Saturday, September 14, 2019
मिटटी का घड़ा
महाकवि कालिदास जी, राजा विक्रमादित्य के दरबार में मुख्य कवि थे। एक दिन ऐसे ही सभी लोग दरबार मैं बैठ हुए थे। गर्मियों का समय था उन दिनों बिजली और कूलर तो थे नहीं, तो सारे लोग पसीने से लथपथ हुए बैठे थे।
राजा विक्रमादित्य दिखने में बहुत सुन्दर थे, बलिष्ठ भुजाएं और चौड़ा सीना उनकी खूबसूरती में चार चाँद लगा देता था। विक्रमादित्य के माथे से छलकता पसीना भी एक मोती जैसा दिखाई देता था।
वहीँ कालिदास जी एकदम कुरूप थे और पसीने की वजह से उनकी दशा बुरी बनी हुई थी।
कालिदास को देखकर विक्रमादित्य को तेज हंसी आ गई और वो कालिदास से बोले – महाकवि आप कितने कुरूप हैं, और इस गर्मी में पसीने से लथपथ होकर आप और भी बदसूरत दिखाई दे रहे हैं।
कालिदास जी को राजा विक्रमादित्य की बात बहुत बुरी लगी, उन्होंने पास खड़ी दासी से दो घड़े मंगाए – एक घड़ा सोने का और दूसरा मिटटी का
इसके बाद कालिदास ने उन दोनों घड़ों में पानी भरकर रख दिया। राजा विक्रमादित्य बड़े आश्चर्य से कालिदास के कारनामे देख रहे थे।
कालिदास जी ने कहा – महाराज, देखिये ये मिटटी का घड़ा कितना कुरूप दिखता है, और ये सोने का घड़ा देखिये कैसा चमक रहा है। चलिए मैं आप को सोने के घड़े से पानी पिलाता हूँ।
विक्रमादित्य ने सोने के घड़े का पानी पिया, पानी घड़े में रखा रखा उबल जैसा गया था।
इसके बाद कालिदास जी ने मिटटी के घड़े से पानी लेकर राजा को दिया। वाह ! मिटटी के घड़े का पानी एकदम शीतल था। तब कहीं जाके राजा विक्रमादित्य की प्यास बुझी।
कालिदास ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा – देखा महाराज, रूप और सुंदरता किसी काम की नहीं है, कर्म ही आपको सुन्दर और शीतल बनाते हैं।
सोने का घड़ा दिखने में चाहे जितना सुन्दर हो लेकिन शीतल जल केवल मिटटी का घड़ा ही दे सकता है।
राजा विक्रमादित्य भी हल्की मुस्कान के साथ कालिदास जी की बातों से सहमत नजर आये!
Friday, September 13, 2019
जीवन का मूल्य क्या है?
यह कहानी पुराने समय की है।
एक दिन एक आदमी गुरु के पास गया और उनसे कहा, 'बताइए गुरुजी, जीवन का मूल्य क्या है?'
गुरु ने उसे एक पत्थर दिया और कहा, 'जा और इस पत्थर का मूल्य पता करके आ, लेकिन ध्यान रखना पत्थर को बेचना नहीं है।'
वह आदमी पत्थर को बाजार में एक संतरे वाले के पास लेकर गया और संतरे वाले को दिखाया और बोला, 'बता इसकी कीमत क्या है?'
