Sunday, October 6, 2019

पी. वी. सिंधु के प्रमुख रिकार्ड्स की सूची

पीवी सिंधु ओलिंपिक स्पर्धा में रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय हैं, इसके अलावा वह पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बन गई हैं, जिन्होंने 2019 में बीडब्ल्यूएफ विश्व टूर फाइनल में स्वर्ण पदक जीता है. पीवी सिंधु की विश्व में सर्वोच्च रैंकिंग 2 रह चुकी है. वर्तमान में वह विश्व की नंबर 3 खिलाड़ी है.

पीवी सिंधु के बारे में व्यक्तिगत जानकारी :

पूरा नाम: पुसरला वेंकट सिंधु
पिता: पी. वी. रमना
माँ:  पी. विजया
जन्म तिथि और स्थान: 5 जुलाई 1995, हैदराबाद, तेलंगाना
ऊंचाई: 1.79 मीटर (5 फीट 10 इंच)
वजन:  60 किलो (132 पौंड)
सिंधु के शौक:  फिल्में देखना, योगा करना
शिक्षा: सेंट एन कॉलेज फॉर विमेन (मेहदीपट्टनम) से बी.कॉम; अब एमबीए कर रही है.
करियर की शुरुआत: 2011 से
कोच: पुलेला गोपीचंद
करियर रिकॉर्ड: 312 जीत, 129 हार
कैरियर टाइटल्स: 15
उच्चतम रैंकिंग: 2 (7 अप्रैल 2017)
वर्तमान रैंकिंग: 3 (20 अगस्त 2019)
कमाई: $ 8.5 मिलियन, सिंधु फोर्ब्स की "हाइएस्ट-पेड महिला एथलीट 2018" सूची में सातवें स्थान पर रहीं थीं.

पुरस्कार:

1. सिन्धु को 24 सितंबर 2013 में अर्जुन पुरस्कार मिला था.

2. उन्हें 2015 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

3. सिंधु को 29 अगस्त 2016 को भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

पीवी सिंधु तब मशहूर हुईं जब उन्होंने सितंबर 2012 में सिर्फ 17 साल की उम्र में BWF वर्ल्ड रैंकिंग के टॉप 20 में प्रवेश किया था.

पीवी सिंधु ने बैडमिंटन की दुनिया में चीनी खिलाड़ियों के वर्चस्व को तोड़ा है. उसने शीर्ष चीनी खिलाड़ियों को हराया है; विश्व चैम्पियनशिप 2019 और 2017 में चीन की चेन यूफेई को हराया था जबकि सिंधु ने विश्व चैम्पियनशिप 2015 में चीन की ली जुरेई को हराया था.

पी.वी. सिंधु द्वारा जीते गए पदकों की सूची :

1. ओलंपिक खेल:  2016 रियो डी जनेरियो ओलंपिक खेलों में रजत पदक

2. विश्व चैंपियनशिप

A. 2019 में स्वर्ण पदक (महिला एकल)

B.  2018 में रजत पदक (महिला एकल)

C. 2017 में रजत पदक (महिला एकल)

D. 2014 में कांस्य पदक (महिला एकल)

E. 2013 में कांस्य पदक (महिला एकल)

3. उबेर कप बैडमिंटन

A.  2014 नई दिल्ली में कांस्य पदक, (महिला टीम)

B.  2016 में कांस्य पदक, (महिला टीम)

4. एशियाई खेल

A. 2018 जकार्ता-पालमबांग (महिला एकल) में रजत पदक

B.  2014 इंचियोन (महिला टीम) में कांस्य पदक

5. राष्ट्रमंडल खेल

A.   2018 गोल्ड कोस्ट (मिश्रित टीम) में स्वर्ण पदक

B. 2018 गोल्ड कोस्ट (महिला एकल) में रजत पदक

C. 2014 ग्लासगो में कांस्य पदक (महिला एकल)

6. एशियाई चैंपियनशिप

A.  2014 में जिमचेन (महिला एकल) में कांस्य पदक

7. दक्षिण एशियाई खेल

A.  स्वर्ण पदक: 2016 में गुवाहाटी (महिला टीम)

B.  रजत पदक: 2016 में गुवाहाटी (महिला एकल)

8. राष्ट्रमंडल युवा खेल

A.  2011 में स्वर्ण पदक (लड़कियों का एकल)

9. एशियाई जूनियर चैंपियनशिप

A.  2012 में दक्षिण कोरिया (लड़कियों के एकल) में स्वर्ण पदक

B. 2011 लखनऊ (लड़कियों का एकल) में कांस्य पदक

C. 2011 में कांस्य पदक लखनऊ (मिश्रित टीम)

उपरोक्त पदकों के अलावा सिन्धु ने 3 Badminton World Federation (BWF) सुपरसीरीज खिताब जीते हैं जबकि 4 BWF सुपरसीरीज में उपविजेता रही है.

निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि पीवी सिंधु भारत में बैडमिंटन सनसनी की तरह हैं. आने वाले वर्षों में हम महान बैडमिंटन खिलाड़ी के बारे में बहुत कुछ सुनेंगे.

