Thursday, September 19, 2019

सदुपयोग




एक गांव में धर्मदास नामक एक व्यक्ति रहता
था। बातें तो बड़ी ही अच्छी- अच्छी करता
था पर था एकदम कंजूस। कंजूस भी ऐसा
वैसा नहीं बिल्कुल मक्खीचूस। चाय की बात
तो छोड़ों वह किसी को पानी तक के लिए
नहीं पूछता था।

साधु-संतों और भिखारियों को देखकर तो
उसके प्राण ही सूख जाते थे कि कहीं कोई
कुछ मांग न बैठे।

एक दिन उसके दरवाजे पर एक महात्मा
आये और धर्मदास से सिर्फ एक रोटी मांगी।
पहले तो धर्मदास ने महात्मा को कुछ भी देने
से मना कर दिया , लेकिन तब वह वहीं खड़ा
रहा तो उसे आधी रोटी देने लगा।

आधी रोटी देखकर महात्मा ने कहा कि अब
तो मैं आधी रोटी नहीं पेट भरकर खाना खाऊंगा।

इस पर धर्मदास ने कहा कि अब वह कुछ
नहीं देगा। महात्मा रातभर चुपचाप भूखा-
प्यासा धर्मदास के दरवाजे पर खड़ा रहा।

सुबह जब धर्मदास ने महात्मा को अपने
दरवाजे पर खड़ा देखा तो सोचा कि अगर
मैंने इसे भरपेट खाना नहीं खिलाया और
यह भूख-प्यास से यहीं पर मर गया तो मेरी
बदनामी होगी। बिना कारण साधु की हत्या
का दोष लगेगा।

धर्मदास ने महात्मा से कहा कि बाबा तुम भी
क्या याद करोगे , आओ पेट भरकर खाना
खा लो।

महात्मा भी कोई ऐसा वैसा नहीं था।
धर्मदास की बात सुनकर महात्मा ने कहा
अब मुझे खाना नहीं खाना , मुझे तो एक
कुआं खुदवा दो।

‘लो अब कुआं बीच में कहां से आ गया’
धर्मदास ने साधु महाराज से कहा।

धर्मदास ने कुआं खुदवाने से साफ मना
कर दिया।

साधु महाराज अगले दिन फिर रात भर
चुपचाप भूखा- प्यासा धर्मदास के दरवाजे
पर खड़ा रहा।

अगले दिन सुबह भी जब धर्मदास ने साधु
महात्मा को भूखा-प्यासा अपने दरवाजे पर
ही खड़ा पाया तो सोचा कि अगर मैने कुआं
नहीं खुदवाया तो यह महात्मा इस बार जरूर
भूखा-प्यास मर जायेगा और मेरी बदनामी होगी।

धर्मदास ने काफी सोच- विचार किया और
महात्मा से कहा कि साधु बाबा मैं तुम्हारे
लिए एक कुआं खुदवा देता हूँ  और इससे
आगे अब कुछ मत बोलना।

‘नहीं , एक नहीं अब तो दो कुएं खुदवाने पड़ेंगे।
महात्मा की फरमाइशें बढ़ती ही जा रही थीं।

धर्मदास कंजूस जरूर था बेवकूफ नहीं।
उसने सोचा कि अगर मैंने दो कुएं खुदवाने
से मनाकर दिया तो यह चार कुएं खुदवाने
की बात करने लगेगा , इसलिए धर्मदास ने
चुपचाप दो कुएं खुदवाने में ही अपनी भलाई
समझी।

कुएं खुदकर तैयार हुए तो उनमें पानी भरने
लगा। जब कुओं में पानी भर गया तो महात्मा
ने धर्मदास से कहा , दो कुओं में से एक कुआं
मैं तुम्हें देता हूँ और एक अपने पास रख लेता 
 हूँ। मैं कुछ दिनों के लिए कहीं जा रहा हूँ , 
लेकिन ध्यान रहे मेरे कुएं में से तुम्हें एक बूंद
पानी भी नहीं निकालना है। साथ ही अपने
कुएं में से सब गांव वालों को रोज पानी
निकालने देना है। मैं वापस आकर अपने
कुएं से पानी पीकर प्यास बुझाऊंगा।