संतरे वाला चमकीले पत्थर को देखकर बोला, '12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे जा।'
वह आदमी संतरे वाले से बोला, 'गुरु ने कहा है, इसे बेचना नहीं है।'
और आगे वह एक सब्जी वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाया। सब्जी वाले ने उस चमकीले पत्थर को देखा और कहा, 'एक बोरी आलू ले जा और इस पत्थर को मेरे पास छोड़ जा।'
उस आदमी ने कहा, 'मुझे इसे बेचना नहीं है, मेरे गुरु ने मना किया है।'
आगे एक सोना बेचने वाले सुनार के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
सुनार उस चमकीले पत्थर को देखकर बोला, '50 लाख में बेच दे'।
उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, '2 करोड़ में दे दे या बता इसकी कीमत जो मांगेगा, वह दूंगा तुझे...।'
उस आदमी ने सुनार से कहा, 'मेरे गुरु ने इसे बेचने से मना किया है।'
आगे हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
जौहरी ने जब उस बेशकीमती रुबी को देखा तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपड़ा बिछाया, फिर उस बेशकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, 'कहां से लाया है ये बेशकीमती रुबी? सारी कायनात, सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती। ये तो बेशकीमती है।'
वह आदमी हैरान-परेशान होकर सीधे गुरु के पास गया और अपनी आपबीती बताई और बोला, 'अब बताओ गुरुजी, मानवीय जीवन का मूल्य क्या है?'
गुरु बोले, 'तूने पहले पत्थर को संतरे वाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत 12 संतरे बताई। आगे सब्जी वाले के पास गया, उसने इसकी कीमत 1 बोरी आलू बताई। आगे सुनार ने 2 करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बेशकीमती बताया। अब ऐसे ही तेरा मानवीय मूल्य है। इसे तू 12 संतरे में बेच दे या 1 बोरी आलू में या 2 करोड़ में या फिर इसे बेशकीमती बना ले, ये तेरी सोच पर निर्भर है कि तू जीवन को किस नजर से देखता है।'
सीख : हमें कभी भी अपनी सोच का दायरा कम नहीं होने देना चाहिए।
एक दिन एक आदमी गुरु के पास गया और उनसे कहा, 'बताइए गुरुजी, जीवन का मूल्य क्या है?'
गुरु ने उसे एक पत्थर दिया और कहा, 'जा और इस पत्थर का मूल्य पता करके आ, लेकिन ध्यान रखना पत्थर को बेचना नहीं है।'
वह आदमी पत्थर को बाजार में एक संतरे वाले के पास लेकर गया और संतरे वाले को दिखाया और बोला, 'बता इसकी कीमत क्या है?'
संतरे वाला चमकीले पत्थर को देखकर बोला, '12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे जा।'
वह आदमी संतरे वाले से बोला, 'गुरु ने कहा है, इसे बेचना नहीं है।'
और आगे वह एक सब्जी वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाया। सब्जी वाले ने उस चमकीले पत्थर को देखा और कहा, 'एक बोरी आलू ले जा और इस पत्थर को मेरे पास छोड़ जा।'
उस आदमी ने कहा, 'मुझे इसे बेचना नहीं है, मेरे गुरु ने मना किया है।'
आगे एक सोना बेचने वाले सुनार के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
सुनार उस चमकीले पत्थर को देखकर बोला, '50 लाख में बेच दे'।
उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, '2 करोड़ में दे दे या बता इसकी कीमत जो मांगेगा, वह दूंगा तुझे...।'
उस आदमी ने सुनार से कहा, 'मेरे गुरु ने इसे बेचने से मना किया है।'
आगे हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
जौहरी ने जब उस बेशकीमती रुबी को देखा तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपड़ा बिछाया, फिर उस बेशकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, 'कहां से लाया है ये बेशकीमती रुबी? सारी कायनात, सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती। ये तो बेशकीमती है।'
वह आदमी हैरान-परेशान होकर सीधे गुरु के पास गया और अपनी आपबीती बताई और बोला, 'अब बताओ गुरुजी, मानवीय जीवन का मूल्य क्या है?'
