Wednesday, June 19, 2019

नीला रूमाल


नीला रूमाल 
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"अब कैसी हो.? "एक अनजानी सी आवाज सुनकर. मैंने आवाज़ की तरफ गर्दन घुमानी चाही तो मेरे होठों से एक दर्द भरी सिसकारी निकल गई.
"बहुत दर्द हो रहा है. "एक पुलिस वाले को अपने ऊपर झुके देखकर मैं घबरा गई.
मैं कभी उसे, कभी हाथ में चढ़ते ग्लूकोज को देख रही थी.
"आप परेशान न हो. सड़क पार करते समय एक अ|टो वाला आपको टक्कर मारकर चला गया था. गिरने के बाद आप बेहोश हो गई थीं. मैं उधर से ड्यूटी जा रहा था. आपको यहां भर्ती कर दिया. "वह नपे तले शब्दों में बोला.
"ओह, धन्यवाद. "मैंने धीरे से कहा. मुझे याद आया कि मैं मॉ के घर जाने के लिए घर से निकली थी.
"धन्यवाद की कोई बात नहीं है. मेरा फर्ज था. वैसे भी पुलिस वाला हूँ. "कहकर वह वो हल्के से हँसा.
"मेरी बजह से आपकी ड्यूटी. "
"आप चिन्ता न करें. मैंने फोन कर दिया है. आज की छुट्टी मिल गई है. "उसके शब्दों में स्नेह था.
इस बार मैंने उन्हें गौर से देखा. पुलिस की वर्दी में सोभ्य लग रहे थे. साथ ही उनकी वर्दी पर लगे स्टार बता रहे थे कि वो इंस्पेक्टर हैं.
"सर, आप नीला के साथ हैं. यह इंजेक्शन ले आइए. "नर्स ने पुलिस वाले के हाथ में दवाई का पर्चा  देते हुए कहा और हाथ में लगी ड्रिप निकालने लगी.
"इन्हें मेरा नाम कैसे पता? आप कह रहे थे कि मैं बेहोश थी. "एक बार फिर मैं संशय में पड़ गई.
"मैंने ही लिखाया था. "
"आपको कैसे....... "मेरी बात अधूरी रह गई. वह दवाई लेने चला गया.
मैं गुत्थियां सुलझाने लगी. इसे मेरा नाम कैसे पता. जानता होगा. लेकिन कैसे? अपनी जान पहचान वालों में उसका चेहरा नहीं मिल रहा था.
    वह वापिस आया तो उसके हाथ में दवाई के पैकिट के दूध का गिलास और बिस्किट भी थे.
दवाई नर्स को थमाकर, वह बिस्किट का पैकिट खोलने लगा.
"कुछ खा लीजिए. आपको इंजैक्शन लगेगा. "उसने मुझे सहारा देकर बिठाते हुए कहा.
"पहले राखी........ मेरे मुँह से निकला. "आज रक्षा बंधन था. मॉ के घर जा रही थी. राखी बांधने के बाद ही खाना था.
ओह, रुको, "उसने मेरी बात काटते हुए जेब से पर्स निकाला और उसमें से एक नीला रूमाल निकाल कर मेरी ओर बढ़ा  दिया.
 रूमाल मेरे हाथों में था. मैं कुछ पुरानी यादें जोड़ने की कोशिश करने लगी. मैंने रूमाल को पूरी तरह खोला तो अचानक मेरे मुँह से निकला -"यह रूमाल आपके पास कैसे? यह तो मेरा है. मैंने पहली बार इस पर अपना नाम काढ़ा था."
"सच में तुम नीला हो? "उसकी आँखों में बहुत सारे जुगनू एक साथ जगमगा गये.
"हां, यह रूमाल तो मैंने रक्षा  बंधन पर स्कूल में एक पुलिस वाले को बांधा था. "
"मुझे याद है. लड़कियां अफसरों के राखी बांध रही थीं.  उस समय मैं रंगरूट था. तुमने मुझे एक तरफ चुप और उदास खड़े देखा तो राखी की जगह यह रूमाल मेरी कलाई मैं बांध दिया था. तुमने स्कूल की यूनिफार्म के साथ भी पायल पहनी  हुई थीं. मैंने तुम्हारे पैर छूते हुए देखा था. मैं रंगरूट था. उस समय मेरे पास तुम्हें देने को कुछ नहीं था. साथ ही मेरी कोई बहन भी नहीं थीं. मैंने इस रूमाल को सहेज लिया. तब से रक्षाबंधन पर मैं इसी रूमाल को किसी भी बहन से कलाई में बंधबाता हूँ और उपहार में पायल ही देता हूँ. वह एक ही सांस में कह गया.
    मैं मंत्रमुग्ध सी  उसे देख रही थी.
"क्या सोच रही हो. आज मुझे बिछुड़ी बहन मिल गई है. अब किस बात का इंतजार. "वह मुझे खोया हुआ देखकर बोला.
"हां भैया, इस बार और यह रूमाल बंधवा  लो. आगे से राखी ही बांधूगीं. "कहते हुए मैंने उसकी कलाई में वह रूमाल बांध दिया.
लेकिन मैं यह रूमाल वापिस नहीं करूँगा. "वह हँसते हुए बोला.
मैं मुस्कुरा  दी  .
उसने जेब से पायल निकालीं और मेरे पैरों में पहनाने लगा.
जिदंगी के इस इत्तेफाक पर वह भी खुश था और मैं भी.

