सुखी आदमी के जूते
एक व्यक्ति अपने गुरु के पास गया और बोला, गुरुदेव, दुख से छूटने का कोई उपाय बताइए।
शिष्य ने थोड़े शब्दों में बहुत बड़ा प्रश्न किया था। दुखों की दुनिया में जीना लेकिन उसी से मुक्ति का उपाय भी ढूंढना! बहुत मुश्किल प्रश्न था।
गुरु ने कहा, एक काम करो, जो आदमी सबसे सुखी है, उसके पहने हुए जूते लेकर आओ। फिर मैं तुझे दुख से छूटने का उपाय बता दूंगा।
शिष्य चला गया। एक घर में जाकर पूछा, भाई, तुम तो बहुत सुखी लगते हो। अपने जूते सिर्फ आज के लिए मुझे दे दो।
उसने कहा, कमाल करते हो भाई! मेरा पड़ोसी इतना बदमाश है कि क्या कहूं? ऐसी स्थिति में मैं सुखी कैसे रह सकता हूं? मैं तो बहुत दुखी इंसान हूं।
वह दूसरे घर गया। दूसरा बोला, अब क्या कहूं भाई? सुख की तो बात ही मत करो। मैं तो पत्नी की वजह से बहुत परेशान हूं।
ऐसी जिंदगी बिताने से तो अच्छा है कि कहीं जाकर साधु बन जाऊं। सुखी आदमी देखना चाहते हो तो किसी और घर जाओ।
वह तीसरे घर गया, चैथे घर गया। किसी की पत्नी के पास गया तो वह पति को क्रूर बताती, पति के पास गया तो वह पत्नी को दोषी कहता।
पिता के पास गया तो वह पुत्र को बदमाश बताता। पुत्र के पास गया तो पिता की वजह से खुद को दुखी बताता।
सैकड़ों-हजारों घरों के चक्कर लगा आया। सुखी आदमी के जूते मिलना तो दूर खुद के ही जूते घिस गए।
शाम को वह गुरु के पास आया और बोला, मैं तो घूमते-घूमते परेशान हो गया। न तो कोई सुखी मिला और न सुखी आदमी के जूते।
गुरु ने पूछा, लोग क्यों दुखी हैं? उन्हें किस बात का दुख है?
उससे कहा, किसी का पड़ोसी खराब है। कोई पत्नी से परेशान, कोई पति से दुखी तो कोई पुत्र से परेशान है।
आज हर आदमी दूसरे आदमी के कारण दुख भोग रहा है।
गुरु ने बताया, सुख का सूत्र है - दूसरे की ओर नहीं, बल्कि अपनी ओर देखो।
खुद में झांको। खुद की काबिलियत पर गौर करो। प्रतिस्पर्द्धा करनी है तो खुद से करो, दूसरों से नहीं।
जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो। खुद को सुनो, खुद को देखो। यही सुख का सूत्र है।
शिष्य बोला, महाराज, बात तो आपकी सत्य है लेकिन यही आप मुझे सुबह भी बता सकते थे। फिर इतनी परिक्रमा क्यों करवाई?
गुरु ने कहा, वत्स, सत्य दुष्पाच्य होता है। वह सीधा नहीं पचता। अगर यह बात मैं सुबह बता देता तो तू हर्गिज नहीं मानता।
जब स्वयं अनुभव कर लिया, सबकी परिक्रमा कर ली, सबके चक्कर लगा लिए, तो बात समझ में आ गई।
अब ये बात तुम पूरे जीवन में नहीं भूलोगे।
जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो।
Wednesday, June 26, 2019
इन्वेस्टमेंट
इन्वेस्टमेंट
”श्वेता, दो दिनों से देख रही हूं, जिसे देखो बस तेरे गुणगान गाता है… तू है बड़ी लकी… तेरी फ़िक़्र तो ऐसे करते हैं, जैसे तू बहू नहीं, इस घर की बेटी हो.” निकिता के मुंह से अनायास निकले शब्दों पर श्वेता मुस्कुराकर बोली, “सच दीदी, शादी के पहले डर लगता था, ना जाने कैसा परिवार मिले, एडजस्टमेंट हो पाएगा या नहीं? पर अब ऐसा लगता है, जैसे ये परिवार मेरे लिए ही बना था. बस, मैंने यहां रहना शुरू नहीं किया था. सब कुछ कितना सहज, कितना प्यारा है. सब अपने लगते हैं.”
“ओके-ओके, अब इतना भी मत डूब जा अपनी ससुराल में कि तेरा अपना अलग वजूद ही ना रहे. सच बताऊं, तो लकी तू नहीं, तेरे ससुरालवाले हैं, जिन्हें तेरी जैसी नौकरीपेशा और बेवकूफ़ बहू मिली है.” अपनी बड़ी बहन निकिता की विरोधाभासी बात पर सन्न श्वेता उसका चेहरा ताकती रह गई. कुछ पल को लगा शायद यह मज़ाक था या सुनने में कुछ ग़लती हुई थी.
पहली बार छोटी बहन की ससुराल आई निकिता दीदी के तीन दिन के प्रवास को जीवंत बनाने में श्वेता के सास-ससुर और पति उदित ने कोेई कसर नहीं छोड़ी थी. श्वेता साफ़ देख रही थी कि उसके वजूद को हाथोंहाथ लिए उसकी हर इच्छा को सम्मान देनेवाले इस नए भरे-पूरे परिवार को देखकर निकिता अभिभूत है. ऐसे में इस तरह की टिप्पणी… यथार्थ से नितांत परे थी.
“क्या हुआ श्वेता? बुरा मान गई क्या? मैं तो बस इतना चाहती हूं कि दूसरों को ख़ुश करने और वाहवाही लूटने के चक्कर में तू अपना मटियामेट ना कर ले. यूं ही पूरी तनख़्वाह लाकर उदित के हाथ में दे देती है और उदित अपनी मम्मी को, और तो और, आए दिन सबके लिए गिफ्ट लाती रहती है. ये सब क्या है? जब से आई हूं, तेरी सास के मुंह से सुन रही हूं, श्वेता ने ये दिया, श्वेता ने वो दिया. कुछ उन्होंने भी दिया है या नहीं.”
“दीदी, उन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया है. उदित जैसा प्यार करनेवाला पति और अपना संरक्षण, जिसके तले हम अपना जीवन सुकून से बिता रहे हैं. लाइफ में और क्या चाहिए? रही मम्मी-पापा की बात, तो उनको अपनी पेंशन मिलती है. हम क्या दे सकते हैं उन्हें? दे तो वो रहे हैं हमें, एक स्ट्रेसफ्री लाइफ…”
“फिर भी श्वेता किसी के हाथ में अपनी सारी सैलेरी रख देना, अ़क्लमंदी नहीं है. आज ये प्यार लुटा रहे हैं, कल क्या हालात हों, कौन जानता है. ये तो ख़ुदकुशी करने जैसा है.
मुझे देख, अपनी और अमोल दोनों की सैलेरी को मुट्ठी में रखती हूं.”
“दीदी, थोड़ा समर्पण और उनका विश्वास भी अपनी मुट्ठी में करना सीखो, वरना ये तो निरी रेत है, फिसल गई, तो हाथ खाली रह जाएंगे.”
“रहने दे श्वेता, समर्पण और विश्वास निरी क़िताबी बातें हैं. यही रिश्ते कल क्या रूप धरें, कौन जानता है?”
“कल के हालात से डरकर हम आज रिश्तों में दरारें डालें, उन्हें खाद-पानी से वंचित, स़िर्फ इसलिए सूखने दें कि कल इसमें फल कहीं कड़वे ना लग जाएं. आप जिसे बेव़कूफ़ी कह रही हैं, मैं उसे इन्वेस्टमेंट कहती हूं. रिश्तों का इन्वेस्टमेंट…
मेरी मानिए, तो आप भी अपनी ससुराल में यह इन्वेस्टमेंट करके जीवनभर मुनाफ़ा कमाइए.”