गुरु बोले, 'तूने पहले पत्थर को संतरे वाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत 12 संतरे बताई। आगे सब्जी वाले के पास गया, उसने इसकी कीमत 1 बोरी आलू बताई। आगे सुनार ने 2 करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बेशकीमती बताया। अब ऐसे ही तेरा मानवीय मूल्य है। इसे तू 12 संतरे में बेच दे या 1 बोरी आलू में या 2 करोड़ में या फिर इसे बेशकीमती बना ले, ये तेरी सोच पर निर्भर है कि तू जीवन को किस नजर से देखता है।'
सीख : हमें कभी भी अपनी सोच का दायरा कम नहीं होने देना चाहिए।
Thursday, September 12, 2019
विश्वास
सुबह के सौ कामों के बीच मैं लगातार बजने वाली कॉलबेल को अनसुना कर रही थी, लेकिन जब किसी ने भी दरवाज़ा नहीं खोला, तो मुझे ही गैस बंद करके जाना पड़ा. वहां मैंने जिसे देखा, उसे देखकर तो जैसे मुझे सांप ही सूंघ गया. दरवाज़े से हटने की सामान्य औपचारिकता भी भूल गई मैं. वह सुगंधा थी, मेरी जेठानी की छोटी बहन. वर्षों बाद मैं उसे देख रही थी. वह पहले से अधिक ख़ूबसूरत और आकर्षक लग रही थी. टाइट जींस और शॉर्ट टॉप पहने उसने घने बालों का एक बेतरतीब जूड़ा बना रखा था, जो उसे और सुंदर बना रहा था.
“रीमाजी, मैं अंदर आ जाऊं?” उसने च्युइंगम चबाते हुए पूछा. वह शायद मेरी मनोदशा भांप रही थी.
“हां-हां, क्यों नहीं?” अंदर आते ही वह जेठानी की खुली बांहों में जा गिरी.
“ओह दीदी! एक अर्से बाद तुम्हें देख रही हूं.”
“तू तो यहां का रास्ता ही भूल गई?”
“याद तो सबकी आती थी, बस मौक़ा ही नहीं मिला. जीजाजी कहां हैं? हंसी और ख़ुशी किस कोने में छुपी हैं और आपके लाडले देवर?”
‘लाडले देवर’ की जिज्ञासा ने मेरा मूड चौपट कर दिया. मैं शंकित थी. कुछ ही देर में हंसी-ख़ुशी, रुचि, मॉन्टी सब उसे घेरकर बैठ गए. जेठजी सुगंधा की पसंद की दुकान से गरम कचौड़ी और गुलाब जामुन लाने चल दिए. मैं चाय बनाने लगी, बच्चे उससे चिपके बैठे थे. सुगंधा ने उनका स्कूल जाना कैंसल कर दिया. तभी मेरे पति प्रीतम वहां आए. सबने उनका स्वागत किया. सुगंधा बोली, “प्रीतम, तुम्हारी देर से सोकर उठने की आदत अब तक नहीं गई?”
“कुछ आदतें ज़िंदगीभर नहीं छूटतीं.” प्रीतम बोले.
“सचमुच?” वह रहस्यपूर्ण अंदाज़ में खिलखिलाई. बातें करते-करते बेख़्याली में सुगंधा ने बालों की क्लिप निकाल दी. झप् से ढेर सारे काले बाल उसके चेहरे, कंधों व पीठ पर गिर आए. बीच में उसका गौरवर्ण अंडाकार चेहरा बादलों के बीच चांद का भ्रम उत्पन्न करने लगा. प्रीतम ने उस पर एक भरपूर नज़र डाली. सुगंधा शायद यही चाहती थी. वह विजयी भाव से मुस्कुराने लगी.
मेरा दिल किसी अनहोनी की आशंका से कांपने लगा. मैं सबके बीच अनिच्छित रूप से खिसियानी मुस्कुराहट लिए बैठी थी. फिर उठकर रसोई में आ गई, जहां मेरा एकछत्र साम्राज्य था. जेठानी आकर सुगंधा की पसंद बता गई थीं. बच्चे तो स्कूल गए नहीं थे. सुगंधा, जेठजी और प्रीतम से भी न जाने का अनुरोध करने लगी, किंतु वे दोनों खा-पीकर क्षमायाचना करके ऑफ़िस चले गए.
उनके जाने के बाद मैंने राहत की सांस ली कि चलो अब प्रीतम सुगंधा के बाणों से घायल नहीं हो पाएंगे.