पंडित का एक वैश्या से प्रश्न


पंडित का एक वैश्या से प्रश्न ......

एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद अपने गांव लौटे। गांव के एक किसान ने उनसे पूछा, पंडित जी आप हमें यह बताइए कि पाप का गुरु कौन है? प्रश्न सुन कर पंडित जी चकरा गए, क्योंकि भौतिक व आध्यात्मिक गुरु तो होते हैं, लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनकी समझ और अध्ययन के बाहर था। पंडित जी को लगा कि उनका अध्ययन अभी अधूरा है, इसलिए वे फिर काशी लौटे।

 फिर अनेक गुरुओं से मिले। मगर उन्हें किसान के सवाल का जवाब नहीं मिला। अचानक एक दिन उनकी मुलाकात एक वेश्या से हो गई। उसने पंडित जी से उनकी परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी समस्या बता दी। वेश्या बोली, पंडित जी..! इसका उत्तर है तो बहुत ही आसान, लेकिन इसके लिए कुछ दिन आपको मेरे पड़ोस में रहना होगा। पंडित जी के हां कहने पर उसने अपने पास ही उनके रहने की अलग से व्यवस्था कर दी।

पंडित जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे, नियम-आचार और धर्म के कट्टर अनुयायी थे। इसलिए अपने हाथ से खाना बनाते और खाते। इस प्रकार से कुछ दिन बड़े आराम से बीते, लेकिन सवाल का जवाब अभी नहीं मिला।

एक दिन वेश्या बोली, पंडित जी...! आपको बहुत तकलीफ होती है खाना बनाने में। यहां देखने वाला तो और कोई है नहीं। आप कहें तो मैं नहा-धोकर आपके लिए कुछ भोजन तैयार कर दिया करूं। आप मुझे यह सेवा का मौका दें, तो मैं दक्षिणा में पांच स्वर्ण मुद्राएं भी प्रतिदिन दूंगी।

स्वर्ण मुद्रा का नाम सुन कर पंडित जी को लोभ आ गया। साथ में पका-पकाया भोजन। अर्थात दोनों हाथों में लड्डू। इस लोभ में पंडित जी अपना नियम-व्रत, आचार-विचार धर्म सब कुछ भूल गए। पंडित जी ने हामी भर दी और वेश्या से बोले, ठीक है, तुम्हारी जैसी इच्छा। लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखना कि कोई देखे नहीं तुम्हें मेरी कोठी में आते-जाते हुए।

 वेश्या ने पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर पंडित जी के सामने परोस दिया। पर ज्यों ही पंडित जी खाने को तत्पर हुए, त्यों ही वेश्या ने उनके सामने से परोसी हुई थाली खींच ली। इस पर पंडित जी क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या मजाक है? वेश्या ने कहा, यह मजाक नहीं है पंडित जी, यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है।

यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ का भी नहीं पीते थे,मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने मेरे हाथ का बना खाना भी स्वीकार कर लिया।


यह लोभ ही पाप का गुरु है।...........

जगत की रीत

एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी | वहीं थोड़ी दुरी पर एक संत ने अपना बसेरा किया हुआ था| जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें अतः सभी संत के पास पहुंचे |

जब संत ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ ? तो लोगों ने कहा, “महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है । मन भी नहीं होता पानी पीने को।”

संत ने पुछा- हुआ क्या ? पानी क्यों नहीं पी सकते हो ?

लोग बोले- तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे। बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में। अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ?