“तू और तेरी बड़ी-बड़ी बातें… कल जब ये लोग सब कुछ तेरी ननद को उठाकर दे देंगे, तब देखती हूं, तेरा ये इन्वेस्टमेंट कहां काम आता है?” श्वेता चुप थी. शायद दीदी को बदलना उसके हाथ में नहीं था. पर निकिता ख़ुश थी… आख़िर आज उसे श्वेता को नीचा दिखाने का मौक़ा मिल ही गया. याद आया, किस तरह से उससे तीन साल छोटी बहन ने अमोल के सामने उसे निरुत्तर कर दिया था. एक बार निकिता ने श्वेता को बताया कि अमोल ने उससे घर के पज़ेशन के वक़्त थोड़ी-सी फाइनेंशियल हेल्प मांगी थी, पर निकिता ने अमोल को साफ़ मना कर दिया था कि घर के बारे में सोचना उसका काम है. अगर वह हाउसवाइफ होती, तो क्या वह इंतज़ाम नहीं करते. यह बात अमोल को चुभी थी. उस दिन के बाद निकिता से कभी कुछ नहीं मांगा. निकिता की इस बात पर श्वेता ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे दिन दीपावली की रात अमोल ने निकिता को सोने के झुमके दिए, तो निकिता ने इतराते हुए कहा था, “दुनिया का दस्तूर है, पति की कमाई पर पत्नी का पूरा अधिकार और पत्नी की कमाई सौ टका पत्नी की. उसमें कोई हाथ नहीं लगा सकता है.” उस वक़्त श्वेता ने अपने जीजाजी का पक्ष लेते हुए हंसकर कहा था. “दीदी, ये ग़लतफ़हमी मत रखना कि हाउसवाइफ मिलने पर जीजू के हाथ खाली रह जाते. सुबह से लेकर रात को सोने तक जीजू जिस तरह से तुम्हारा हाथ बंटाते हैं, वह क़ाबिले-तारीफ़ है. आप जॉब नहीं कर रही होतीं, तो सुबह-सुबह बस स्टॉप छोड़ने की चिंता छोड़ जीजू आराम से सो रहे होते. जीजू को गर्म खाना, सुबह-शाम की चाय तो मिलती. तुम्हारे पीछे आनेवाली नौकरों की फौज संभालने का झंझट नहीं रहता.”
“अरे, बस कर, तू मेरी बहन है या दुश्मन.” निकिता ने श्वेता को टोका था. तीन साल पहले घटी इस बात को श्वेता मज़ाक समझकर भूल गई थी, पर निकिता इस सच को अमोल के सामने उजागर करने के अपराध से श्वेता को मुक्त नहीं कर पाई थी. आज
हाथ आया मौक़ा वो कैसे गंवाती, तभी शायद श्वेता को उसकी तल्ख़ बातों का सामना करना पड़ा था.
निकिता कुछ और कहती, उससे पहले श्वेता की सास दमयंतीजी आ गईं. उन्होंने श्वेता से अपने कुंदनवाले सेट को आलमारी से निकालने को कहा. बड़े अधिकार से गुच्छे को संभालती श्वेता आलमारी से कुंदन का सेट निकालकर लाई, तो मां उसे हाथों में उठाकर तौलती-सी श्वेता से बोलीं, “नंदिनी बहुत दिनों से कुंदनवाले सेट की तारीफ़ कर रही है. मुझे लगता है उसे पसंद है. सोच रही हूं, ऐसे ही हल्के में बनवाकर उसे दे दूं.”
“मम्मी, आप दीदी को यही सेट क्यों नहीं दे देतीं.” बोलती श्वेता की नज़र सहसा निकिता से मिली. वह जलती नज़रों से उसे घूर रही थी, तो उसने अचकचाकर आंखें फेर लीं.
दमयंतीजी ने कुछ नहीं कहा. बस, मुस्कुराकर सेट लेकर चली गईं. निकिता श्वेता की बेव़कूफ़ी पर कुछ कहती, उससे पहले श्वेता ने वहां से निकलने में अपनी भलाई समझी.
दूसरे दिन श्वेता की शादी की पहली सालगिरह थी. निकिता उसके कमरे में गिफ्ट लेकर पहुंची तो देखा, वह अपनी ननद नंदिनी से फोन पर बतिया रही थी, “दीदी, आप नहीं आएंगी, तो मज़ा आधा रह जाएगा, पर कोई बात नहीं. आप बच्चों के इम्तहान दिलाइए. पलक से कहना ख़ूब अच्छे नंबर लेकर आए. उसकी मामी ने उसके अच्छे रिज़ल्ट के लिए गिफ़्ट अभी से ख़रीद लिया है.” श्वेता ने फोन रखा ही था कि निकिता फिर शुरू हो गई थी. “श्वेता, गिफ्ट लेने का अधिकार तेरा बनता है.”
“ओहो दीदी! बेटी होने के नाते नंदिनी दीदी की ख़ुशी इस घर से जुड़ी है. वो ख़ुश, तो सब ख़ुश… रिश्तों में इन छोटी-मोटी भेंटों के बड़े मायने होते हैं. ये सब रिश्तों का इन्वेस्टमेंट हैं, जिसमें मेरी निकिता दीदी कभी विश्वास नहीं करती हैं.” उसने हंसते हुए कहा, “उ़फ्! तू और तेरा इन्वेस्टमेंट… गंवा देगी एक दिन अपनी सारी कमाई. विश्वास नहीं होता कि तू मेरी बहन है और ये क्या बात हुई कि मुझे रिश्तों में विश्वास नहीं है, ऐसा होता तो तेरे कहने से मैं छुट्टी लेकर तेरी मैरिज एनिवर्सरी मनाने ना चली आती.” निकिता की बात पर श्वेता ने प्यार से उनके हाथों को पकड़कर कहा, “उसके लिए मेरी प्यारी दीदी को बहुत-बहुत थैंक्स. पर एक बात बोलूं, बुरा मत मानना. मायके से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान है, क्योंकि वो बचपन से जुड़े हैं, हमें आदत है उनकी, लेकिन ससुराल से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान नहीं है. उसके लिए आपसी समझ, विश्वास और समर्पण ज़रूरी है और उसी में हम चूक कर जाते हैं.” आज के दिन निकिता छोटी बहन से बहस नहीं करना चाहती थी, सो वो चुपचाप उसे गिफ्ट देकर चली गई.
शाम तक घर सबकी हंसी से गुलज़ार था. पर निकिता का मन दरक रहा था. पिछले हफ़्ते उसकी शादी की सालगिरह तो यूं ही निकल गई.
चाहती तो अमोल के साथ कुछ सार्थक पल बिता लेती, लेकिन वो व्यावहारिक थी. जानती थी इन भावनात्मक पहलुओं से जुड़कर जीवन नहीं चलता. अमोल आनेवाली एनिवर्सरी को लेकर पसोपेश में थे. ऐसे में निकिता ने उन्हें दुविधा से उबारते हुए कहा, “तुम्हारा टूर पर जाना बहुत ज़रूरी है. टारगेट पूरा नहीं किया, तो फाइनेंशियली प्रॉब्लम हो जाएगी. घर का पज़ेशन लेना है.”
“घर नहीं, मकान.”
“हां-हां वही…” अमोल के व्यंग्यबाण को नज़रअंदाज़ कर, मन ही मन मुस्कुराते हुए बोली, “कितनी भी कोशिश कर लो, भावनाओं में बहकर, अपनी सैलेरी में हाथ नहीं लगाने दूंगी.” अपनी सेविंग्स में बरती गोपनीयता निकिता की मंशा जता देती थी. शादी के तीन साल बाद भी निकिता अमोल के परिवारवालों को अपना नहीं पाई थी. निकिता का कुछ था, तो अमोल का बनवाया मकान, उसके दिए ज़ेवर और पूरी तनख़्वाह, जिसका हिसाब-क़िताब वो समय-समय पर करती थी. उसका हमेशा से मानना रहा है कि स्त्री को अपने पैसों और अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई परेशानी ना हो. निकिता की ज़िद पर अमोल ने मकान के लिए लोन लिया, पर लोन चुकाने के चक्कर में उसे ओवरटाइम तक करना पड़ा, जिससे उसकी सेहत तक बिगड़ी. बढ़ती सेविंग्स निकिता के भविष्य को सिक्योर करती गई, पर वर्तमान उसके हाथ से कब फिसला, वह जान ही नहीं पाई.
