था जिद्दी था मगर सिर्फ तुम दोनों के लिए। वरना ऐसी अद्भुत मोहब्बत देखने को कहाँ मिलती है इस जहाँ में।
पायल खुद को सम्भाल नहीं पा रही थी पागलों जैसी हालत हो चुकी थी
फिर रोते बिलखते जल्दी से जाके थाने से प्रिंस की पार्थिव शरीर लेती है और फिर अपने पुराने घर जाके गाँव वालों से मिलके पूरे सम्मान के साथ खुद अग्नि देती है प्रिंस को।
पायल फिर वापस अपने मां बाप के घर जाकर उनको प्रिंस का खत देती है फिर जवाब का इंतजार किये बिना
बिदा लेकर सदा सदा के लिए अपने घर आ गई अपनी बेटी के साथ जहाँ वह थी उन दोनों की बेटी और सिर्फ प्रिंस था...
तभी एंजल चिल्लाती है । अरे माँ तू कहाँ खो गई
बता न मेरे पापा कैसे बोलते थे।
पायल अपनी पलकों के आशुओ को साफ करते हुए भरे गले से मुस्कुराके कहती है बेटी से
करिब आ मै तेरे पापा मेरे प्रिंस की अवाज तूझे सुनाता हूँ.. तेरी धडकनो में
एंजल -मेरी धडकनो में? कैसे मां
पायल - तेरे पापा कहते थे की मेरी धड़कन मेरी बेटी को सदा सम्भाल के रखना । कभी भी मेरी अवाज सुनने को दिल करे...बेटी की धडकनो को सुन लेना
एंजल बड़ी मासूमीएत से अपनी मां से लिपटकर कहते है
तब तो मेरी धड़कन को सदा धड़कना होगा मेरे पापा के लिए है न मां?
पायल जोर से बेटी को अपने सीने मे लिपटाकर कहती है
हाँ मेरी गुड़िया हाँ |
कछुए और खरगोश की कहानी (नया वर्जन)
आपने कछुए और खरगोश की कहानी ज़रूर सुनी होगी, जो कि संक्षेप में इस प्रकार है:
एक बार खरगोश को अपनी तेज चाल पर घमंड हो गया और वह जो कोई मिलता उससे रेस लगाने के लिए चुनौती देता रहता।
कछुए ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली।
रेस हुई। खरगोश तेजी से भागा और काफी आगे जाने पर पीछे मुड़ कर देखा, कछुआ कहीं आता नज़र नहीं आया, उसने मन ही मन सोचा कछुए को तो यहाँ तक आने में बहुत समय लगेगा, चलो थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, और वह एक पेड़ के नीचे लेट गया। लेटे-लेटे कब उसकी आँख लग गयी पता ही नहीं चला।
उधर कछुआ धीरे-धीरे मगर लगातार चलता रहा। बहुत देर बाद जब खरगोश की आँख खुली तो कछुआ फिनिशिंग लाइन तक पहुँचने वाला था। खरगोश तेजी से भागा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कछुआ रेस जीत गया।
Moral of the story: Slow and steady wins the race. धीमा और लगातार चलने वाला रेस जीतता है।
ये कहानी तो हम सब जानते हैं, अब आगे की कहानी देखते हैं:
रेस हारने के बाद खरगोश निराश हो जाता है, वो अपनी हार पर चिंतन करता है और उसे समझ में आ गया कि वह over-confident होने के कारण यह रेस हार गया…उसे अपनी मंजिल तक पहुँच कर ही रुकना चाहिए था।
अगले दिन वह फिर से कछुए को दौड़ की चुनौती देता है। कछुआ पहली रेस जीत कर आत्मविश्वाश से भरा होता है और तुरंत मान जाता है।
रेस होती है, इस बार खरगोश बिना रुके अंत तक दौड़ता जाता है, और कछुए को एक बहुत बड़े अंतर से हराता है।
Moral of the story: Fast and consistent will always beat the slow and steady. / तेज और लगातार चलने वाला धीमे और लगातार चलने वाले से हमेशा जीत जाता है।
यानि slow and steady होना अच्छा है लेकिन fast and consistent होना और भी अच्छा है।
For example, अगर किसी ऑफिस में इन दो टाइप्स के लोग हैं तो वे ज्यादा तेजी से आगे बढ़ते हैं जो fast भी हैं और अपने फील्ड में consistent भी हैं।
कहानी अभी बाकी है …. :)
इस बार कछुआ कुछ सोच-विचार करता है और उसे ये बात समझ आती है कि जिस तरह से अभी रेस हो रही है वह कभी-भी इसे जीत नहीं सकता।
वह एक बार फिर खरगोश को एक नयी रेस के लिए चैलेंज करता है, पर इस बार वह रेस का रूट अपने मुताबिक रखने को कहता है। खरगोश तैयार हो जाता है।
रेस शुरू होती है। खरगोश तेजी से तय स्थान की ओर भागता है, पर उस रास्ते में एक तेज धार नदी बह रही होती है, बेचारे खरगोश को वहीँ रुकना पड़ता है। कछुआ धीरे-धीरे चलता हुआ वहां पहुँचता है, आराम से नदी पार करता है और लक्ष्य तक पहुँच कर रेस जीत जाता है।
Moral of the story: Know your core competencies and work accordingly to succeed. / पहले अपनी strengths को जानो और उसके मुताबिक काम करो जीत ज़रुर मिलेगी.