दोपहर में सब आराम करने चले गए. जेठानी ने मुझे रोक लिया, “छोटी, तेरी तबियत तो ठीक है?” जेठानी ने मेरा मलिन रूप देखकर पूछा.
“दीदी, सुगंधा क्यों आई है?” मैंने साफ़-साफ़ पूछा.
“अरे, हम सबसे मिलने आई है, यह भी कोई बात हुई पूछने की? तू निश्चिंत रह, वो बस घूमने-फिरने आई है. कोई ऐसी बात नहीं है, जैसा तू सोच रही है.” जेठानी मेरी मनोदशा समझ रही थीं.
मैं अपने कमरे में आ गई. सुगंधा अक्सर अपनी बहन और जीजाजी से मिलने पहुंच जाती थी. उसी दौरान उसे प्रीतम से प्यार हो गया. प्रीतम भी उस पर जान छिड़कने लगे थे. उनके प्यार को पूरे परिवार की स्वीकृति मिली, बस विवाह की मुहर लगनी बाकी थी. मगर इसी बीच उन दोनों में झगड़ा हो गया. कारण कोई अरबपति व्यवसायी था, जो न्यूयॉर्क में रहता था. झगड़े ने इतना तूल पकड़ा कि सुगंधा चट मंगनी पट ब्याह करके उस व्यवसायी के साथ न्यूयॉर्क चली गई.
प्रीतम सुगंधा की याद में पागल-से हो गए थे. अक्सर ऑफ़िस से छुट्टी लेकर निरुद्देश्य घर में पड़े रहते. इस बीच लंबी बीमारी के बाद पिता की मृत्यु ने उन्हें अंदर तक झिंझोड़ दिया. पिता की मृत्यु से बिस्तर पकड़ चुकी उनकी मां ने उनसे शादी का वचन लिया और बेमन से प्रीतम ने मुझसे शादी कर ली. मैंने भी धैर्य का परिचय दिया. प्यार व सहानुभूति का मरहम प्रीतम के दिल पर रखा. छोटे-छोटे वाक्यों से हमारी बोलचाल शुरू हुई. उनके सभी काम में उनकी मदद करते-करते मैंने उनके अभेद्य किले में सेंध लगानी शुरू की. फिर घर की छोटी-बड़ी हर चीज़ के लिए वे मुझ पर निर्भर हो गए.
तभी प्रीतम की माताजी गुज़र गईं और बुरी तरह से टूटे प्रीतम को मैंने संभाला. वे छोटे बालक की तरह मेरी बातें सुनते, समझते और धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को ज़िंदगी की लय में ढाल लिया.
प्रीतम मेरे धैर्य और समझदारी के कायल हो गए थे और शादी के दस महीने बाद आख़िरकार उन्होंने मुझे स्वीकारा. वे टूटकर चाहनेवाले पति और बहुत परवाह करनेवाले साथी सिद्ध हुए. उन्होंने मुझे रुचि और मॉन्टी के रूप में प्यार की दो सौग़ातें भी दीं.
सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि अचानक इस काली आंधी ने मेरे जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया. जो व्यक्ति सुगंधा की अनुपस्थिति में इतना दीवाना-सा घूमता रहता था, वह उसे अपने पास पाकर कितना मोहित हो जाएगा, क्या पता? इन संशयों के बीच हमारे प्रेम-विश्वास की एक क्षीण-सी प्रकाश रेखा भी थी.
शाम को देखा, तो सुगंधा आकर्षक साड़ी, ज़ेवर व मेकअप में थी. सामने प्रीतम और जेठजी बैठे थे. जेठानी चाय के साथ पकौड़े तलकर ला रही थी. ऑफ़िस से लौटे दोनों भाइयों को सुगंधा इसरार से पकौड़े खिला रही थी. एक की विगत प्रेमिका और एक की साली, भला महफ़िल में जान क्यों न पड़ती?