पति और परिवार के साथ बिताए हल्के-फुल्के पलों की क़ीमत उसने नहीं आंकी थी. घर के पज़ेशन के समय भुगतान की चिंता में डूबे अमोल की हालत उसके पिता से देखी नहीं गई, उन्होंने अपनी जमापूंजी बेटे के हवाले की, तो निकिता को अपनी चतुराई पर मान हो आया. डर था कि कहीं अमोल उससे रुपए ना मांग ले, पर यहां तो सब आसानी से हल हो गया. निकिता विचारों में खोई बैठक की ओर आई, तो वहां बैठी दमयंतीजी अपने पति से बोल रही थीं, “सुनो… कुंदन का सेट मैं इस बार श्वेता को दे रही हूं. अपनी श्वेता आगे बढ़कर तो मांगेगी नहीं, सोच रही हूं गिफ्ट के बहाने दे दूंगी.” “ऊंह! बेव़कूफ़ श्वेता, सब कुछ तो इनके हवाले कर देती है. सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को कोई हलाल करता है भला.” बुदबुदाती हुई निकिता उनके पास ही चली आई, मन की कसमसाहट और बढ़ गई थी.
उदित और श्वेता भी वहां आ ग
ए. दोनों झुककर दमयंतीजी और उमाकांतजी का आशीर्वाद लेने लगे. वो गदगद हो उठे, आशीर्वाद की झड़ी के साथ दमयंतीजी ने साधिकार बैठने का आदेश दिया और
मुस्कुराकर यह कहते हुए कुंदन का सेट श्वेता के हाथ में रख दिया, “आज इसे पहनकर डिनर पर जाना.”
“ओ मम्मी, लव यू…” श्वेता सास के गले लगी हुई थी, तभी उमाकांतजी की आवाज़ आई, “बिटिया, इसे पकड़ो और तुम लोग संभालो. पांच-पांच लाख की एफडी तुम्हारे और उदित के नाम है.”
“पर क्यों पापा?”
“क्यों की क्या बात है? सैलेरी तो तुम लोगों से संभलती नहीं, सो हमें दे देते हो. अब थोड़ी ज़िम्मेदारी तुम भी संभालो.” ससुर की आवाज़ में उलाहने का स्नेहभरा स्वांग था, जबकि आंखों में बेटे-बहू के प्रति गर्व झलक रहा था. वो बोल रहे थे.
“अब तुम लोगों को अपने बारे में सोचना नहीं आता, तो ये काम हमें करना पड़ेगा. उदित, तुम्हारी पुरानी एफडी मैच्योर हो रही है, उसे अब घर में लगा दो.”
“पापा, हम आपको इस घर में अच्छे नहीं लगते हैं क्या?” उदित की बात पर वो बोले, “आगे तुम लोग कहां रहते हो, वो बाद की बात है, फ़िलहाल एक घर तुम लोगों का अपना भी होना चाहिए. और ज़रूरी बात, नए घर की बुकिंग बहू के नाम से होगी…” ‘नए घर की बुकिंग’. ये अनुगूंज देर तक निकिता के कानों में गूंजती रही. प्रत्युत्तर में उसे अमोल की मम्मी के शब्द सुनाई दिए- ‘अमोल, घर अपने नाम से लेना.’ क्यों? का प्रश्न अमोल की तरफ़ से नहीं आया था. अमोल की मम्मी बोल रही थीं- ‘तेरी पत्नी बड़ी तेज़ है. अभी से इतना अपना-पराया है, तो बाद में क्या होगा.’ उफ़्! उस दिन आग लग गई थी निकिता के तन-बदन में. कितना सुनाया था अमोल को. पर वो चुपचाप सुनते रहे. शायद आईना दिखाकर ख़ुद को और उसे नीचे नहीं गिराना चाहते थे. अपने प्रति अविश्वास पर आश्चर्य व्यक्त करती निकिता आज चुप थी. वो देख पा रही थी, जो विश्वास श्वेता पर उसके सास-ससुर ने किया था, उसके पीछे श्वेता के छोटे-बड़े कई प्रयास थे, जिनका बड़ा प्रतिफल उसे मिला था. दमयंतीजी बोल रही थीं, “एक बार इनका घर बन जाए, तो चिंता दूर हो…”
‘घर नहीं, मकान…’ वहीं बैठी निकिता बोलना चाहती थी, पर सबके उल्लासित चेहरे देखकर चुप रही. जहां इतना उमंग-उत्साह, समर्पण-स्नेह और आदर हो, वहां मकान अपने आप ही घर बन जाता है.
एक बार फिर उसने श्वेता से ख़ुद की तुलना की तो दंग रह गई. श्वेता के गंवाने के बावजूद कई गुना हो, सब वापस कैसे मिला? जबकि उसके पास उतना ही रहा, जितना उसका हिस्सा था. वो भी सहसा हल्का हो गया. इतना हल्का कि पलड़ा हवा में लटक रहा था. जबकि श्वेता की संपदा में घरवालों का प्यार, संरक्षण और विश्वास था, तभी शायद उसका पलड़ा धरती को छू रहा था. निकिता ने बिना जांचे-परखे ही ससुराल और अमोल पर अविश्वास व्यक्त किया था. अमोल ने तो फिर भी जांच-परखकर निकिता के प्रति अविश्वास और स्वकेंद्रित नारी की छवि बनाई थी. शिकायत की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सच तो है… कितनी ऐसी ज़रूरतें आईं, जिसे वो सहज बांट सकती थी… पर ज़िम्मेदारियां और ज़रूरतें तो जीवनभर लगी रहेंगी, उसे पूरा करना पुरुष के अधिकार क्षेत्र में आता है, कहकर वह सदा अमोल को कुंठित करती रही. ख़ुद को चतुर समझनेवाली निकिता श्वेता की चतुराई पर हैरान थी. वो तो अपने हिस्से पर अपना डेरा डाले उसे सुरक्षित रखने की जद्दोज़ेहद में पड़ी रही. इधर श्वेता ने कितनी आसानी से अपने हिस्से पर सबको जगह देकर उनके दिलों पर अपना स्थान सुनिश्चित करा लिया था सदा के लिए…
”श्वेता, दो दिनों से देख रही हूं, जिसे देखो बस तेरे गुणगान गाता है… तू है बड़ी लकी… तेरी फ़िक़्र तो ऐसे करते हैं, जैसे तू बहू नहीं, इस घर की बेटी हो.” निकिता के मुंह से अनायास निकले शब्दों पर श्वेता मुस्कुराकर बोली, “सच दीदी, शादी के पहले डर लगता था, ना जाने कैसा परिवार मिले, एडजस्टमेंट हो पाएगा या नहीं? पर अब ऐसा लगता है, जैसे ये परिवार मेरे लिए ही बना था. बस, मैंने यहां रहना शुरू नहीं किया था. सब कुछ कितना सहज, कितना प्यारा है. सब अपने लगते हैं.”
“ओके-ओके, अब इतना भी मत डूब जा अपनी ससुराल में कि तेरा अपना अलग वजूद ही ना रहे. सच बताऊं, तो लकी तू नहीं, तेरे ससुरालवाले हैं, जिन्हें तेरी जैसी नौकरीपेशा और बेवकूफ़ बहू मिली है.” अपनी बड़ी बहन निकिता की विरोधाभासी बात पर सन्न श्वेता उसका चेहरा ताकती रह गई. कुछ पल को लगा शायद यह मज़ाक था या सुनने में कुछ ग़लती हुई थी.
पहली बार छोटी बहन की ससुराल आई निकिता दीदी के तीन दिन के प्रवास को जीवंत बनाने में श्वेता के सास-ससुर और पति उदित ने कोेई कसर नहीं छोड़ी थी. श्वेता साफ़ देख रही थी कि उसके वजूद को हाथोंहाथ लिए उसकी हर इच्छा को सम्मान देनेवाले इस नए भरे-पूरे परिवार को देखकर निकिता अभिभूत है. ऐसे में इस तरह की टिप्पणी… यथार्थ से नितांत परे थी.