Saturday, October 5, 2019

प्यार नहीं था तो क्या था

अगर मुझसे प्यार नहीं था तो क्यों आये थे मुझसे मिलने मेरी पसंद के कलर की शर्ट पहनके। नहीं था प्यार क्यों लाये थे साथ मेरे पसंद की चॉकलेट। नहीं था कुछ तो क्यों याद हैं तुम्हे आज भी मेरी एक -एक बात। मैं कब रूठी थी तुमसे, कब मुस्कुराई थी मैं, कब गुस्से करने का नाटक कर रही थी। क्या पहना था मैंने, मेरे खुले बाल, हाथों में पकड़ा चाबी का छल्ला। इतने सालों बाद भी तुम्हें कैसे याद हैं।
मैने बड़ी मुश्किल से माना था कि मेरा प्यार केवल एक तरफा था क्योंकि मुझे हमेशा से लगता था कि तुम भी करते हो मुझसे प्यार बस जताते नहीं। क्यों तुम सारा दिन मुझसे ही फोन पर बात करते थे जबकि कॉलेज में कुछ ही घँटे पहले मिले थे हम। क्यों हमेशा तेरे साथ वाली सीट खाली रहती थी जिस पर मेरे सिवा किसी ओर को नहीं बैठने देते थे।
तुमने तो मुझे छोड़ कर किसी ओर का हाथ थाम लिया था। और मैने अपनी चाहत को एक तरफा प्यार का नाम दे दिया था। बड़ी मुश्किल से सँभाला था खुद को जब तेरी शादी की खबर सुनी तुम्हारे ही मुँह से। उस ही दिन तुमसे दूरी बना ली थी। नहीं थी हिम्मत तुझे किसी ओर के साथ देखने की।
दिमाग ने कहा वो नहीं है तेरे लायक ,तेरे प्यार के काबिल भी नहीं है। पर दिल ने एक ना सुनी क्योंकि वो तो सिर्फ और सिर्फ तुम्हें चाहता था बेइंतहा.....। लेकिन आज इतने सालों बाद तुमसे मिली तो लगा ही नहीं के हम बरसों बाद मिले है। वहीं तुम्हारी हंसी, वही नजरों से देखना मुझे,वहीं बिन कहे मेरी बात समझ जाना।
वहीं सारी हँसी ठिठोली, आज तुम्हारे साथ इतना हँसी मानो कई सालों की हँसी बंद हो कहीं मेरे अंदर। खुश थी आज बहुत मैं जैसे पहले रहती थी तुम्हारे साथ खुश मैं। पर ये क्या कह दिया तुमनें की आज भी तुमसे बात करना अच्छा लगता हैं जैसे पहले लगता था। कहाँ चली गयी थी तुम मुझे छोड़ के कितना याद किया तुम्हें मैंने।
ये सुन जब मैंने तुमसे कहा 'मैं तुमसे बहुत प्यार करती थी और मानती थी कि तुम खुद आके मुझे कहोगें की तुम भी मुझसे प्यार करते हो, लेकिन तुमनें तो किसी और का हाथ थाम लिया था।" तो क्या करती नहीं हुआ बर्दास्त तुम्हें किसी ओर का होता देख इसलिये दूर कर दिया खुद को तुमसे, पर तेरी यादों को आज भी खुद से दूर नहीं कर पायी"।
बोलो क्या कभी एक पल के लिए भी तुम्हें मुझसे प्यार नहीं हुआ। तो तुमने कहा-"मुझे तेरे साथ रहना अच्छा लगता था , तुमसे बात करना अच्छा लगता था,आज भी कोई नहीं है जिससे में इतनी बात करूं जितनी तुमसे करता था। पर यह प्यार था या नहीं मैं समझ ही नहीं पाया। पर तुझे बहुत याद करता था"। यह कह तुम चुप होगये। और मैं यही सोचती रही के मेरा दिल सही कहता था कि वो भी मुझसे प्यार करता है। मेरा प्यार एक तरफा नहीं था।
तभी एक आवाज कानों में पड़ती है "मम्मी खाना दो भूख लगी है"। और वो हकीकत की दुनिया में आ गई ।

भगवतीचरण वर्मा जी का जीवन परिचय -- Life introduction of Bhagwati Charan Varma

पूरा नाम  -    भगवतीचरण वर्मा
जन्म - 30 अगस्त, 1903 उन्नाव ज़िला, उत्तर प्रदेश
मृत्यु - 5 अक्टूबर, 1981
कर्म भूमि - लखनऊ
कर्म-क्षेत्र -  साहित्यकार
मुख्य रचनाएँ  - 'चित्रलेखा', 'भूले बिसरे चित्र', 'सीधे सच्ची बातें', 'सबहि नचावत राम गुसाई', 'अज्ञात देश से आना', 'आज मानव का सुनहला प्रात है', 'मेरी कविताएँ', 'मेरी कहानियाँ', 'मोर्चाबन्दी', 'वसीयत'।
विषय - उपन्यास, कहानी, कविता, संस्मरण, साहित्य आलोचना, नाटक, पत्रकार।
भाषा -हिन्दी
विद्यालय  - इलाहाबाद विश्वविद्यालय
शिक्षा -   बी.ए., एल.एल.बी.
पुरस्कार-उपाधि  -  साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मभूषण
प्रसिद्धि  - उपन्यासकार
नागरिकता -  भारतीय

भगवतीचरण वर्मा हिन्दी जगत के प्रमुख साहित्यकार है। इन्होंने लेखन तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रमुख रूप से कार्य किया है। हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा का जन्म 30 अगस्त, 1903 ई. में उन्नाव ज़िले, उत्तर प्रदेश के शफीपुर गाँव में हुआ था। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए., एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बीच-बीच में इनके फ़िल्म तथा आकाशवाणी से भी इनके सम्बद्ध रहे हैं। बाद में यह स्वतंत्र लेखन की वृत्ति अपनाकर लखनऊ में बस गये। इन्हें राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त करायी गई। कोई उनसे सहमत हो या न हो, यह माने या न माने, कि वे मुख्यत: उपन्यासकार हैं और कविता से उनका लगाव छूट गया है। उनके अधिकांश भावक यह स्वीकार करेंगे की सचमुच ही कविता से वर्माजी का सम्बन्ध विच्छिन्न हो गया है, या हो सकता है। उनकी आत्मा का सहज स्वर कविता का है, उनका व्यक्तित्व शायराना अल्हड़पन, रंगीनी और मस्ती का सुधरा-सँवारा हुआ रूप है। वे किसी 'वाद' विशेष की परिधि में बहुत दिनों तक गिरफ़्तार नहीं रहे। यों एक-एक करके प्राय: प्रत्येक 'वाद' को उन्होंने टटोला है, देखा है, समझने-अपनाने की चेष्टा की है, पर उनकी सहज स्वातन्त्र्यप्रियता, रूमानी बैचेनी, अल्हड़पन और मस्ती, हर बार उन्हें 'वादों' की दीवारें तोड़कर बाहर निकल आने के लिए प्रेरणा देती रही और प्रेरणा के साथ-साथ उसे कार्यान्वित करने की क्षमता और शक्ति भी मिलती रही।
     