संत ने कहा - 'एक काम करो ,उसमें गंगाजल डलवाओ,
तो कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया । फिर भी समस्या जस की तस।”

लोग फिर से संत के पास पहुंचे। अब संत ने कहा, "भगवान की कथा कराओ।”

लोगों ने कहा, “ठीक है।” कथा हुई, फिर भी समस्या जस की तस।

लोग फिर संत के पास पहुंचे। अब संत ने कहा, उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ।

सुगंधित द्रव्य डाला गया, नतीजा फिर वही। ढाक के तीन पात।

लोग फिर संत के पास, अब संत खुद चलकर आये ।

लोगों ने कहा- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया । गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं।

अब संत आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका मन कैसे नहीं बदला।

तो संत ने पुछा- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते जो मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ?

लोग बोले - उनके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया। वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं ।

संत बोले - जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।

बात यह है कि हमारे आपके जीवन की यह कहानी है। इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं । इन्हीं की सारी बदबू है।

हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं, तीर्थयात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ।

सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है । तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें तभी जीवन उपयोगी होगा |

Tuesday, June 18, 2019

ससुराल में बेटी नही समझा जाता

मेरी पोस्ट उन तमाम लड़कियों के लिए है जिनको ये शिकायत है कि हमको ससुराल में बेटी नही समझा जाता।
पहले ये जानना जरूरी है कि बेटी थी तब क्या रोल था आपका घर में..आप आराम से उठती थी देर तक सोती रहती थी,खाना चाय नाश्ता सब मम्मी बना देती थी बाकी काम मेड करती थी कभी कभार आप घर के काम मे हाथ बंटाती थी।
अब बताएं कि आप की मम्मी भी यदि यही सोचती की मैं भी ससुराल में बेटी की तरह रहूंगी तो क्या आपको ये आराम मिलता नहीं,शादी से पहले आप मां बाप की जिम्मेदारी है इसलिए वो आपकी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते है,शादी के बाद आपके ऊपर भी आपकी माँ की तरह जिम्मेदारी आती है तो आपको भी वो करना होगा जो माँ घर मे करती थी।हम लोग अपनी शादी से पहले की ज़िंदगी खूब ऐश के साथ काटकर आते है अब जब हम पर जिम्मेदारी आयी तो घबराना क्यों,क्यों शिकायत करना ।
अब मुझे बताएं यदि आप पीहर आएं आपकी भाभी देर तक सोती रहे मम्मी रसोई में काम करें तो क्या आप उस भाभी की तारीफ करेंगी ??कभी नहीं आप मां से कहेंगी की आप क्यो रसोई में खटती है भाभी को करने दिया करो,कौन लड़की ऐसी है जो भाभी से ये कहे कि भाभी आप खूब आराम करो मम्मी सब कर लेगी??
अब एक बात जो वो कहती है कि हम सिर्फ सास ससुर पति और अपने बच्चों का करेंगे दूसरों का नही मतलब देवर ननद जेठ ...अब इसका मुझे जवाब दें कि आपके भाई की शादी पहले हो गयी और भाभी आ गयी वो सब का खाना बनाए और आपका नही तो क्या आप या आपके मां बाप को सहन होगा ,बिल्कुल नहीं...इसलिए यदि जो आप चाह रही है वो आपकी भाभी आपके साथ करे तो बुरा नही लगना चाहिए।आपको अपनी ननद उनके बच्चों का आना बुरा लगता है तो आप भी सोच लीजिये आप की भाभी भी आपके आने से खुश नही होगी।
कभी सोचा है आपने अपनी मां को घर मे पीहर की तरह महसूस करवाया है??यदि नही तो आप कैसे उम्मीद करती है कि आपको महसूस हो। क्या माँ ने कभी ये शिकायत की कि मुझे जल्दी उठना पड़ता था,काम करना पड़ता था,शायद कभी नहीं वो तो सर दर्द होने पर भी आप लोगो के लिए खाना बनाती थी।......हर जगह का अपना महत्व है ।इसलिए दोनों को महत्व दीजिये।जो लड़कियां समझती है वो तारीफ के काबिल है।

क्रोध में दिए घाव कभी नही भरते

बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था. वह बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आपा खो बैठता और लोगों को भला-बुरा कह देता. उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, ”अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना।”

पहले दिन उस लड़के को चालीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी.पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी,उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया कि उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी अपना आपा नही खोया।

जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्होंने ने फिर उसे एक काम दे दिया, उन्होंने कहा कि, ”अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना।”

लड़के ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब लड़के ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने पिता को ख़ुशी से ये बात बतायी।

तब पिताजी उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, ” बेटे तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो। अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था। जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं।”

इसलिए अगली बार अपना आपा खोने से से पहले आप भी ये जरूर सोच लें कि ये सामने वाले पर कितना गहरा घाव छोड़ सकता है, हो सकता है उस समय आपका गुस्सा आपको जायज लगे लेकिन ये भी हो सकता है की बाद में आपको अत्याधिक पश्चाताप करने पर भी शांति न मिले !!