“क्या हुआ श्वेता? बुरा मान गई क्या? मैं तो बस इतना चाहती हूं कि दूसरों को ख़ुश करने और वाहवाही लूटने के चक्कर में तू अपना मटियामेट ना कर ले. यूं ही पूरी तनख़्वाह लाकर उदित के हाथ में दे देती है और उदित अपनी मम्मी को, और तो और, आए दिन सबके लिए गिफ्ट लाती रहती है. ये सब क्या है? जब से आई हूं, तेरी सास के मुंह से सुन रही हूं, श्वेता ने ये दिया, श्वेता ने वो दिया. कुछ उन्होंने भी दिया है या नहीं.”
“दीदी, उन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया है. उदित जैसा प्यार करनेवाला पति और अपना संरक्षण, जिसके तले हम अपना जीवन सुकून से बिता रहे हैं. लाइफ में और क्या चाहिए? रही मम्मी-पापा की बात, तो उनको अपनी पेंशन मिलती है. हम क्या दे सकते हैं उन्हें? दे तो वो रहे हैं हमें, एक स्ट्रेसफ्री लाइफ…”
“फिर भी श्वेता किसी के हाथ में अपनी सारी सैलेरी रख देना, अ़क्लमंदी नहीं है. आज ये प्यार लुटा रहे हैं, कल क्या हालात हों, कौन जानता है. ये तो ख़ुदकुशी करने जैसा है.
मुझे देख, अपनी और अमोल दोनों की सैलेरी को मुट्ठी में रखती हूं.”
“दीदी, थोड़ा समर्पण और उनका विश्वास भी अपनी मुट्ठी में करना सीखो, वरना ये तो निरी रेत है, फिसल गई, तो हाथ खाली रह जाएंगे.”
“रहने दे श्वेता, समर्पण और विश्वास निरी क़िताबी बातें हैं. यही रिश्ते कल क्या रूप धरें, कौन जानता है?”
“कल के हालात से डरकर हम आज रिश्तों में दरारें डालें, उन्हें खाद-पानी से वंचित, स़िर्फ इसलिए सूखने दें कि कल इसमें फल कहीं कड़वे ना लग जाएं. आप जिसे बेव़कूफ़ी कह रही हैं, मैं उसे इन्वेस्टमेंट कहती हूं. रिश्तों का इन्वेस्टमेंट…
मेरी मानिए, तो आप भी अपनी ससुराल में यह इन्वेस्टमेंट करके जीवनभर मुनाफ़ा कमाइए.”
“तू और तेरी बड़ी-बड़ी बातें… कल जब ये लोग सब कुछ तेरी ननद को उठाकर दे देंगे, तब देखती हूं, तेरा ये इन्वेस्टमेंट कहां काम आता है?” श्वेता चुप थी. शायद दीदी को बदलना उसके हाथ में नहीं था. पर निकिता ख़ुश थी… आख़िर आज उसे श्वेता को नीचा दिखाने का मौक़ा मिल ही गया. याद आया, किस तरह से उससे तीन साल छोटी बहन ने अमोल के सामने उसे निरुत्तर कर दिया था. एक बार निकिता ने श्वेता को बताया कि अमोल ने उससे घर के पज़ेशन के वक़्त थोड़ी-सी फाइनेंशियल हेल्प मांगी थी, पर निकिता ने अमोल को साफ़ मना कर दिया था कि घर के बारे में सोचना उसका काम है. अगर वह हाउसवाइफ होती, तो क्या वह इंतज़ाम नहीं करते. यह बात अमोल को चुभी थी. उस दिन के बाद निकिता से कभी कुछ नहीं मांगा. निकिता की इस बात पर श्वेता ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे दिन दीपावली की रात अमोल ने निकिता को सोने के झुमके दिए, तो निकिता ने इतराते हुए कहा था, “दुनिया का दस्तूर है, पति की कमाई पर पत्नी का पूरा अधिकार और पत्नी की कमाई सौ टका पत्नी की. उसमें कोई हाथ नहीं लगा सकता है.” उस वक़्त श्वेता ने अपने जीजाजी का पक्ष लेते हुए हंसकर कहा था. “दीदी, ये ग़लतफ़हमी मत रखना कि हाउसवाइफ मिलने पर जीजू के हाथ खाली रह जाते. सुबह से लेकर रात को सोने तक जीजू जिस तरह से तुम्हारा हाथ बंटाते हैं, वह क़ाबिले-तारीफ़ है. आप जॉब नहीं कर रही होतीं, तो सुबह-सुबह बस स्टॉप छोड़ने की चिंता छोड़ जीजू आराम से सो रहे होते. जीजू को गर्म खाना, सुबह-शाम की चाय तो मिलती. तुम्हारे पीछे आनेवाली नौकरों की फौज संभालने का झंझट नहीं रहता.”
“अरे, बस कर, तू मेरी बहन है या दुश्मन.” निकिता ने श्वेता को टोका था. तीन साल पहले घटी इस बात को श्वेता मज़ाक समझकर भूल गई थी, पर निकिता इस सच को अमोल के सामने उजागर करने के अपराध से श्वेता को मुक्त नहीं कर पाई थी. आज
हाथ आया मौक़ा वो कैसे गंवाती, तभी शायद श्वेता को उसकी तल्ख़ बातों का सामना करना पड़ा था.
निकिता कुछ और कहती, उससे पहले श्वेता की सास दमयंतीजी आ गईं. उन्होंने श्वेता से अपने कुंदनवाले सेट को आलमारी से निकालने को कहा. बड़े अधिकार से गुच्छे को संभालती श्वेता आलमारी से कुंदन का सेट निकालकर लाई, तो मां उसे हाथों में उठाकर तौलती-सी श्वेता से बोलीं, “नंदिनी बहुत दिनों से कुंदनवाले सेट की तारीफ़ कर रही है. मुझे लगता है उसे पसंद है. सोच रही हूं, ऐसे ही हल्के में बनवाकर उसे दे दूं.”
“मम्मी, आप दीदी को यही सेट क्यों नहीं दे देतीं.” बोलती श्वेता की नज़र सहसा निकिता से मिली. वह जलती नज़रों से उसे घूर रही थी, तो उसने अचकचाकर आंखें फेर लीं.
दमयंतीजी ने कुछ नहीं कहा. बस, मुस्कुराकर सेट लेकर चली गईं. निकिता श्वेता की बेव़कूफ़ी पर कुछ कहती, उससे पहले श्वेता ने वहां से निकलने में अपनी भलाई समझी.
दूसरे दिन श्वेता की शादी की पहली सालगिरह थी. निकिता उसके कमरे में गिफ्ट लेकर पहुंची तो देखा, वह अपनी ननद नंदिनी से फोन पर बतिया रही थी, “दीदी, आप नहीं आएंगी, तो मज़ा आधा रह जाएगा, पर कोई बात नहीं. आप बच्चों के इम्तहान दिलाइए. पलक से कहना ख़ूब अच्छे नंबर लेकर आए. उसकी मामी ने उसके अच्छे रिज़ल्ट के लिए गिफ़्ट अभी से ख़रीद लिया है.” श्वेता ने फोन रखा ही था कि निकिता फिर शुरू हो गई थी. “श्वेता, गिफ्ट लेने का अधिकार तेरा बनता है.”