भगवतीचरण वर्मा उपदेशक नहीं हैं, न विचारक के आसन पर बैठने की आकांक्षा ही कभी उनके मन में उठी। वे जीवन भर सहजता के प्रति आस्थावान रहे, जो छायावादोत्तर हिन्दी साहित्य की एक प्रमुख विशेषता रही। एक के बाद एक 'वाद' को ठोक-बजाकर देखने के बाद ज्यों ही उन्हें विश्वास हुआ कि उसके साथ उनका सहज सम्बन्ध नहीं हो सकता, उसे छोड़कर गाते-झूमते, हँसते-हँसाते आगे बढ़े। अपने प्रति, अपने 'अहं' के प्रति उनका सहज अनुराग अक्षुण्ण बना रहा। अनेक टेढ़े-मेढ़े रास्तों से घुमाता हुआ उनका 'अहं' उन्हें अपने सहजधर्म और सहजधर्म की खोज में जाने कहाँ-कहाँ ले गया। उनका साहित्यिक जीवन कविता से भी और छायावादी कविता से आरम्भ हुआ, पर न तो वे छायावादी काव्यानुभूति के अशरीरी आधारों के प्रति आकर्षित हुए, न उसकी अतिशय मृदुलता को ही कभी अपना सके। इसी प्रकार अन्य 'वादों' में भी कभी पूरी तरह और चिरकाल के लिए अपने को बाँध नहीं पाये। अपने 'अहं' के प्रति इतने ईमानदार सदैव रहे कि ज़बरन बँधने की कोशिश नहीं की। किसी दूसरे की मान्यताओं को बिना स्वयं उन पर विश्वास किये अपनी मान्यताएँ नहीं समझा। कहीं से विचार या दर्शन उन्होंने उधार नहीं लिया। जो थे, उससे भिन्न देखने की चेष्टा कभी नहीं की।

कृतियाँ :

कवि के रूप में भगवतीचरण वर्मा के रेडियो रूपक 'महाकाल', 'कर्ण' और 'द्रोपदी'- जो 1956 ई. में 'त्रिपथगा' के नाम से एक संकलन के आकार में प्रकाशित हुए हैं, उनकी विशिष्ट कृतियाँ हैं। यद्यपि उनकी प्रसिद्ध कविता 'भैंसागाड़ी' का आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में अपना महत्त्व है। मानववादी दृष्टिकोण के तत्व, जिनके आधार पर प्रगतिवादी काव्यधारा जानी-पहचानी जाने लगी, 'भैंसागाड़ी' में भली-भाँति उभर कर सामने आये थे। उनका पहला कविता संग्रह 'मधुकण' के नाम से 1932 ई. में प्रकाशित हुआ। तदनन्तर दो और काव्य संग्रह 'प्रेम संगीत' और 'मानव' निकले। इन्हें किसी 'वाद' विशेष के अंतर्गत मानना ग़लत है। रूमानी मस्ती, नियतिवाद, प्रगतिवाद, अन्तत: मानववाद इनकी विशिष्टता है।

भगवती चरण वर्मा और हिन्दी साहित्य :

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना के साथ-साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ-साथ गद्य का भी विकास हुआ और छापेखाने के आते ही साहित्य के संसार में एक नई क्रांति हुई। आधुनिक हिन्दी गद्य का विकास केवल हिन्दी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा। पूरे देश में और हर प्रदेश में हिन्दी की लोकप्रियता फैली और अनेक अन्य भाषी लेखकों ने हिन्दी में साहित्य रचना करके इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। भगवती चरण वर्मा जी प्रकाशित पुस्तकें नीचे श्रंखला में दी गई है।

उपन्यास :

पतन (1928),
चित्रलेखा (1934),
तीन वर्ष,
टेढे़-मेढे रास्ते (1946) - इसमें मार्क्सवाद की आलोचना की गई थी।
अपने खिलौने (1957),
भूले-बिसरे चित्र (1959),
वह फिर नहीं आई,
सामर्थ्य और सीमा (1962),
थके पाँव,
रेखा,
सीधी सच्ची बातें,
युवराज चूण्डा,
सबहिं नचावत राम गोसाईं, (1970), 
प्रश्न और मरीचिका, (1973), 
धुप्पल,
चाणक्य, 
क्या निराश हुआ जाए

कहानी-संग्रह :

मोर्चाबंदी

कविता-संग्रह :

मधुकण (1932), 
तदन्तर दो और काव्यसंग्रह- 'प्रेम-संगीत' और 'मानव' निकले।

नाटक :

वसीहत, 
रुपया तुम्हें खा गया

संस्मरण :

अतीत के गर्भ से

साहित्यालोचन :

साहित्य के सिद्घान्त, 
रुप

भगवती चरण वर्मा की प्रतिनिधि रचनाएँ :

स्मृतिकण, 
कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें, 
आज शाम है बहुत उदास, 
आज मानव का, 
तुम सुधि बन-बनकर बार-बार, 
तुम मृगनयनी, 
मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ, 
तुम अपनी हो, जग अपना है, 
देखो-सोचो-समझो, 
पतझड़ के पीले पत्तों ने, 
कल सहसा यह सन्देश मिला, 
संकोच-भार को सह न सका, 
बस इतना--अब चलना होगा, 
आज मानव का सुनहला प्रात है, 
हम दीवानों की क्या हस्ती, 
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम, 
अज्ञात देश से आना, 
बसन्तोत्सव, 
मानव, 
भैंसागाड़ी ।