धर्मदास ने महात्मा वाले कुएं के मुंह पर एक
मजबूत ढक्कन लगवा दिया। सब गांव वाले
रोज धर्मदास वाले कुएं से पानी भरने लगे।
लोग खूब पानी निकालते पर कुएं में पानी
कम न होता। शुध्द-शीतल जल पाकर गांव
वाले निहाल हो गये थे और महात्मा जी का
गुणगान करते न थकते थे।

एक वर्ष के बाद महात्मा पुनः उस गांव में
आये और धर्मदास से बोले कि उसका कुआं
खोल दिया जाये। धर्मदास ने कुएं का ढक्कन
हटवा दिया। लोग लोग यह देखकर हैरान रह
गये कि कुएं में एक बूंद भी पानी नहीं था।

महात्मा ने कहा , ‘कुएं से कितना भी पानी
क्यों न निकाला जाए वह कभी खत्म नहीं
होता अपितु बढ़ता जाता है। कुएं का पानी
न निकालने पर कुआं सूख जाता है इसका
स्पष्ट प्रमाण तुम्हारे सामने है और यदि किसी
कारण से कुएं का पानी न निकालने पर पानी
नहीं भी सुखेगा तो वह सड़ अवश्य जायेगा
और किसी काम में नहीं आयेगा।

महात्मा ने आगे कहा , ‘कुएं के पानी की
तरह ही धन-दौलत की भी तीन गतियां
होती हैं। उपयोग , नाश अथवा दुरुपयोग।
धन-दौलत का जितना इस्तेमाल करोगे
वह उतना ही बढ़ती जायेगी। धन-दौलत
का इस्तेमाल न करने पर कुएं के पानी की
वह धन-दौलत निरर्थक पड़ी रहेगी। उसका
उपयोग संभव नहीं रहेगा या अन्य कोई
उसका दुरुपयोग कर सकता है। अतः अर्जित
धन-दौलत का समय रहते सदुपयोग करना
अनिवार्य है।’

ज्ञान की भी कमोबेश यही स्थिति होती है।
धन-दौलत से दूसरों की सहायता करने की
तरह ही ज्ञान भी बांटते चलो। हमारा समाज
जितना अधिक ज्ञानवान , जितना अधिक
शिक्षित व सुसंस्कृत होगा उतनी ही देश में
सुख- शांति और समृध्दि आयेगी। फिर ज्ञान
बांटने वाले अथवा शिक्षा का प्रचार-प्रसार
करने वाले का भी कुएं के जल की तरह ही
कुछ नहीं घटता अपितु बढ़ता ही है।

धर्मदास ने कहा , ‘हां, गुरुजी आप बिल्कुल
सही कह रहे हो। मुझे अपनी गलती का
अहसास हो गया है।

इस घटना से धर्मदास को सही ज्ञान और
सही दिशा मिल गयी थी।

बहुत ही खूबसूरत लाईनें

किसी की मजबूरियाँ पे न हँसिये,
कोई मजबूरियाँ ख़रीद कर नहीं लाता..!

डरिये वक़्त की मार से,
बुरा वक़्त किसीको बताकर नही आता..!

अकल कितनी भी तेज ह़ो,
नसीब के बिना नही जीत सकती..!

बीरबल अकलमंद होने के बावजूद,
कभी बादशाह नही बन सका...!!