“ओहो दीदी! बेटी होने के नाते नंदिनी दीदी की ख़ुशी इस घर से जुड़ी है. वो ख़ुश, तो सब ख़ुश… रिश्तों में इन छोटी-मोटी भेंटों के बड़े मायने होते हैं. ये सब रिश्तों का इन्वेस्टमेंट हैं, जिसमें मेरी निकिता दीदी कभी विश्वास नहीं करती हैं.” उसने हंसते हुए कहा, “उ़फ्! तू और तेरा इन्वेस्टमेंट… गंवा देगी एक दिन अपनी सारी कमाई. विश्वास नहीं होता कि तू मेरी बहन है और ये क्या बात हुई कि मुझे रिश्तों में विश्वास नहीं है, ऐसा होता तो तेरे कहने से मैं छुट्टी लेकर तेरी मैरिज एनिवर्सरी मनाने ना चली आती.” निकिता की बात पर श्वेता ने प्यार से उनके हाथों को पकड़कर कहा, “उसके लिए मेरी प्यारी दीदी को बहुत-बहुत थैंक्स. पर एक बात बोलूं, बुरा मत मानना. मायके से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान है, क्योंकि वो बचपन से जुड़े हैं, हमें आदत है उनकी, लेकिन ससुराल से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान नहीं है. उसके लिए आपसी समझ, विश्वास और समर्पण ज़रूरी है और उसी में हम चूक कर जाते हैं.” आज के दिन निकिता छोटी बहन से बहस नहीं करना चाहती थी, सो वो चुपचाप उसे गिफ्ट देकर चली गई.
शाम तक घर सबकी हंसी से गुलज़ार था. पर निकिता का मन दरक रहा था. पिछले हफ़्ते उसकी शादी की सालगिरह तो यूं ही निकल गई.
चाहती तो अमोल के साथ कुछ सार्थक पल बिता लेती, लेकिन वो व्यावहारिक थी. जानती थी इन भावनात्मक पहलुओं से जुड़कर जीवन नहीं चलता. अमोल आनेवाली एनिवर्सरी को लेकर पसोपेश में थे. ऐसे में निकिता ने उन्हें दुविधा से उबारते हुए कहा, “तुम्हारा टूर पर जाना बहुत ज़रूरी है. टारगेट पूरा नहीं किया, तो फाइनेंशियली प्रॉब्लम हो जाएगी. घर का पज़ेशन लेना है.”
“घर नहीं, मकान.”
“हां-हां वही…” अमोल के व्यंग्यबाण को नज़रअंदाज़ कर, मन ही मन मुस्कुराते हुए बोली, “कितनी भी कोशिश कर लो, भावनाओं में बहकर, अपनी सैलेरी में हाथ नहीं लगाने दूंगी.” अपनी सेविंग्स में बरती गोपनीयता निकिता की मंशा जता देती थी. शादी के तीन साल बाद भी निकिता अमोल के परिवारवालों को अपना नहीं पाई थी. निकिता का कुछ था, तो अमोल का बनवाया मकान, उसके दिए ज़ेवर और पूरी तनख़्वाह, जिसका हिसाब-क़िताब वो समय-समय पर करती थी. उसका हमेशा से मानना रहा है कि स्त्री को अपने पैसों और अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई परेशानी ना हो. निकिता की ज़िद पर अमोल ने मकान के लिए लोन लिया, पर लोन चुकाने के चक्कर में उसे ओवरटाइम तक करना पड़ा, जिससे उसकी सेहत तक बिगड़ी. बढ़ती सेविंग्स निकिता के भविष्य को सिक्योर करती गई, पर वर्तमान उसके हाथ से कब फिसला, वह जान ही नहीं पाई.
पति और परिवार के साथ बिताए हल्के-फुल्के पलों की क़ीमत उसने नहीं आंकी थी. घर के पज़ेशन के समय भुगतान की चिंता में डूबे अमोल की हालत उसके पिता से देखी नहीं गई, उन्होंने अपनी जमापूंजी बेटे के हवाले की, तो निकिता को अपनी चतुराई पर मान हो आया. डर था कि कहीं अमोल उससे रुपए ना मांग ले, पर यहां तो सब आसानी से हल हो गया. निकिता विचारों में खोई बैठक की ओर आई, तो वहां बैठी दमयंतीजी अपने पति से बोल रही थीं, “सुनो… कुंदन का सेट मैं इस बार श्वेता को दे रही हूं. अपनी श्वेता आगे बढ़कर तो मांगेगी नहीं, सोच रही हूं गिफ्ट के बहाने दे दूंगी.” “ऊंह! बेव़कूफ़ श्वेता, सब कुछ तो इनके हवाले कर देती है. सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को कोई हलाल करता है भला.” बुदबुदाती हुई निकिता उनके पास ही चली आई, मन की कसमसाहट और बढ़ गई थी.
उदित और श्वेता भी वहां आ ग
ए. दोनों झुककर दमयंतीजी और उमाकांतजी का आशीर्वाद लेने लगे. वो गदगद हो उठे, आशीर्वाद की झड़ी के साथ दमयंतीजी ने साधिकार बैठने का आदेश दिया और
मुस्कुराकर यह कहते हुए कुंदन का सेट श्वेता के हाथ में रख दिया, “आज इसे पहनकर डिनर पर जाना.”
“ओ मम्मी, लव यू…” श्वेता सास के गले लगी हुई थी, तभी उमाकांतजी की आवाज़ आई, “बिटिया, इसे पकड़ो और तुम लोग संभालो. पांच-पांच लाख की एफडी तुम्हारे और उदित के नाम है.”
“पर क्यों पापा?”
“क्यों की क्या बात है? सैलेरी तो तुम लोगों से संभलती नहीं, सो हमें दे देते हो. अब थोड़ी ज़िम्मेदारी तुम भी संभालो.” ससुर की आवाज़ में उलाहने का स्नेहभरा स्वांग था, जबकि आंखों में बेटे-बहू के प्रति गर्व झलक रहा था. वो बोल रहे थे.
“अब तुम लोगों को अपने बारे में सोचना नहीं आता, तो ये काम हमें करना पड़ेगा. उदित, तुम्हारी पुरानी एफडी मैच्योर हो रही है, उसे अब घर में लगा दो.”
“पापा, हम आपको इस घर में अच्छे नहीं लगते हैं क्या?” उदित की बात पर वो बोले, “आगे तुम लोग कहां रहते हो, वो बाद की बात है, फ़िलहाल एक घर तुम लोगों का अपना भी होना चाहिए. और ज़रूरी बात, नए घर की बुकिंग बहू के नाम से होगी…” ‘नए घर की बुकिंग’. ये अनुगूंज देर तक निकिता के कानों में गूंजती रही. प्रत्युत्तर में उसे अमोल की मम्मी के शब्द सुनाई दिए- ‘अमोल, घर अपने नाम से लेना.’ क्यों? का प्रश्न अमोल की तरफ़ से नहीं आया था. अमोल की मम्मी बोल रही थीं- ‘तेरी पत्नी बड़ी तेज़ है. अभी से इतना अपना-पराया है, तो बाद में क्या होगा.’ उफ़्! उस दिन आग लग गई थी निकिता के तन-बदन में. कितना सुनाया था अमोल को. पर वो चुपचाप सुनते रहे. शायद आईना दिखाकर ख़ुद को और उसे नीचे नहीं गिराना चाहते थे. अपने प्रति अविश्वास पर आश्चर्य व्यक्त करती निकिता आज चुप थी. वो देख पा रही थी, जो विश्वास श्वेता पर उसके सास-ससुर ने किया था, उसके पीछे श्वेता के छोटे-बड़े कई प्रयास थे, जिनका बड़ा प्रतिफल उसे मिला था. दमयंतीजी बोल रही थीं, “एक बार इनका घर बन जाए, तो चिंता दूर हो…”
‘घर नहीं, मकान…’ वहीं बैठी निकिता बोलना चाहती थी, पर सबके उल्लासित चेहरे देखकर चुप रही. जहां इतना उमंग-उत्साह, समर्पण-स्नेह और आदर हो, वहां मकान अपने आप ही घर बन जाता है.