चित्रलेखा :

चित्रलेखा न केवल भगवतीचरण वर्मा को एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने वाला पहला उपन्यास है बल्कि हिन्दी के उन विरले उपन्यासों में भी गणनीय है, जिनकी लोकप्रियता बराबर काल की सीमा को लाँघती रही है।

चित्रलेखा की कथा पाप और पुण्य की समस्या पर आधारित है-पाप क्या है? उसका निवास कहाँ है ? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए महाप्रभु रत्नांबर के दो शिष्य, श्वेतांक और विशालदेव, क्रमश: सामंत बीजगुप्त और योगी कुमारगिरि की शरण में जाते हैं। और उनके निष्कर्षों पर महाप्रभु रत्नांबर की टिप्पणी है, ‘‘संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।’’

टेढ़े-मेढ़े रास्ते :

टेढ़े मेढ़े रास्ते सन् 1948 में प्रकाशित उनका प्रथम वृहत उपन्यास था जिसे हिन्दी साहित्य के प्रथम राजनीतिक उपन्यास का दर्जा मिला। टेढ़े-मेढ़े रास्ते को उन्होंने अपनी प्रथम शुद्ध बौद्धिक गद्य-रचना माना है। इसमें मार्क्सवाद की आलोचना की गयी है। इसके जवाब में रांगेय राघव ने 'सीधा-सादा रास्ता' लिखी थी।

पुरस्कार :

भगवतीचरण वर्मा को भूले बिसरे चित्र पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

Friday, October 4, 2019

जीवन का फलसफा

एक बार मैं पत्नी के साथ एक होटल में रात को ठहरा था। सुबह दस बजे मैं नाश्ता करने गया। क्योंकि नाश्ता का समय साढ़े दस बजे तक ही होता है, इसलिए होटल वालों ने बताया कि जिसे जो कुछ लेना है, वो साढ़े दस बजे तक ले ले। इसके बाद बुफे बंद कर दिया जाएगा।
कोई भी आदमी नाश्ता में क्या और कितना खा सकता है? पर क्योंकि नाश्ताबंदी का फरमान आ चुका था इसलिए मैंने देखा कि लोग फटाफट अपनी कुर्सी से उठे और कोई पूरी प्लेट फल भर कर ला रहा है, कोई चार ऑमलेट का ऑर्डर कर रहा है। कोई इडली, डोसा उठा लाया तो  एक आदमी दो-तीन गिलास जूस के उठा लाया। कोई बहुत से टोस्ट प्लेट में भर लाया और साथ में शहद, मक्खन और सरसो की सॉस भी।
मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठ कर ये सब देखता रहा ।
एक-दो मांएं अपने बच्चों के मुंह में खाना ठूंस रही थीं। कह रही थीं कि फटाफट खा लो, अब ये रेस्त्रां बंद हो जाएगा।
जो लोग होटल में ठहरते हैं, आमतौर पर उनके लिए नाश्ता मुफ्त होता है। मतलब होटल के किराए में सुबह का नाश्ता शामिल होता है। मैंने बहुत बार बहुत से लोगों को देखा है कि वो कोशिश करते हैं कि सुबह देर से नाश्ता करने पहुंचें और थोड़ा अधिक खा लें ताकि दोपहर के खाने का काम भी इसी से चल जाए। कई लोग इसलिए भी अधिक खा लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मुफ्त का है, तो अधिक ले लेने में कोई बुराई नहीं।
कई लोग तो जानते हैं कि वो इतना नहीं खा सकते, लेकिन वो सिर्फ इसलिए जुटा लेते हैं कि कहीं कम न पड़ जाए।
दरअसल हर व्यक्ति अपनी खुराक पहचानता है। वो जानता है कि वो इतना ही खा सकता है। पर वो लालच में फंस कर ज़रूरत से अधिक जुटा लेता है।
मैं चुपचाप अपनी कुर्सी से सब देखता रहा।
साढ़े दस बज गए थे। रेस्त्रां बंद हो चुका था। लोग बैठे थे। टेबल पर खूब सारी चीजें उन्होंने जमा कर ली थीं।
पर अब उनसे खाया नहीं जा रहा था। कोई भला दो-तीन गिलास जूस कैसे पी सकता है? ऊपर से चार ऑमलेट। बहुत सारे टोस्ट। कई बच्चे मां से झगड़ रहे थे कि उन्हें अब नहीं खाना। मांएं भी खा कर और खिला कर थक चुकी थीं।
और अंत में एक-एक कर सभी लोग टेबल पर जमा नाश्ता छोड़ कर  धीरे-धीरे बाहर निकलते चले गए। मतलब इतना सारा जूस, फल, अंडा, ब्रेड सब बेकार हो गया।