""ना तुम अपने आप को गले लगा सकते हो,
ना ही तुम अपने कंधे पर सर रखकर रो सकते हो एक दूसरे के लिये जीने का नाम ही जिंदगी है!
इसलिये वक़्त उन्हें दो जो तुम्हे चाहते हों दिल से!
रिश्ते पैसो के मोहताज़ नहीं होते क्योकि कुछ रिश्ते मुनाफा नहीं देते पर जीवन अमीर जरूर बना देते है |"

Wednesday, September 18, 2019

ज़िंदगी


कल मैं दुकान से जल्दी घर चला आया। आम तौर पर रात में 10 बजे के बाद आता हूं, कल 8 बजे ही चला आया।
सोचा था घर जाकर थोड़ी देर पत्नी से बातें करूंगा, फिर कहूंगा कि कहीं बाहर खाना खाने चलते हैं।  बहुत साल पहले, , हम ऐसा करते थे। 
घर आया तो पत्नी टीवी देख रही थी। मुझे लगा कि जब तक वो ये वाला सीरियल देख रही है, मैं कम्यूटर पर कुछ मेल चेक कर लूं। मैं मेल चेक करने लगा,   कुछ देर बाद पत्नी चाय लेकर आई, तो मैं चाय पीता हुआ दुकान  के काम करने लगा।
अब मन में था कि पत्नी के साथ बैठ कर बातें करूंगा, फिर खाना खाने बाहर जाऊंगा, पर कब 8 से 11 बज गए, पता ही नहीं चला।
पत्नी ने वहीं टेबल पर खाना लगा दिया, मैं चुपचाप खाना खाने लगा। खाना खाते हुए मैंने कहा कि खा कर हम लोग नीचे टहलने चलेंगे, गप करेंगे। पत्नी खुश हो गई।
हम खाना खाते रहे, इस बीच मेरी पसंद का सीरियल  आने लगा और मैं खाते-खाते सीरियल में डूब गया।  सीरियल देखते हुए सोफा पर ही मैं सो गया था।
जब नींद खुली तब आधी रात हो चुकी थी।
बहुत अफसोस हुआ।  मन में सोच कर घर आया था कि जल्दी आने का फायदा उठाते हुए आज कुछ समय पत्नी के साथ बिताऊंगा। पर यहां तो शाम क्या आधी रात भी निकल गई।
ऐसा ही होता है, ज़िंदगी में। हम सोचते कुछ हैं, होता कुछ है। हम सोचते हैं कि एक दिन हम जी लेंगे, पर हम कभी नहीं जीते। हम सोचते हैं कि एक दिन ये कर लेंगे, पर नहीं कर पाते।
आधी रात को सोफे से उठा, हाथ मुंह धो कर बिस्तर पर आया तो पत्नी सारा दिन के काम से थकी हुई सो गई थी।  मैं चुपचाप बेडरूम में कुर्सी पर बैठ कर कुछ सोच रहा था। 
पच्चीस साल पहले इस लड़की से मैं पहली बार मिला था। पीले रंग के शूट में मुझे मिली थी। फिर मैने इससे शादी की थी। मैंने वादा किया था कि सुख में, दुख में ज़िंदगी के हर मोड़ पर मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।
पर ये कैसा साथ?  मैं सुबह जागता हूं अपने काम में व्यस्त हो जाता हूं। वो सुबह जागती है मेरे लिए चाय बनाती है।  चाय पीकर मैं कम्यूटर पर संसार से जुड़ जाता हूं, वो नाश्ते की तैयारी करती है। फिर हम दोनों दुकान के काम में लग जाते हैं, मैं दुकान के लिए तैयार होता हूं, वो साथ में मेरे लंच का इंतज़ाम करती है। फिर हम दोनों भविष्य के काम में लग जाते हैं।
मैं एकबार दुकान चला गया, तो इसी बात में अपनी शान समझता हूं कि मेरे बिना मेरा दुकान का काम नहीं चलता, वो अपना काम करके डिनर की तैयारी करती है।
देर रात मैं घर आता हूं और खाना खाते हुए ही निढाल हो जाता हूं।  एक पूरा दिन खर्च हो जाता है, जीने की तैयारी में।
वो पंजाबी शूट वाली लड़की मुझ से कभी शिकायत नहीं करती। क्यों नहीं करती मैं नहीं जानता। पर मुझे खुद से शिकायत है।  आदमी जिससे सबसे ज्यादा प्यार करता है, सबसे कम उसी की परवाह करता है। क्यों?
कई दफा लगता है कि हम खुद के लिए अब काम नहीं करते। हम किसी अज्ञात भय से लड़ने के लिए काम करते हैं। हम जीने के पीछे ज़िंदगी बर्बाद करते हैं।
कल से मैं सोच रहा हूं, वो कौन सा दिन होगा जब हम जीना शुरू करेंगे। क्या हम गाड़ी, टीवी, फोन, कम्यूटर, कपड़े खरीदने के लिए जी रहे हैं?
मैं तो सोच ही रहा हूं, आप भी सोचिए