एक बार फिर उसने श्वेता से ख़ुद की तुलना की तो दंग रह गई. श्वेता के गंवाने के बावजूद कई गुना हो, सब वापस कैसे मिला? जबकि उसके पास उतना ही रहा, जितना उसका हिस्सा था. वो भी सहसा हल्का हो गया. इतना हल्का कि पलड़ा हवा में लटक रहा था. जबकि श्वेता की संपदा में घरवालों का प्यार, संरक्षण और विश्वास था, तभी शायद उसका पलड़ा धरती को छू रहा था. निकिता ने बिना जांचे-परखे ही ससुराल और अमोल पर अविश्वास व्यक्त किया था. अमोल ने तो फिर भी जांच-परखकर निकिता के प्रति अविश्वास और स्वकेंद्रित नारी की छवि बनाई थी. शिकायत की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सच तो है… कितनी ऐसी ज़रूरतें आईं, जिसे वो सहज बांट सकती थी… पर ज़िम्मेदारियां और ज़रूरतें तो जीवनभर लगी रहेंगी, उसे पूरा करना पुरुष के अधिकार क्षेत्र में आता है, कहकर वह सदा अमोल को कुंठित करती रही. ख़ुद को चतुर समझनेवाली निकिता श्वेता की चतुराई पर हैरान थी. वो तो अपने हिस्से पर अपना डेरा डाले उसे सुरक्षित रखने की जद्दोज़ेहद में पड़ी रही. इधर श्वेता ने कितनी आसानी से अपने हिस्से पर सबको जगह देकर उनके दिलों पर अपना स्थान सुनिश्चित करा लिया था सदा के लिए…
मैं तुम्हारी जिन्दगी हूँ
।।दिल छु लेगी ये Story ऐक बार जरूर पडें।।
आज बहुत दिनो बाद पुरानी इंग्लिश की वो Notebook खोली तो वो गुज़रा हुआ लम्हा आंखो मे फिर से उतर आया .
और पुरी शरीर काँप सी गयी और आंखो से अश्क टपकने लगे ....
बात 11वीं के बाद 12वीं की है ....school की पहली क्लास थी मै काफ़ी दूर से cycle से school जाता था । ..
Class मे enter करते ही मेरे friends चिल्लाये अबे तेरी चैन खुली है ! मै क्या करता झटके से ध्यान किया ...
फिर उन्होने दुबारा से बोला अबे यार bag की chain......
फिर पुरी class हँसने लगी ...........और कोई मुस्करा रहा था तो वो थी आयशा.... मैने जैसे ही उसकी तरफ़ देखा वो भी मुस्कराना बंद कर दी......
कुछ दिन ऐसे ही class चलती रही .............कुछ अलग था तो ये की वो जब मेरे तरफ देखती... तो मै नज़रे झुका लेता
और कभी मै उसे देखता तो वो हल्का सा मुस्करा देती थी और उसकी वो smile जिन्दगी के हर खुशी से किमती थी |
Class के छुट्टी के बाद घर जाते time मै उसे बिना देखे जाता ही नही था.... वो तिराहे से अपने घर की तरफ़ मुड़ जाती थी...
मेरी आदत थी हिंदी लिखने के बाद ऊपर से लाइन नही खिचता था | उस दिन हिंदी के टीचर से Notebook चेक कराने गया तो Sir बोले की लाइन क्यूँ नी मारे...
मै बोला Sir Line मारना जरुरी होता है क्या ??
Sir बोले हाँ ...... class हँसने लगी और कोई सबसे ज्यादा हँस रही थी तो वो थी आयशा ......
उसको हँसता देख मुझको अलग ही खुशी मिलती थी ...
मै उसको देखता ही रहता था और किसी न किसी बहाने उसे हँसाता रहता था....
पर उससे कभी कुछ कहने की हिम्मत नही हुई |
पुरी class को लगता था की हम दोनो एक दूसरे को प्यार करते है......,अब शायद उसे भी लगने लगा था की मै उसे बहुत चाहता हूँ ....
एक दिन वो school नही आयी थी....
तो अगले दिन वो मेरे से First time मुझसे... कुछ माँगी और बोली की मुझे.... अपनी English ki notebook देदो!
मैने कहा ठीक है interval के बाद ले लेना
फिर मैने interval के time english के notebook के index page पे लिखा ...
आयशा तुम मेरी जिन्दगी हो ...
I LOVE YOU ....
जन्नत सी होगी मेरी जिन्दगी आयशा !!!अगर तुम्हारा साथ होगा........
और मैने उसे interval के बाद दे दिया ......मैने उस दिन की last क्लास मे उसे देखा पर वो मेरे तरफ़ ध्यान नही दी ....
फिर उस दिन school की छुट्टी के बाद हर रोज की तरह उसे देखने के लिये मैं तिराहे पे wait कर रहा था|
मेरे friends भी साथ मे थे ....वो cycle से आयी और मुझे देखके मुस्करायी और बोली कि तुम्हारी Notebook मेरे Desk के Drawer में है....
और जाने लगी ...मेरे friends बोले की वो तेरे को प्यार करती होगी तो तेरे बुलाने पे पीछे मुड़कर देखेगी
मैने भी आयशा आवाज़ लगा दी ....उसने मुझे पीछे मुड़के देखना चाहा और उसके cycle की handle मुड़ गयी....
सामने से आ रहा ट्रक उसकी cycle से
टकरा गया, उसको और उसकी cycle को रौंदता हुआ चला गया ...........और मैं कुछ न कर सका इतना भी वक्त नहीं मिला कि उसे Hospital लेके जाऊँ .....
उसकी साँसे हमेशा के लिए थम गईं....... और मैं रोता ही रह गया....
उसके बाद कई दिनो तक मैं school नही गया ..सब दोस्तो के कहने पे बहुत हिम्मत करके school गया...
तो हर बार उसकी bench पे ही नज़र जा रही थी ...
Interval हुआ सभी बाहर चले गये तो मै उसकी bench पे गया और बैठा उसकी bench की drawer मे देखा तो मेरी English की notebook पड़ी थी
और उसपे लिखा था ....
हाँ मैं तुम्हारी जिन्दगी हूँ....
LOVE YOU Toooo.......
इतना पढ़ते ही मेरी आंखो आँसू आ गए..... काश मैं उस दिन उसको आवाज नहीं लगायी होती तो
आज वो सच में मेरी जिदंगी नहीं...
मेरी जिंदगी में होती.....
आंसू सुख गये हो जैसे सिसकियॉं नही आती
तु नही है तो हमे हिचकियॉं नही आती
लिखने को लिख रखी है तेरे नाम कि कई चिट्ठियॉं
पर तु जहा है वहा चिट्ठियॉं नही आती.....
जूठा गुड
जूठा गुड़
बहुत ध्यान से यह कहानी पढ़िएगा। दिल को छूने वाली कथा है ।
एक शादी के निमंत्रण पर जाना था। पर मैं जाना नहीं चाहता था। कारण की एक तो व्यस्त होना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना..
लेकिन घर परिवार का दबाव था सो जाना ही पड़ा।
उस दिन शादी की सुबह में काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने वाली रोड़ पर बैठा हुआ था। हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था। पास ही के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी।
तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी और उसमें से एक वृद्ध उतरे। अमीरी उनके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।
वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये। पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी, उसमे गुड़ भरा हुआ था। अब उन्होने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया। सभी गायें पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बिछुड़ने के बाद बच्चे अपने मां बाप को घेर लेते हैं। वे कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी। वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।
कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई,इसके बाद जो हुआ वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता।
हुआ यूँ कि गायो के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था, वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे, मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।
मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला अंकल जी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का जूठा गुड क्यों खाया ??
उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे, और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता।
जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।
मैं अब भी नहीं समझा अंकल जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ???
वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था, भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।
तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए ,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था,मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण से आ गये।
मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।
शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय।
कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने, गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया।और वही सो गया, सुबह काम तलासने निकल गया, आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।
इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई,मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया, इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था,
मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा,और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया,
शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका जूठा गुड़ खाता हूँ,
मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ ,
परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यही आकर मिटती हैं बेटे।
मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम,
मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े,गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई , मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला
बापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ।
सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था।
उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।
घर आकर गाय के बारे जानने के लिए कुछ किताबें पढ़ने के बाद जाना कि.....,
गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है,
जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। अत: इस पृथ्वी पर गोमाता मनुष्यों के लिए भगवान का प्रसाद है। भगवान के प्रसादस्वरूप अमृतरूपी गोदुग्ध का पान कर मानव ही नहीं अपितु देवगण भी तृप्त होते हैं।
इसीलिए गोदुग्ध को ‘अमृत’ कहा जाता है। गौएं विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं। सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं।
ऋग्वेद में गौ को‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।
जय गौ माता
बहुत ध्यान से यह कहानी पढ़िएगा। दिल को छूने वाली कथा है ।
एक शादी के निमंत्रण पर जाना था। पर मैं जाना नहीं चाहता था। कारण की एक तो व्यस्त होना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना..