Saturday, June 15, 2019

अच्छी सोच

उम्र 48 की थी, मगर थी अभी भी बला की खूबसूरत .... हस्बैंड के एक्सपायर होने के बाद कॉलेज स्टूडेंट्स का ट्यूशन लेकर घर चलाती थी वो ......
"गुड इवनिंग सुष्मिता मेम !" शैलेश ने ट्यूशन के लिए मेम के घर पर पहुँचते ही कहा।
"आओ शैलेश!" .....शैलेश के शरीर से बहुत ही मनमोहक खुशबू आ रही थी। सुष्मिता ने ही कहा था उसके पेपर जांचने के बाद कि उसे किसी हेल्प की जरुरत हो तो वह आ सकता है उसके घर पढ़ने के लिए।......शैलेश कॉलेज स्टूडेंट था और मन में कई तरह के भाव थे उसके। वो तो अपनी फेवरेट मेम से इस अचानक मिले निमंत्रण पर हैरान था। वह घर की दीवारों पर इधर- उधर देख रहा था। सुष्मिता चाय बनाने अन्दर चली गई थी। दीवार पर राधा-कृष्ण की बड़ी ही सुन्दर पेंटिंग सजी हुई थी।
"लगता है मेम को प्रेम हुआ है।" उसने सीने में साँस भरी ......और मन में चल रहे विचारों ने उसके होंठों की लाली को और बढ़ा दिया ।
"शैलेश यहाँ आ जाओ।" सुष्मिता ने चाय की ट्रे रखते हुए उसे ट्यूशन रूम में बुलाया । शैलेश के मन में इंटरनेट पर देखे कई वीडियो घूम गए। उसे सुष्मिता सिर्फ़ औरत ही दिखाई दे रही थी। शैलेश चेयर पर जाकर बैठ गया।
"शैलेश! तुम्हारी इंग्लिश तो ठीक ही है मगर तुम्हारे आंसर में कंटेंट बहुत कम है। क्या तुम्हे ये सब्जेक्ट सही से समझ नहीं आता ? .....कोई भी प्रॉब्लम हो तो खुलकर पूछ सकते हो।" चाय का कप आगे बढाते हुए बोली सुष्मिता ।
"मैम! मैंने कोशिश तो की है लेकिन आप मुझे कोई अच्छी गाइड या बुक्स सजेस्ट कर दीजिए।" शैलेश बोला।
सुष्मिता काफी देर तक सब्जेक्ट को क्लियर करती रहीं। उसे हर बात को समझाती रही। शैलेश ध्यान से सुनने की कोशिश कर रहा था पर शैलेश की नजर बुक पर कम सुष्मिता पर ज्यादा थी .......
"शैलेश ! अब जाकर सब्जेक्ट को अच्छे से रिवाइज कर लेना। ये कुछ नोट्स हैं।" सुष्मिता ने पेपर थमाते हुए कहा।
"जी मैम! मैं ख्याल रखूंगा कि अगली बार मेरे नंबर अच्छे आयें।"
"हाँ, मैं भी यही चाहती हूँ कि मेरा कोई भी स्टूडेंट कमजोर न रहे। कोई भी दिक्कत हो तो तुम मुझसे कभी भी पूछ सकते हो।"
शैलेश तो न जाने क्या सोचकर आया था। मगर यहाँ तो मैम कोई सिग्नल ही नहीं दे रहीं थीं। शैलेश का मन अधीर हो उठा था।
"क्या मैं वास्तव में अब जाऊं मेम!" मेम की आँखों में आँखें डालते हुए मुस्कुराया दिया वो ।
"हाँ, अब मेस भी बंद होने का समय है। मैं तो रात को सिर्फ़ खिचड़ी खाती हूँ। शैलेश बेटा अगर चाहो तो तुम भी खा सकते हो मेरे साथ। पर तुम लोग तो चटपटा पसन्द करते हो।"
शैलेश को काटो तो जैसे खून नहीं था। निगाहें जमीन की तरफ़ गड गई थीं। अब वह सुष्मिता की तरफ़ देख भी नहीं पा रहा था।
"शैलेश! अगर आज मेरा बेटा होता तो शायद तुम्हारे जैसा ही होता। तुम क्लास में रीना को पसन्द करते हो ऐसा लगता है मुझे। जीवन में प्यार जरुरी है, मगर प्यार को पाने के लिए और बनाए रखने के लिए पढ़ाई, अच्छी नौकरी, व्यापार और अच्छी सोच का होना जरुरी है। मैं सब के सामने तुम्हें शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी। मैं जानती हूँ कि तुम्हारी उम्र की कमजोरियां क्या हैं इसलिए तुम्हें घर बुलाया था। अब मैं उम्मीद करती हूँ कि तुम मुझे निराश नहीं करोगे।"
"यस मैम, मैं आपको शिकायत का मौका नहीं दूँगा।" शैलेश जाने के लिए उठ खड़ा हुआ था।
सुष्मिता ने एक डिब्बा उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये क्या है, मैम?"
"ले जाओ, खाना खाने के बाद खाना, इसमें मेरे हाथ के बनाए लड्डू हैं। बड़ी इच्छा होती है कभी-कभी कि कोई माँ कहकर पुकारता मुझे भी।" सुष्मिता के ऐसा कहते ही शैलेश भावुक हो गया।
"क्या मैं......." और सुष्मिता ने उसके सिर पर हाथ रख दिया था। सुकून की गंगा जैसे उसके सारे गलत विचारों को बहा ले गई थी। अब वह रुक नहीं पा रहा था वहाँ।
"गुड नाईट माँ......" आँसू पोंछते हुए बस इतना ही कह पाया वो ।