कि ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। उसे यूं जाया मत कीजिए। अपने प्यार को पहचानिए। उसके साथ समय बिताइए। जो अपने माँ बाप भाई बहन सागे संबंधी सब को छोड़ आप से रिश्ता जोड़  आपके सुख-दुख में शामिल होने का वादा  किया  उसके सुख-दुख को पूछिए तो सही।

एक दिन अफसोस करने से बेहतर है, सच को आज ही समझ लेना कि ज़िंदगी मुट्ठी में रेत की तरह होती है। कब मुट्ठी से वो निकल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा।

मजबूरी

जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई, एक औरत और उसका पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़।दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था।
जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है।टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए।" ये जनरल टिकट है। अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना।वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।" कह टीसी आगे चला गया। पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।
सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे।
 बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे।
 लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे।
" साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते।हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे।बड़ी मेहरबानी होगी।"
टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।
" सौ में कुछ नहीं होता।आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"
" आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब।नाती को देखने जा रहे हैं।गरीब लोग हैं, जाने दो न साब।" अबकि बार पत्नी ने कहा।
" तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो।एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।"
" ये लो साब, रसीद रहने दो।दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला।
" नहीं-नहीं रसीद दो बनानी ही पड़ेगी। ऊपर से आर्डर है।रसीद तो बनेगी ही।
चलो, जल्दी चार सौ निकालो।वरना स्टेशन आ रहा है, उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ।"
इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला।
आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो।
दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे ऐसे बैठे थे ,मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके शोक  में जा रहे हो।
कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए?
क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा? नहीं-नहीं।
आखिर में पति बोला- " सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। शाम को खाना नहीं खायेंगे। दो सौ तो एडजस्ट हो गए। और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे। सौ रूपए बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा। सेठ भी चिल्लायेगा। मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा।मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए।"
" ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे। हम अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट।" पत्नी के कहा।
 " मगर मुन्ने के कम करना...."" और पति की आँख छलक पड़ी।
" मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे। "कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी।
फिर आँख पोंछते हुए बोली-
" अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी-"
इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो।"
उसकी आँख फिर छलक पड़ी।
" अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं, हमें वोट देने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं। रो मत।

(विनम्र प्रार्थना है जो भी इस कहानी को पढ़ चूका है उसे इस घटना से शायद ही इत्तिफ़ाक़ हो पर अगर ये कहानी शेयर करे ,कॉपी पेस्ट करे ,पर रुकने न दे शायद रेल मंत्रालय जनरल बोगी की भी परिस्थितियों को समझ सके। उसमे सफर करने वाला एक गरीब तबका है जिसका शोषण चिर कालीन से होता आया है।