पापा का पहला थप्पड़

जब कभी भी मैं अपने बचपन के दिन याद करती हूं तो पापा का पहला थप्पड़ जरूर याद आता है। पहला थप्पड़ मेरे लिए एक बहुत बड़ी सीख भी बना। जब मैं 4 साल की थी तब मैं पहली बार बड़ी बहन के साथ स्कूल गयी। मेरी बहन जब स्कूल जाती थी तो मेरा भी मन होता की मैं भी स्कूल जाऊं। छोटी और ज्यादा शरारती होने के कारण घरवाले मुझे उसके साथ स्कूल नहीं भेजते थे। मेरे अंदर बहुत जिज्ञासा रहती थी स्कूल देखने की। जब बड़ी बहन घर आकर आपना होमवर्क करती तो मैं उनके पास बैठ कर लिखने के लिए जिद करती थी। उन्होंने स्कूल जाने से पहले मुझे काफी कुछ सिखा दिया था। फिर वो दिन भी आया जब मुझे भी अपनी बहन के साथ स्कूल भेजा गया। स्कूल में देखा कि बहुत सारे बच्चे हैं। इतने में एक घण्टी बजी। सारे बच्चे एक ग्राउंड की तरफ भागने लगे। हम भी वहां चले गए। सारे लाइन बना कर आंखें बंद करके और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। मुझे भी ऐसे ही खड़ा कर दिया गया। सारे बच्चे प्रार्थना करने लगे। मैंने बीच मैं एक आंख खोली और देखा कि सब वैसे ही खड़े हैं। मैंने झट से आंख बंद की और सीधी खड़ी हो गई। उसके बाद दीदी मुझे मेरी क्लास में छोड़ने गई। वहां मेरी उम्र के बहुत सारे बच्चे थे। उनके बीच मुझे भी बैठा दिया। उसके बाद क्लास टीचर ने मुझसे मेरा नाम पूछा और बाकी बच्चों से मेरा इंट्रोडक्शन करवाया और हमें फलों और सब्जियों के नाम याद करवाये। बीच-बीच में दीदी आकर मुझे देख भी जाती थी कि कहीं मैं रो तो नहीं रही हूं। खेलकूद में पता नहीं लगा
कब स्कूल का टाइम पूरा हो गया। उसके बाद मैं दीदी के साथ घर चली गई। मेरे मम्मी पापा भी इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने पूछा -आज कैसा रहा मेरा पहला दिन तो उनको मैं सब डिटेल्स बताती रही। फिर थोड़ी देर बाद पापा बोले-चलो बेटा, आज तुम्हें तुम्हारा नाम लिखना सिखाते हैं। अब तुम स्कूल भी जाने लगी हो तो अपना नाम लिखना भी सीख लो। पापा ने मेरा नाम कॉपी पर लिखा और मुझे बताया कि कैसे लिखना है। मैं बार-बार नाम लिखने मैं गलती कर रही थी। पापा के बहुत बार बताने के बाद भी मैं गलत लिखती जा रही थी। अंत में पापा ने एक चांटा रसीद कर दिया। थप्पड़ लगते ही मैंने नाम झट से सही लिख दिया। पापा का वह पहला थप्पड़ आज भी कोई गलती करने से रोकता है। इस थप्पड़ ने स्कूल का वो पहला दिन हमेशा के लिए यादगार बना दिया।

Thursday, October 3, 2019

ईर्ष्या और हमारा जीवन

एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से कहा कि वे कल प्रवचन में अपने साथ एक थैली में कुछ आलू. भरकर लाएं। साथ ही निर्देश भी दिया कि उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। अगले दिन किसी शिष्य ने चार आलू, किसी ने छह तो किसी ने आठ आलू लाए। प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफरत करते थे।

अब महात्मा जी ने कहा कि अगले सात दिनों तक आपलोग ये आलू हमेशा अपने साथ रखें। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन सबने आदेश का पालन किया। दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों को कष्ट होने लगा। जिनके पास ज्यादा आलू थे, वे बड़े कष्ट में थे। किसी तरह उन्होंने सात दिन बिताए और महात्मा के पास पहुंचे। महात्मा ने कहा, ‘अब अपनी-अपनी थैलियां निकाल कर रख दें।’ शिष्यों ने चैन की सांस ली। महात्मा जी ने विगत सात दिनों का अनुभव पूछा। शिष्यों ने अपने कष्टों का विवरण दिया। उन्होंने आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया। सभी ने कहा कि अब बड़ा हल्का महसूस हो रहा है।…

महात्मा ने कहा, ‘जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफरत करते हैं, आपके मन पर उनका कितना बड़ा बोझ रहता होगा। और उसे आप जिंदगी भर ढोते रहते हैं। सोचिए, ईर्ष्या के बोझ से आपके मन और दिमाग की क्या हालत होती होगी?

 ईर्ष्या के अनावश्यक बोझ के कारण आपलोगों के मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह। इसलिए अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो। यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत मत करो। आपका मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का रहेगा।