समाधान वृक्ष

सरला नाम की एक महिला थी । रोज वह और उसके पति सुबह ही काम पर निकल जाते थे ।
दिन भर पति ऑफिस में अपना टारगेट पूरा करने की ‘डेडलाइन’ से जूझते हुए साथियों की होड़ का सामना करता था। बॉस से कभी प्रशंसा तो मिली नहीं और तीखी-कटीली आलोचना चुपचाप सहता रहता था ।
पत्नी सरला भी एक प्रावेट कम्पनी में जॉब करती थी । वह अपने ऑफिस में दिनभर परेशान रहती थी ।
ऐसी ही परेशानियों से जूझकर सरला लौटती है। खाना बनाती है।
शाम को घर में प्रवेश करते ही बच्चों को वे दोनों नाकारा होने के लिए डाँटते थे... पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-करते बदहवास और चिड़चिड़ी हो जाती है। घर और बाहर के सारे काम उसी की जिम्मेदारी हैं।
थक-हार कर वह अपने जीवन से निराश होने लगती है। उधर पति दिन पर दिन खूंखार होता जा रहा है। बच्चे विद्रोही हो चले हैं।
एक दिन सरला के घर का नल खराब हो जाता है । उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया ।
प्लम्बर ने आने में देर कर दी। पूछने पर बताया कि साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई। घर से लाया खाना मिट्टी में गिर गया, ड्रिल मशीन खराब हो गई, जेब से पर्स गिर गया…।
इन सब का बोझ लिए वह नल ठीक करता रहा।
काम पूरा होने पर महिला को दया आ गई और वह उसे गाड़ी में छोड़ने चली गई।
प्लंबर ने उसे बहुत आदर से चाय पीने का आग्रह किया।
प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया, चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया।
घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा खिल उठा। बच्चों को प्यार किया, मुस्कराती पत्नी को स्नेह भरी दृष्टि से देखा और चाय बनाने के लिए कहा।
सरला यह देखकर हैरान थी। बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया – यह मेरा परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है। मैं सारी समस्याओं का बोझा रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं और घर में कदम रखने से पहले मुक्त हो जाता हूँ। चिंताओं को अंदर नहीं ले जाता। सुबह जब थैला उतारता हूं तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है।

काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर एक बात पक्की है- मेरी पत्नी और बच्चे उनसे अलग ही रहें, यह मेरी कोशिश रहती है। इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़ आता हूं। प्रार्थना करता हूँ कि भगवान मेरी मुश्किलें आसान कर दें। मेरे बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं, पत्नी मुझे बहुत स्नेह देती है, तो भला मैं उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ ।

उसने राहत पाने के लिए कितना बड़ा दर्शन खोज निकाला था…! यह घर-घर की हकीकत है। गृहस्थ का घर एक तपोभूमि है। सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें सुखी नहीं रह सकता। जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं, हमारी समस्याएं भी नहीं।

प्लंबर का वह ‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है। क्यों न हम सब भी एक-एक वृक्ष ढूँढ लें ताकि घर में कदम रखने से पहले अपनी सारी चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ..।

सदैव प्रसन्न रहिये
जो प्राप्त है-पर्याप्त है

असली पूजा

ये  लड़की  कितनी नास्तिक  है ...हर  रोज  मंदिर के  सामने  से  गुजरेगी  मगर अंदर  आकर  आरती  में शामिल  होना  तो  दूर, भगवान  की  मूर्ति ...