   एक कोशिश परिवर्तनकीओर

Tuesday, September 17, 2019

लालच का परिणाम बुरा


एक बार किसी गांव में राम और श्याम नाम के दो भाई रहते थे. राम तीरंदाजी कला में निपुण था जबकि श्याम तलवारबाजी में अत्यधिक गुणवान था.
एक बार उनके किसी पास के गांव में खूंखार शेर घुस आया था. उस गांव के राजा ने यह शर्त रखी कि जो शेर को मार गिराएगा. मैं उसे अपने राज़ का आधा राजपाट सोंप दूंगा. जब यह खबर राम और श्याम को पता चली तब दोनों ने ही शेर को मारने का निश्चय किया.
दोनों शेर के शिकार के लिए घर से निकल पड़े. शेर को ढूंढते-ढूंढते दोनों भाइयों को श्याम हो गई. दोनों पूरी तरह से थक चुके थे. दोनों पीपल के पेड़ के नीचे आराम करने के लिए बैठ गए तभी अचानक शेर के दहाड़ने की आवाज आई. उन्होंने आवाज का पीछा किया तो जाना की शेर राजा के गांव की तरफ ही जा रहा था. रात को अंधेरा काफी हो गया था.
अब शेर दोनों भाइयों के सामने ही था. तभी राम ने श्याम को कहा कि तुम उस तरफ से वार करो और मैं इस तरफ से धनुष बाण छोडूंगा. राम की योजना को लेकर श्याम के मन में लालच आ गया. श्याम ने सोचा कि शेर के मरते ही मैं राम को मार दूंगा. उसे मालूम था कि शेर को राम ही मार सकता है. श्याम ने शेर के मरते ही राम को मारने का निश्चय कर लिया तभी राम ने अपना धनुष बाण निकाला और शेर पर निशाना लगा कर छोड़ दिया. जिससे शेर घायल होकर बेहोश हो गया.
उसी समय श्याम ने राम पर पीछे से वार किया जिससे राम भी बेहोश हो गया, लेकिन श्याम को लगा कि राम मर चुका है.
वह शेर की लाश को लेकर राजा के सम्मुख पेश हो गया. राजा को लगा कि श्याम ने शेर को मार दिया है तभी राजा ने अपनी प्रजा को बुलाया और अपने राज्य का आधा राजपाट श्याम को देना चाहा तभी शेर फिर से होश में आ गया और वह श्याम पर झपटा.
किसी तरह से श्याम शेर के वार से बच गया राम को जब होश आया तो वह श्याम का पीछा करते हुए वहां पहुंच गया. राम ने देखा कि शेर अभी भी जिंदा है तब राम ने अपना धनुष बाण निकाला और शेर पर निशाना साध कर छोड़ दिया जिससे शेर मारा गया.
उसी समय राजा ने राम को आधा राजपाट सोंप दिया. श्याम ने जब अपने भाई को जिंदा देखा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ तभी उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वह राम के चरणों में गिरकर क्षमा मांगता है. राम श्याम को गले लगाता है और श्याम को माफ कर देता है.

शिक्षा-
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अक्सर खून के रिश्ते ही महत्वपूर्ण होते हैं.
हमें कभी भी किसी भी लालच में आकर ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे हमें बाद में पछताना पड़े क्योंकि लालच का परिणाम हमेशा बुरा होता है.

Monday, September 16, 2019

मेरी माँ


एक छोटे से शहर के प्राथमिक स्कूल में कक्षा 5 की शिक्षिका की एक आदत थी कि वह कक्षा शुरू करने से पहले हमेशा "आई लव यू ऑल" बोला करतीं।
मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं कहती । वह कक्षा के सभी बच्चों से उतना प्यार नहीं करती थीं।
कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो उनको एक आंख नहीं भाता। उसका नाम राजू था। राजू मैली कुचेली स्थिति में स्कूल आजाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान। । । व्याख्यान के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता।