अपने शहर में

वर्षों बाद पुणे जा रही हूं. मेरे बचपन और किशोरावस्था का शहर पुणे, जो तब पूना कहलाता था. इतने वर्ष हो गए पूना छोड़े, पर आज भी वह शहर बहुत अपना लगता है. ढेर सारी मधुर स्मृतियां जुड़ी हैं उस शहर से. गाड़ी में बैठते ही मैं कल्पना लोक में पहुंच गई हूं. यादों की यही तो ख़ासियत है कि वह दुनियादारी के नियमों की मोहताज नहीं. न टिकट की ज़रूरत, न किसी की इजाज़त की. जब मर्ज़ी और जहां मर्ज़ी पहुंच जाती है वह.
पिताजी की नौकरी ऐसी थी कि अक्सर तबादला होता रहता था. एक बार जब पुणे तबादला हुआ, तो उन्हें वह शहर, वहां का मौसम इतना पसंद आया कि उन्होंने पुणे में ही अपना घर बनवा लिया और रिटायरमेंट के बाद वहीं बस गए. अब बड़े भइया-भाभी भी वहीं रहते हैं. दीदी का ब्याह एक आर्मी ऑफिसर से हुआ, सो आज यहां, तो कल वहां घूमती ही रहती हैं. घर में मैं सबसे छोटी थी. समय आने पर मेरी शादी मेरठ के एक संयुक्त धनी परिवार में हुई. इनका अपना कारोबार है. यहां हर रिश्ता दौलत से तौला जाता है. व्यक्ति का सम्मान उसके बैंक बैलेंस के अनुसार किया जाता है. मेरे मायके के लोग अधिक शिक्षित व संभ्रान्त होते हुए भी इनसे कम हैं. इस परिवार की अपनी परंपराएं हैं, जिसके अनुसार स्त्री घर के भीतर ही शोभा पाती है. ख़ूब ऐशो-आराम, ख़ूब ठाठ-बाट हैं, लेकिन नियम-क़ानून भी बहुत हैं. गहने-कपड़ों का ढेर है, क्योंकि इसी से तो लोगों को पारिवारिक समृद्धि का पता चलता है, लेकिन घर की स्त्रियों की इच्छाओं की कोई क़ीमत नहीं, उनसे राय-मशवरा करने की ज़रूरत कोई महसूस नहीं करता.
हमारे शास्त्रों में स्त्री को देवी का दर्जा प्राप्त है. देवी की मूर्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अच्छी तरह सजाया जाता है, असली हीरे-जवाहरात तक पहनाए जाते हैं, पर उसका स्थान घर के भीतर का कोई कोना ही होता है, जहां वह ख़ामोश खड़ी रहती है. ठीक यही स्थिति इस घर में स्त्रियों की भी है.
पति शशांक अपने कारोबार में व्यस्त रहते हैं, पर खाली होने पर भी उनके जीवन में मेरे लिए कोई जगह नहीं है. संयुक्त परिवार है, तो कुछ समय तो कट जाता है, पर समय काटना और जीना दो अलग-अलग बातें हैं न! कभी नहीं सोचा था कि विवाहित जीवन में और भरे-पूरे परिवार में भी इस कदर अकेलापन महसूस हो सकता है. पति का शुष्क व्यवहार पूरे जीवन को रेगिस्तान में बदल सकता है. शरीर की सारी क्रियाएं चलती हैं, फिर भी भीतर ही भीतर सब कुछ मर जाए, उस स्थिति के लिए कौन-सा शब्द है शब्दकोश में? डॉक्टर इस रोग का इलाज क्यों नहीं खोजते?
बीच में एक ही बार आ पाई थी पुणे पापा के स्वर्गवास के बाद. मां तो मेरी शादी से पहले ही इस दुनिया से चली गई थीं. उस माहौल में घर से बाहर निकलना नहीं हो पाया, ज़्यादा किसी से बात भी नहीं हुई. अपनी बेटी की शादी में पूरे परिवार को सादर निमंत्रित करने भइया और भाभी स्वयं आए थे, बाकी सबने तो व्यस्तता का बहाना बना दिया, पर मैं ख़ुश थी कि मुझे जाने की अनुमति मिल गई. मेरे लिए यही बहुत था. अब कल्पना लोक से बाहर आने का व़क्त हो गया है, क्योंकि मैं अपने शहर पहुुच चुकी हूं.
अपने शहर में होने की ख़ुशी में सुबह जल्दी ही नींद खुल गई है. कुछ अजीब-सी मनःस्थिति है. कुछ-कुछ स्वप्न-सी अवस्था ‘क्या मैं सचमुच पुणे पहुंच गई हूं?’ आकाश में बादल हैं और हवा भी चल रही है. मन में उमंग है. ये सब मैं सोकर नहीं गंवाना चाहती, इसलिए जूते पहनकर बाहर निकल आई हूं. स्वयं को एक ऐसे पंछी की तरह महसूस कर रही हूं, जिसे थोड़े दिनों के लिए पिंजरे से बाहर उन्मुक्त उड़ने की आज़ादी मिल गई है. यूं पुणे शहर बदल गया है, पर मेरे आसपास जाने-पहचाने रास्ते हैं, पुराने लैंडमार्क हैं. हमारे घर की लंबी-सी सड़क के बाद दाएं मुड़ते ही पार्क है और उसके बाद पहली कोठी चोपड़ा अंकल की है. उनका कारों का अपना शोरूम है. उनके चार बेटों में सबसे बड़ा बेटा स्कूल में भइया के संग पढ़ता था. इन दोनों की गहरी दोस्ती थी, इसी कारण मम्मी-पापा का चोपड़ा अंकल और आंटी से परिचय हुआ था. आना-जाना शुरू हुआ, जिसने पारिवारिक मैत्री का रूप ले लिया. तीसरे नंबर का बेटा माधव मेरे स्कूल में था, मुझसे दो साल सीनियर. तब शहर इतना फैला नहीं था. स्कूल की अपनी बसें नहीं थीं और हम पैदल ही स्कूल आया-जाया करते थे. हां, माधव के पास अपनी ख़ुद की साइकिल थी. मुझे गाने का शौक़ था और मैंने एक विषय संगीत ले रखा था. स्कूल के कार्यक्रमों में मेरा कोई गीत होता, जिसकी रिहर्सल अथवा कार्यक्रमवाले दिन मुझे देर तक रुकना पड़ता, तो माधव लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ता रहता और मुझे संग लेकर लौटता, ख़ासकर सर्दियों में. पुणे में वैसे बहुत ज़्यादा ठंड तो नहीं पड़ती थी, पर फिर भी शाम जल्दी घिर आती थी. माधव की उपस्थिति निश्‍चय ही मुझे सुरक्षा का एहसास दिलाती थी.