लेकिन घर परिवार का दबाव था सो जाना ही पड़ा।
उस दिन शादी की सुबह में काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने वाली रोड़ पर बैठा हुआ था। हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था। पास ही के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी।
तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी और उसमें से एक वृद्ध उतरे। अमीरी उनके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।
वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये। पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी, उसमे गुड़ भरा हुआ था। अब उन्होने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया। सभी गायें पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बिछुड़ने के बाद बच्चे अपने मां बाप को घेर लेते हैं। वे कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी। वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।
कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई,इसके बाद जो हुआ वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता।
हुआ यूँ कि गायो के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था, वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे, मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।
मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला अंकल जी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का जूठा गुड क्यों खाया ??
उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे, और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता।
जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।
मैं अब भी नहीं समझा अंकल जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ???
वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था, भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।
तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए ,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था,मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण से आ गये।
मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।
शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय।
कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने, गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया।और वही सो गया, सुबह काम तलासने निकल गया, आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।
इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई,मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया, इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था,
मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा,और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया,
शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका जूठा गुड़ खाता हूँ,
मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ ,
परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यही आकर मिटती हैं बेटे।
मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम,
मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े,गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई , मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला
बापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ।
सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था।
उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।
घर आकर गाय के बारे जानने के लिए कुछ किताबें पढ़ने के बाद जाना कि.....,
गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है,
जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। अत: इस पृथ्वी पर गोमाता मनुष्यों के लिए भगवान का प्रसाद है। भगवान के प्रसादस्वरूप अमृतरूपी गोदुग्ध का पान कर मानव ही नहीं अपितु देवगण भी तृप्त होते हैं।
इसीलिए गोदुग्ध को ‘अमृत’ कहा जाता है। गौएं विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं। सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं।
ऋग्वेद में गौ को‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।
जय गौ माता
अलख
अलख
रामू सेठ के पास अपार धन-संपत्ति थी, विशाल हवेली,नौकर-चाकर, सब तरह का आराम,फिर भी उसका मन अशांत रहता था। हर समय उसे कोई-न-कोई चिंता घेरे रहती थी। सेठ उदास रहता।
जब उसकी हालत बहुत खराब होने लगी तो एक दिन उसके एक मित्र ने उसे शहर से कुछ दूर आश्रम में रहने वाले साधु के पास जाने की सलाह दी। मित्र ने बताया,"वह पहुंचा हुआ साधु है। कैसा भी दुख लेकर जाओ, दूर कर देता है।"
रामू सेठ साधु के पास गया। अपनी सारी मुसीबत सुनाकर विनती करने लगा, "स्वामीजी! मैं जिंदगी से बेजार हो गया हूँ। मुझे बचाइए।"
साधु महात्मा बोले, "घबराओ नहीं,तुम्हारी सारी अशांति दूर हो जाएगी। प्रभु के चरणों में लौ लगाओ।"
साधु महात्मा ने रामू सेठ को ध्यान करने की सलाह दी और उसकी विधि भी समझा दी।
लेकिन,रामू सेठ का मन उसमें नहीं रमा। वह ज्योंही जप ध्यान करने बैठता, उसका मन कुरंग-चौकड़ी भरने लगता।
इस तरह कई दिन बीत गए। आखिर फिर पँहुच गया साधु महात्मा के आश्रम में।
उसने साधु महात्मा को अपनी परेशानी बताई। महात्मा जी ने सेठ को कुछ दिन आश्रम में ही बिताने को कहा। एक दिन सेठ साधु महात्मा जी के साथ आश्रम में घूम रहा था कि उसके पैर में एक कांटा चुभ गया।
सेठ वहीं बैठ गया और पैर पकड़कर चिल्लाने लगा - "स्वामीजी, मैं क्या करूं? बड़ा दर्द हो रहा है।"
"चिल्लाते क्यों हो? कांटे को निकाल दो।" महात्मा जी बोले।
सेठ जी ने हिम्मत कर कांटे को निकाल ही दिया। अब उन्हें चैन पड़ गया।
अब महात्मा जी ने गंभीर होकर कहा,"सेठ! तुम्हारे पैर में जरा-सा कांटा क्या चुभा कि तुम बेहाल हो गए, लेकिन यह तो सोचो कि तुम्हारे भीतर कितने बड़े-बड़े कांटे चुभे हुए हैं....
लोभ के, मोह के, क्रोध के, ईर्ष्या के, देश के और न जाने किस-किस के। जब तक तुम उन्हें नहीं उखाड़ोगे, तुम्हें शांति कैसे मिलेगी?"
साधु महात्मा के इन शब्दों ने सेठ के अंतर में ज्योति जला दी।
आईये हम भी उखाड़ फेंके अपने भीतर के राग,द्वेष लोभ,मोह,क्रोध,ईर्ष्या,
अहंकार रूपी कांटे और अलख जगाएं आपसी प्रेम भाईचारे और देशभक्ति की,इसी मङ्गल कामना के साथ.......
रामू सेठ के पास अपार धन-संपत्ति थी, विशाल हवेली,नौकर-चाकर, सब तरह का आराम,फिर भी उसका मन अशांत रहता था। हर समय उसे कोई-न-कोई चिंता घेरे रहती थी। सेठ उदास रहता।
जब उसकी हालत बहुत खराब होने लगी तो एक दिन उसके एक मित्र ने उसे शहर से कुछ दूर आश्रम में रहने वाले साधु के पास जाने की सलाह दी। मित्र ने बताया,"वह पहुंचा हुआ साधु है। कैसा भी दुख लेकर जाओ, दूर कर देता है।"
रामू सेठ साधु के पास गया। अपनी सारी मुसीबत सुनाकर विनती करने लगा, "स्वामीजी! मैं जिंदगी से बेजार हो गया हूँ। मुझे बचाइए।"
साधु महात्मा बोले, "घबराओ नहीं,तुम्हारी सारी अशांति दूर हो जाएगी। प्रभु के चरणों में लौ लगाओ।"
साधु महात्मा ने रामू सेठ को ध्यान करने की सलाह दी और उसकी विधि भी समझा दी।
लेकिन,रामू सेठ का मन उसमें नहीं रमा। वह ज्योंही जप ध्यान करने बैठता, उसका मन कुरंग-चौकड़ी भरने लगता।
इस तरह कई दिन बीत गए। आखिर फिर पँहुच गया साधु महात्मा के आश्रम में।
उसने साधु महात्मा को अपनी परेशानी बताई। महात्मा जी ने सेठ को कुछ दिन आश्रम में ही बिताने को कहा। एक दिन सेठ साधु महात्मा जी के साथ आश्रम में घूम रहा था कि उसके पैर में एक कांटा चुभ गया।
सेठ वहीं बैठ गया और पैर पकड़कर चिल्लाने लगा - "स्वामीजी, मैं क्या करूं? बड़ा दर्द हो रहा है।"
"चिल्लाते क्यों हो? कांटे को निकाल दो।" महात्मा जी बोले।
सेठ जी ने हिम्मत कर कांटे को निकाल ही दिया। अब उन्हें चैन पड़ गया।
अब महात्मा जी ने गंभीर होकर कहा,"सेठ! तुम्हारे पैर में जरा-सा कांटा क्या चुभा कि तुम बेहाल हो गए, लेकिन यह तो सोचो कि तुम्हारे भीतर कितने बड़े-बड़े कांटे चुभे हुए हैं....
लोभ के, मोह के, क्रोध के, ईर्ष्या के, देश के और न जाने किस-किस के। जब तक तुम उन्हें नहीं उखाड़ोगे, तुम्हें शांति कैसे मिलेगी?"