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मिस के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखता तो लग जाता..मगर उसकी खाली खाली नज़रों से उन्हें साफ पता लगता रहता.कि राजू शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब हे.धीरे धीरे मिस को राजू से नफरत सी होने लगी। क्लास में घुसते ही राजू मिस की आलोचना का निशाना बनने लगता। सब बुराई उदाहरण राजू के नाम पर किये जाते. बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते.और मिस उसको अपमानित कर के संतोष प्राप्त करतीं। राजू ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया था।
मिस को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर महसूस नाम की कोई चीज नहीं थी। प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखा करता और सिर झुका लेता । मिस को अब इससे गंभीर चिढ़ हो चुकी थी।
पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो मिस ने राजू की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट माता पिता को दिखाने से पहले हेड मिसट्रेस के पास जाया करती थी। उन्होंने जब राजू की रिपोर्ट देखी तो मिस को बुला लिया। "मिस प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे राजू के पिता इससे बिल्कुल निराश हो जाएंगे।" "मैं माफी माँगती हूँ, लेकिन राजू एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ लिख सकती हूँ। "मिस घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ आईं।
हेड मिसट्रेस ने एक अजीब हरकत की। उन्होंने चपरासी के हाथ मिस की डेस्क पर राजू की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन मिस ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी। पलट कर देखा तो पता लगा कि यह राजू की रिपोर्ट हैं। "पिछली कक्षाओं में भी उसने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे।" उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली। रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है। "राजू जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा।" "बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षक से बेहद लगाव रखता है।" "
अंतिम सेमेस्टर में भी राजू ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। "मिस ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली।" राजू ने अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव लिया। .उसका ध्यान पढ़ाई से हट रहा है। "" राजू की माँ को अंतिम चरण का कैंसर हुआ है। । घर पर उसका और कोई ध्यान रखनेवाला नहीं है.जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है। ""
राजू की माँ मर चुकी है और इसके साथ ही राजू के जीवन की चमक और रौनक भी। । उसे बचाना होगा...इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। "मिस के दिमाग पर भयानक बोझ हावी हो गया। कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । आंसू उनकी आँखों से एक के बाद एक गिरने लगे.
अगले दिन जब मिस कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश "आई लव यू ऑल" दोहराया। मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं। क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे राजू के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से हो ही नहीं सकता था । व्याख्यान के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल राजू पर दागा और हमेशा की तरह राजू ने सिर झुका लिया। जब कुछ देर तक मिस से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने अचंभे में सिर उठाकर उनकी ओर देखा। अप्रत्याशित उनके माथे पर आज बल न थे, वह मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने राजू को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर जबरन दोहराने के लिए कहा। राजू तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत:बोल ही पड़ा। इसके जवाब देते ही मिस ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी से भी बजवायी.. फिर तो यह दिनचर्या बन गयी। मिस हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसकी खूब सराहना तारीफ करतीं। प्रत्येक अच्छा उदाहरण राजू के कारण दिया जाने लगा । धीरे-धीरे पुराना राजू सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आ गया। अब मिस को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना त्रुटि उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी।
उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था। देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और राजू ने दूसरा स्थान हासिल कर लिया यानी दूसरी क्लास ।
विदाई समारोह में सभी बच्चे मिस के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और मिस की टेबल पर ढेर लग गये । इन खूबसूरती से पैक हुए उपहार में एक पुराने अखबार में बद सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था। बच्चे उसे देखकर हंस पड़े। किसी को जानने में देर न लगी कि उपहार के नाम पर ये राजू लाया होगा। मिस ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर उसे निकाला। खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं की इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक बड़ा सा कड़ा था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे। मिस ने चुपचाप इस इत्र को खुद पर छिड़का और हाथ में कंगन पहन लिया। बच्चे यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। खुद राजू भी। आखिर राजू से रहा न गया और मिस के पास आकर खड़ा हो गया। ।
कुछ देर बाद उसने अटक अटक कर मिस को बताया कि "आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है।"
समय पर लगाकर उड़ने लगा। दिन सप्ताह, सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है? मगर हर साल के अंत में मिस को राजू से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि "इस साल कई नए टीचर्स से मिला।। मगर आप जैसा कोई नहीं था।" फिर राजू का स्कूल समाप्त हो गया और पत्रों का सिलसिला भी। कई साल आगे गुज़रे और मिस रिटायर हो गईं। एक दिन उन्हें अपनी मेल में राजू का पत्र मिला जिसमें लिखा था:
"इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बिना शादी की बात मैं नहीं सोच सकता। एक और बात .. मैं जीवन में बहुत सारे लोगों से मिल चुका हूं।। आप जैसा कोई नहीं है.........डॉक्टर राजू
साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था। मिस खुद को हरगिज़ न रोक सकती थीं। उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह दूसरे शहर के लिए रवाना हो गईं। शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं। उन्हें लगा समारोह समाप्त हो चुका होगा.. मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि शहर के बड़े डॉ, बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां पर शादी कराने वाले पंडितजी भी थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है...मगर राजू समारोह में शादी के मंडप के बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था। फिर सबने देखा कि जैसे ही यह पुरानी शिक्षिका ने गेट से प्रवेश किया राजू उनकी ओर लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह सड़ा हुआ सा कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा मंच पर ले गया।
 माइक हाथ में पकड़ कर उसने कुछ यूं बोला "दोस्तों आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको उनसे मिलाउंगा।।।........यह मेरी माँ हैं - ---------------