चोपड़ा अंकल के गेट तक जाकर मैं रुक गई हूं. यह तो पता है कि अंकल नहीं रहे, लेकिन आंटी से मिलने का मन हो आया है. सूरज अभी अपनी आरामगाह से निकला नहीं है या फिर बादलों की वजह से रोशनी कम है, पता नहीं. मैं इसी पसोपेश में खड़ी हूं कि अभी भीतर जाना ठीक है या नहीं कि तभी उनके घर में भीतर का दरवाज़ा बंदकर कोई बाहर आता दिखाई दिया. पास आने पर ही मैंने पहचाना, “माधव! पहचाना मुझे?”
“हां वसु! मुझे पता था, तुम आनेवाली हो. कल रात ही आई हो ना. अभी तुम न आती, तो मैं शाम को तुमसे मिलने आता ही.” उसने बड़े उत्साह से कहा.
‘वसु!’ कितना अपनत्व है इस संबोधन में. यह शहर अपना है, अपने लोगों का है और इसीलिए इस शहर के लिए मैं वसु हूं, मेरठ जाकर वसुंधरा बन जाती हूं.
लॉन में रखी कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए माधव ने कहा, “मां की तो अभी आधा घंटा पूजा चलेगी और बाकी लोग सो रहे हैं, तब तक हम यहीं ताज़ी हवा में बैठते हैं. अच्छा है तुम मिल गई. दो मिनट बाद आती, तो मैं भी सैर पर निकल चुका होता.” दो मिनट मौन छाया रहा. मुलाक़ात होती रहती है, तो बातों के सूत्र भी जुड़ते चले जाते हैं. इतने सालों के बाद मिलने पर नए सूत्र तलाशने पड़ते हैं. क्या बोलूं, कुछ समझ नहीं आया, तो बादलों की ओर देखते हुए मैंने कहा- “लगता है बारिश होगी…”
“अच्छा है न! तुम्हें तो बारिश में भीगना बहुत पसंद है ना.”
मैंने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा, पर कुछ अधिक देर तक ही. अपनी हैरानी में शिष्टाचार की सीमा भी लांघ गई शायद. इसे याद है अभी तक यह बात? याद है वह दिन? अच्छा मौसम देखकर हम सब पिकनिक के मूड में आ गए थे और दोनों परिवार चल पड़े थे पिकनिक मनाने. कहीं दूर नहीं, पास ही के एक गार्डन में. थोड़ी देर में ही आसमान से बूंदें गिरने लगीं. पहले नन्हीं-नन्हीं, फिर मोटी-मोटी. जब सब लोग इधर-उधर छत खोज रहे थे, तो मैं हथेलियां और चेहरा ऊपर उठाए बारिश का आनंद ले रही थी, जब तक कि मां ने आवाज़ लगाकर छप्पर के नीचे नहीं बुला लिया. मेरी ज़िंदगी कितनी बदल गई है. मेरे पति शशांक को यह सब बिल्कुल नहीं पसंद. कोई मुझे देखे न, इसलिए मैं बारिश का आनंद लेने अपने तिमंज़िले घर की छत पर चली जाती हूं, तब भी ग़ुस्सा हो जाते हैं.
“क्या सड़कछाप लोगों की तरह वाहियात शौक़ हैं तुम्हारे.” उनका कथन है.
उन्हें क्या पता, ये छोटे-छोटे शौक़ ज़िंदगी को कितना जीवंत बना देते हैं.
आज शाम को ही सगाई की रस्म है. मैं तैयार होकर पंडाल में आ बैठी हूं, ताकि अरसे बाद मिल रहे परिचितों से इत्मीनान से बातचीत कर सकूं कि तभी माधव आता दिखाई पड़ा है. भइया ने चोपड़ा परिवार के सभी सदस्यों को कोई न कोई काम सौंप रखा है. माधव को शायद पंडाल की ज़िम्मेदारी मिली है. मुझे बैठा देख वह झट से डीजे की तरफ़ मुड़ गया और वहां से लौटकर बोला, “तुम्हारी पसंद के गाने उन्हें लिखकर दे आया हूं. तुम बैठकर सुनो.” मुझे विश्‍वास नहीं होता कि इतने सालों बाद भी उसे मेरी पसंद के गाने याद होंगे, पर शीघ्र ही हेमंत कुमार साहब की आवाज़ फ़िज़ा में गूंज गई.
“तुम्हें अभी तक याद हैं मेरी पसंद के गाने?” मैंने आश्‍चर्यपूर्वक पूछा.
वह कुछ देर तक सोचता रहा फिर बोला, “मुझे तो बहुत कुछ…” और फिर वाक्य बीच में ही छोड़ दिया, पर अधूरा रह गया वाक्य अधिक अर्थपूर्ण हो गया है. सच है, कभी-कभी ख़ामोशी शब्दों से अधिक बोल जाती है और एक के बाद एक गाने बजने लगे सब मेरी पसंद के. गीत-संगीत मुझे मां से विरासत में मिला है. बस, गानों की पसंद अलग-अलग है. मां पंजाबी टप्पे, शादी-ब्याह के गीत, भजन आदि को शौक़ से गाती थीं और मैं नई क़िस्म के गाने पसंद करती थी.
“याद है तुम्हें, तुम्हारे भइया की शादी में तुम्हारे काले सूट पर दही वड़े का पूरा डोंगा ही उलट गया था. तुम्हें तो रोना आ गया था. तब मैंने नई-नई कार चलानी सीखी थी और तुम्हें कपड़े बदलवाने घर ले आया था.”
याद कैसे नहीं होगा. सारा दृश्य अंकित है मानसपटल पर आज तक. मैं नौंवी कक्षा में थी. जब माधव स्कूल पासकर पिलानी चला गया था और उसके बाद अमेरिका ऑटोमोबाइल की ट्रेनिंग लेने, ताकि कारों के बिज़नेस में नई तकनीक काम में लाई जा सके. पर भइया की शादी गर्मियों की छुट्टी में हुई थी, इसलिए माधव भी उस समय घर पर आया हुआ था.