साधु महात्मा के इन शब्दों ने सेठ के अंतर में ज्योति जला दी।
आईये हम भी उखाड़ फेंके अपने भीतर के राग,द्वेष लोभ,मोह,क्रोध,ईर्ष्या,
अहंकार रूपी कांटे और अलख जगाएं आपसी प्रेम भाईचारे और देशभक्ति की,इसी मङ्गल कामना के साथ.......
गुणों को पहचानो
गुणों को पहचानो
एक सरोवर के तट पर एक खूबसूरत बगीचा था। इसमें अनेक प्रकार के फूलों के पौधे लगे हुए थे। लोग वहां आते, तो वे वहां खिले तमाम रंगों के गुलाब के फूलों की तारीफ जरूर करते। एक बार एक गुलाबी रंग के बहुत सुंदर गुलाब के पौधे के एक पत्ते के भीतर यह विचार पदा हो गया कि सभी लोग फूल की ही तारीफ करते हैं, लेकिन पत्ते की तारीफ कोई नहीं करता। इसका मतलब यह है कि मेरा जीवन ही व्यर्थ है।
यह विचार आते ही पत्ते के अंदर हीन भावना घर करने लगी और वह मुरझाने लगा। कुछ दिनों बाद बहुत तेज तूफान आया। जितने भी फूल थे, वे पंखुड़ी-पंखुड़ी होकर हवा के साथ न जाने कहां चले गए। चूंकि पत्ता अपनी हीनभावना से मुरझाकर कमजोर पड़ गया था, इसलिए वह भी टूटकर, उड़कर सरोवर में जा पड़ा। पत्ते ने देखा कि सरोवर में एक चींटी भी आकर गिर पड़ी थी और वह अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी। चींटी को थकान से बेदम होते देख पत्ता उसके पास आ गया। उसने चींटी से कहा - घबराओ मत, तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें किनारे पर ले चलूंगा।
चींटी पत्ते पर बैठ गई और सही-सलामत किनारे तक आ गई। चींटी इतनी कृतज्ञ हो गई कि पत्ते की तारीफ करने लगी। उसने कहा - मुझे तमाम पंखुड़ियां मिलीं, लेकिन किसी ने भी मेरी मदद नहीं की, लेकिन आपने तो मेरी जान बचा ली। आप बहुत ही महान हैं।
यह सुनकर पत्ते की आंखों में आंसू आ गए। वह बोला- धन्यवाद तो मुझे देना चाहिए कि तुम्हारी वजह से मैं अपने गुणों को जान सका। अभी तक तो मैं अपने अवगुणों के बारे में ही सोच रहा था, लेकिन आज अपने गुणों को पहचानने का अवसर मिला।
कथा-मर्म : किसी से तुलना करके हीन-भावना पैदा करने की बजाय सक्रिय होकर अपने भीतर के गुणों को पहचानना चाहिए |
एक सरोवर के तट पर एक खूबसूरत बगीचा था। इसमें अनेक प्रकार के फूलों के पौधे लगे हुए थे। लोग वहां आते, तो वे वहां खिले तमाम रंगों के गुलाब के फूलों की तारीफ जरूर करते। एक बार एक गुलाबी रंग के बहुत सुंदर गुलाब के पौधे के एक पत्ते के भीतर यह विचार पदा हो गया कि सभी लोग फूल की ही तारीफ करते हैं, लेकिन पत्ते की तारीफ कोई नहीं करता। इसका मतलब यह है कि मेरा जीवन ही व्यर्थ है।
यह विचार आते ही पत्ते के अंदर हीन भावना घर करने लगी और वह मुरझाने लगा। कुछ दिनों बाद बहुत तेज तूफान आया। जितने भी फूल थे, वे पंखुड़ी-पंखुड़ी होकर हवा के साथ न जाने कहां चले गए। चूंकि पत्ता अपनी हीनभावना से मुरझाकर कमजोर पड़ गया था, इसलिए वह भी टूटकर, उड़कर सरोवर में जा पड़ा। पत्ते ने देखा कि सरोवर में एक चींटी भी आकर गिर पड़ी थी और वह अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी। चींटी को थकान से बेदम होते देख पत्ता उसके पास आ गया। उसने चींटी से कहा - घबराओ मत, तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें किनारे पर ले चलूंगा।
चींटी पत्ते पर बैठ गई और सही-सलामत किनारे तक आ गई। चींटी इतनी कृतज्ञ हो गई कि पत्ते की तारीफ करने लगी। उसने कहा - मुझे तमाम पंखुड़ियां मिलीं, लेकिन किसी ने भी मेरी मदद नहीं की, लेकिन आपने तो मेरी जान बचा ली। आप बहुत ही महान हैं।
यह सुनकर पत्ते की आंखों में आंसू आ गए। वह बोला- धन्यवाद तो मुझे देना चाहिए कि तुम्हारी वजह से मैं अपने गुणों को जान सका। अभी तक तो मैं अपने अवगुणों के बारे में ही सोच रहा था, लेकिन आज अपने गुणों को पहचानने का अवसर मिला।
कथा-मर्म : किसी से तुलना करके हीन-भावना पैदा करने की बजाय सक्रिय होकर अपने भीतर के गुणों को पहचानना चाहिए |
महिला की जाति
महिला की जाति
एक आदमी ने महिला से पूछा- तेरी जाति क्या है?
महिला ने पूछा : एक मां की या एक महिला की ..?
उसने कहा - चल दोनों की बता ..
और मुस्कान बिखेरी ।
महिला ने भी पूरे धैर्य से बताया.......
एक महिला जब माँ बनती है तो वो जाति विहीन हो जाती है..
उसने फिर आश्चर्य चकित होकर पूछा - वो कैसे..?
जबाब मिला कि .....
जब एक मां अपने बच्चे का लालन पालन करती है,
अपने बच्चे की गंदगी साफ करती है ,
तो वो शूद्र हो जाती है..
वो ही बच्चा बड़ा होता है तो मां बाहरी नकारात्मक ताकतों से उसकी रक्षा करती है, तो वो क्षत्रिय हो जाती है..
जब बच्चा और बड़ा होता है, तो मां उसे शिक्षित करती है,
तब वो ब्राह्मण हो जाती है..
और अंत में जब बच्चा और बड़ा होता है तो मां
उसके आय और व्यय में उसका उचित मार्गदर्शन कर
अपना वैश्य धर्म निभाती है ..
तो हुई ना एक महिला या मां जाति विहीन..
उत्तर सुनकर वो अवाक् रह गया । उसकी आँखों में
महिलाओं या माँओं के लिए सम्मान व आदर का भाव था और महिला को अपने मां और महिला होने पर पर गर्व का अनुभव हो रहा था।
एक आदमी ने महिला से पूछा- तेरी जाति क्या है?
महिला ने पूछा : एक मां की या एक महिला की ..?
उसने कहा - चल दोनों की बता ..
और मुस्कान बिखेरी ।
महिला ने भी पूरे धैर्य से बताया.......
एक महिला जब माँ बनती है तो वो जाति विहीन हो जाती है..
उसने फिर आश्चर्य चकित होकर पूछा - वो कैसे..?
जबाब मिला कि .....
जब एक मां अपने बच्चे का लालन पालन करती है,
अपने बच्चे की गंदगी साफ करती है ,
तो वो शूद्र हो जाती है..
वो ही बच्चा बड़ा होता है तो मां बाहरी नकारात्मक ताकतों से उसकी रक्षा करती है, तो वो क्षत्रिय हो जाती है..
जब बच्चा और बड़ा होता है, तो मां उसे शिक्षित करती है,
तब वो ब्राह्मण हो जाती है..
और अंत में जब बच्चा और बड़ा होता है तो मां
उसके आय और व्यय में उसका उचित मार्गदर्शन कर
अपना वैश्य धर्म निभाती है ..
तो हुई ना एक महिला या मां जाति विहीन..
उत्तर सुनकर वो अवाक् रह गया । उसकी आँखों में
महिलाओं या माँओं के लिए सम्मान व आदर का भाव था और महिला को अपने मां और महिला होने पर पर गर्व का अनुभव हो रहा था।
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