Sunday, September 15, 2019

सुंदरता


एक अती सुन्दर महिला ने विमान में प्रवेश किया और अपनी सीट की तलाश में नजरें घुमाईं।
उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है।
 जिसके दोनों ही हाथ नहीं है। महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में झिझक हुई।
उस 'सुंदर' महिला ने एयरहोस्टेस से बोला "मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी।
 क्योंकि साथ की सीट पर जो व्यक्ति बैठा हुआ है उसके दोनों हाथ नहीं हैं।" उस सुन्दर महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया।
असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, "मैम क्या मुझे कारण बता सकती है..?"
'सुंदर' महिला ने जवाब दिया "मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। मैं ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर यात्रा नहीं कर पाउंगी।"
दिखने में पढी लिखी और विनम्र प्रतीत होने वाली महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई। महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा कि "मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जाए।"
एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर नजर घुमाई, पर कोई भी सीट खाली नहीं दिखी।
एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि "मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है। अतः मैं विमान के कप्तान से बात करती हूँ। कृपया तब तक थोडा धैर्य रखें।" ऐसा कहकर होस्टेस कप्तान से बात करने चली गई।
कुछ समय बाद लोटने के बाद उसने महिला को बताया, "मैडम! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है | इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है और वह प्रथम श्रेणी में है। मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया। एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है।"
'सुंदर' महिला अत्यंत प्रसन्न हो गई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती और एक शब्द भी बोल पाती... एयरहोस्टेस उस अपाहिज और दोनों हाथ विहीन व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे पूछा "सर, क्या आप प्रथम श्रेणी में जा सकेंगे..? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप एक अशिष्ट यात्री के साथ यात्रा कर के परेशान हों।
यह बात सुनकर सभी यात्रियों ने ताली बजाकर इस निर्णय का स्वागत किया। वह अति सुन्दर दिखने वाली महिला तो अब शर्म से नजरें ही नहीं उठा पा रही थी।
तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा, "मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ। और मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ खोये थे। सबसे पहले, जब मैंने इन देवी जी की चर्चा सुनी, तब मैं सोच रहा था। की मैंने भी किन लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली और अपने हाथ खोये..? लेकिन जब आप सभी की प्रतिक्रिया देखी तो अब अपने आप पर गर्व महसूस हो रहा है कि मैंने अपने देश और देशवासियों की खातिर अपने दोनों हाथ खोये।"और इतना कह कर, वह प्रथम श्रेणी में चले गए।
'सुंदर' महिला पूरी तरह से शर्मिंदा होकर सर झुकाए सीट पर बैठ गई।

अगर विचारों में उदारता नहीं है तो ऐसी सुंदरता का कोई मूल्य नहीं है।

असली पूजा

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