For Ex: अगर आप एक अच्छे वक्ता हैं तो आपको आगे बढ़कर ऐसे अवसरों को लेना चाहिए जहाँ public speaking का मौका मिले। ऐसा करके आप अपनी organization में तेजी से ग्रो कर सकते हैं।
कहानी अभी भी बाकी है ….. :)
इतनी रेस करने के बाद अब कछुआ और खरगोश अच्छे दोस्त बन गए थे और एक दूसरे की ताकत और कमजोरी समझने लगे थे। दोनों ने मिलकर विचार किया कि अगर हम एक दूसरे का साथ दें तो कोई भी रेस आसानी से जीत सकते हैं।
इसलिए दोनों ने आखिरी रेस एक बार फिर से मिलकर दौड़ने का फैसला किया, पर इस बार as a competitor नहीं बल्कि as a team काम करने का निश्चय लिया।
दोनों स्टार्टिंग लाइन पर खड़े हो गए….get set go…. और तुरंत ही खरगोश ने कछुए को ऊपर उठा लिया और तेजी से दौड़ने लगा। दोनों जल्द ही नदी के किनारे पहुँच गए। अब कछुए की बारी थी, कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ बैठाया और दोनों आराम से नदी पार कर गए। अब एक बार फिर खरगोश कछुए को उठा फिनिशिंग लाइन की ओर दौड़ पड़ा और दोनों ने साथ मिलकर रिकॉर्ड टाइम में रेस पूरी कर ली। दोनों बहुत ही खुश और संतुष्ट थे, आज से पहले कोई रेस जीत कर उन्हें इतनी ख़ुशी नहीं मिली थी।
Moral of the story: cooperation is better than competitionअर्थात Team Work is always better than individual performance. / टीम वर्क हमेशा व्यक्तिगत प्रदर्शन से बेहतर होता है। Team work के लिए आपस में संवाद ,एक दूसरे की विशिष्टता को जानना और strategy के लिए मतैक्य होना बहुत ही आवश्यक है I
किसी भी मैच में Individually आप चाहे जितने बड़े performer हों लेकिन अकेले दम पर मैच नहीं जिता सकते।
अगर लगातार जीतना है तो आपको टीम में काम करना सीखना होगा, आपको अपनी काबिलियत के अलावा दूसरों की ताकत को भी समझना होगा। और जब जैसी situation हो, उसके हिसाब से टीम की strengths को use करना होगा।
इस कहानी में बहुत सी शिक्षाएं हैं केवल ध्यान देने की बात है । खरगोश और कछुआ दोनों ही अपनी हार के बाद निराश हो कर बैठ नहीं गए, बल्कि उन्होंने स्थिति को समझने की कोशिश की और अपने आप को नयी चुनौती के लिए तैयार किया। जहाँ खरगोश ने अपनी हार के बाद और अधिक मेहनत की वहीँ कछुए ने अपनी हार को जीत में बदलने के लिए अपनी strategy में बदलाव किया।
जब कभी आप फेल हों तो या तो अधिक मेहनत करें या अपनी रणनीति में बदलाव लाएं या दोनों ही करें, पर कभी भी हार को आखिरी मान कर निराश न हों…बड़ी से बड़ी हार के बाद भी जीत हासिल की जा सकती है!
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असली पूजा
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फ़ुर्सत में था , सोचा चलो आज थोड़ी सी जिंदगी सुलझा लूँ । अलमारी खोली तो ढ़ेर सारे सपनें नीचे गिर गये , ना जाने कब से रखे थे वहाँ , बे...