तब कुंआरी लड़कियां आज की तरह बनाव- शृंगार नहीं करती थीं. कपड़ों पर बेहिसाब पैसा ख़र्च नहीं किया जाता था. दीदी ने मेरे लिए घर पर ही काले क्रेप का सूट सिलकर उसके गले और दुपट्टे के चारों ओर स़फेद सीपियां लगा दी थीं. मेरे लिए वही नायाब ड्रेस बन गई थी. पहनकर बाहर निकली ही थी कि सामने माधव पड़ गया और कुछ देर खड़ा देखता ही रह गया. मुंह से कुछ न बोलकर भी उसकी आंखें हज़ारों कॉम्प्लीमेंट्स दे गईं. बारात में भी मैंने उसे अपनी ओर देखते पाया. विवाह स्थल पर बारात पहुंचे काफ़ी समय हो गया था और ज़्यादातर लोग खाना खाकर लौट भी चुके थे. रस्में शुरू होनेवाली थीं और अभी परिवारवालों का भोजन नहीं निपटा था. उसी अफ़रा-तफ़री में बैरे की असावधानी वश दही वड़े से भरा डोंगा मेरे कपड़ों पर उलट गया. अच्छा था कि विवाह स्थल हमारे घर से अधिक दूर नहीं था, लेकिन घर के सभी लोग व्यस्त थे, तो चोपड़ा अंकल ने माधव से कहा कि कपड़े बदलवाने मुझे घर ले जाए.
‘कितनी अजीब-सी उम्र होती है किशोरावस्था की. मासूमियत की दीवार भेद एक अनोखी नई दुनिया भीतर घुसपैठ करने लगती है. भावनाएं डगमगाने लगती हैं. कोई अच्छा लगने लगता है अकारण ही. जी चाहता है वह तारीफ़ करे, ध्यान दे आपकी तरफ़. शशांक के साथ इतने बरस रहकर भी मन के तार उस तरह कभी नहीं झनझनाए, जैसे कभी माधव को देखकर झनझनाया करते थे, पर उसने इतने वर्षों बाद भी क्यों याद रखा यह सब?’ इसका उत्तर तो वही दे सकता है.
हम पुरानी यादें ताज़ा कर रहे हैं. कुछ भूली बातें भी अनायास याद आ रही हैं, आते ही चली जा रही हैं. इतने में माधव की पत्नी रेणुका आ गई है. फूलों की महक लिए खिला-खिला-सा चेहरा और चेहरे पर बौद्धिकता की स्पष्ट छाप. मैं पहली बार उससे मिल रही हूं. “कॉलेज में मनोविज्ञान पढ़ाती है.” माधव ने सगर्व उसका परिचय दिया.
माधव के बाकी भाई तो बीए कंप्लीट करते ही पिता का हाथ बंटाने लगे थे, पर माधव अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त करके आया था, इसलिए उसके लिए लड़की भी शिक्षित ढूंढ़ी गई. “वैसे तो मुझे नौकरी करने की कोई आर्थिक ज़रूरत नहीं थी, लेकिन मनोविज्ञान पढ़ाना मेरा शौक़ है. माधव ने न स़िर्फ ख़ुद अनुमति दी, वरन् मम्मी-पापा को भी राज़ी करवा लिया.” रेणुका ने गर्व एवं नेह मिश्रित भाव से उसकी ओर देखते हुए बताया.
ज़िंदगी का दरिया न स़िर्फ अपनी गति से चलता है, बल्कि वह अपनी राह भी स्वयं बनाता है. हमें ही उसके अनुरूप ढलते रहना होता है. उस पर मैं तो किसी को दोष भी नहीं दे सकती, समय को भी नहीं. हमारी दोस्ती इस बिंदु तक पहुंची ही नहीं थी, जहां वादे किए जाते हैं. प्रीत-प्यार की, स्त्री-पुरुष संबंधों की कोई समझ ही नहीं थी तब मुझमें. वह अच्छा लगता था बस और जब तक यह बात समझ में आई, वह जा चुका था. माधव मुझसे कुछ बड़ा था. हो सकता है उसके मन ने कुछ अधिक महसूस किया हो. ख़ैर जो भी था, उसके मन के भीतर ही था. उसने कभी स्पष्ट रूप से कुछ कहा नहीं. हर उम्र का अपना एक सच होता है. वह हमारे किशोरवय का सच था, जब माधव और मेरी मैत्री थी. वह मुझे बहुत अपना-सा लगता था. आज का सच यह है कि हम दोनों को अपने-अपने परिवार से निष्ठा निभानी है- और बुझे मन से भी नहीं, बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी, क्योंकि अब हम किशोरवय नहीं रहे, परिपक्व हो चुके हैं. कविगण कहते हैं कि ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ इस आधे-अधूरे मिले जहान को हमें स्वयं पूर्ण करना होता है. रेणुका ने अपनी अस्मिता तलाश ली है. ठीक है, उसे अपने पति का सहयोग प्राप्त है, पर मैं भी इतनी अक्षम तो नहीं कि ज़िंदगी से हार मान लूं. मेरे पास मेरा संगीत है, अपनी पहचान बनाने के लिए. घर पर अभ्यास करने की इजाज़त न मिली, तो उसके लिए किसी संगीत विद्यालय जा सकती हूं.
पिछले दस दिनों में कितना कुछ संजो लिया है मैंने. हालांकि देखा जाए, तो हुआ कुछ भी नहीं, पर मैं ख़ुश हूं, बहुत ख़ुश! क्या नाम दूं अपनी इस ख़ुशी को? क्या होती है ख़ुशी की असली परिभाषा? ख़ुशियों के छोटे-छोटे असंख्य क्षण होते हैं, जो मिलकर जीवन को अर्थ देते हैं. मेरी किशोरवय का एक टुकड़ा किसी ने अपनी स्मृति में संजो रखा है एक फ्रेम जड़ी तस्वीर की मानिंद, यही काफ़ी है मेरा खोया आत्मविश्‍वास लौटाने के लिए और मैं माधव की याद को दीये की लौ-सा मन में संजो आई हूं. आश्‍चर्य! यह लौ तपिश नहीं दे रही, ठंडक पहुंचा रही है मन को. सुकून दे रही है, आगे की राह दिखा रही है.

असली पूजा

ये  लड़की  कितनी नास्तिक  है ...हर  रोज  मंदिर के  सामने  से  गुजरेगी  मगर अंदर  आकर  आरती  में शामिल  होना  तो  दूर, भगवान  की  मूर्ति ...