“अरे रीमा, तू उठ गई? आ, चाय पी.” जेठानी ने बुलाया, पर पता नहीं क्यों मुझे लगा कि सुगंधा को मेरा आना अच्छा नहीं लगा. बोली, “आप सो रही थीं, इसलिए हमने आपको जगाया नहीं.”
सुगंधा के पॉलिश्ड डायलॉग का छिपा अर्थ था, “तुम्हारी यहां कोई ज़रूरत ही नहीं थी.” सजी-धजी सुगंधा के सामने मैं फीकी लग रही थी. सिलवटग्रस्त साड़ी, बेतरतीब बाल और रंग उड़ा चेहरा.
घूमने का प्रोग्राम बना. मैं सिरदर्द का बहाना बनाकर कमरे में आ गई. अचानक हवा की तरह प्रीतम अंदर आए, “तुम्हें क्या हो गया है? सुबह से मुंह उतारे घूम रही हो? चलो तैयार हो जाओ.”
“मैं रंग में भंग डालना नहीं चाहती. आप लोग हो आइए.”
इस बीच प्रीतम-प्रीतम रट लगनी शुरू हो गई, जिसमें सबसे ऊंची आवाज़ सुगंधा की थी. प्रीतम मुझे ग़ुस्से में घूरते हुए चले गए. मुझे रोना आने लगा.
कई दिन बीत गए. रोज़ ही पिकनिक, शॉपिंग व मूवी देखने का कार्यक्रम बनता. सुगंधा पर मेरा संदेह बढ़ने लगा और एक दिन मेरा संदेह सच में बदल गया. शाम को मुझे याद आया कि छत पर सूखे कपड़े पड़े हैं. मैं छत पर पहुंची, उसके तुरंत बाद मैंने देखा, सुगंधा प्रीतम का हाथ पकड़कर लगभग उसे घसीटते हुए लेकर चली आ रही है. मैंने तुरंत स्वयं को तार पर फैली चादर की ओट में कर लिया.
“क्या बात है सुगंधा, यहां क्यों लेकर आई हो तुम मुझे?” यह प्रीतम थे.
“तुमसे कुछ व्यक्तिगत बातें करनी हैं.” सुगंधा ने कहा.
“व्यक्तिगत बातें?” प्रीतम के स्वर की उत्सुकता ने मेरे मन में शंकाओं के तूफ़ान खड़े कर दिए. रिश्तों की किरचियां मेरे अंग-प्रत्यंग में नश्तर चुभो रही थीं.
सुगंधा प्रीतम से कहने लगी, “प्रीतम, विवेक से शादी मेरे जीवन की बहुत बड़ी भूल थी. यह मुझे बाद में पता चला. सात वर्ष असफल वैवाहिक जीवन काटे हैं मैंने और तुमने भी तो मेरे बिना ये सात वर्ष अप्रिय वातावरण में ही बिताए हैं न? अब हम नए सिरे से जीवन शुरू करेंगे.” सुगंधा के स्वर में प्रीतम को तुरंत पा लेने की व्याकुलता थी.
“अप्रिय वातावरण? किसने कहा सुगंधा? मेरे दो प्यारे बच्चे हैं, पत्नी है और मैं उनके साथ बहुत ख़ुश हूं.”
“इस तरह झूठ बोलकर तुम स्वयं को धोखे में रख सकते हो, मुझे नहीं.”
“सुगंधा, मैं अपने संसार में सुखी और संतुष्ट हूं. तुम एक विवाहिता स्त्री हो मेरे लिए, उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं.”
“प्लीज़ प्रीतम, ऐसे मत कहो, मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगी. क्या तुम वो पल भूल गए, जब मुझसे एक मिनट की दूरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी तुम्हें?”
“जब एक पल बर्दाश्त न होने जैसी बात थी, तब तो तुम विदेश में बसने और धन के लालच में किसी और से शादी करके चली गई थी.”
“तुम्हारा ग़ुस्सा जायज़ है, पर मैं नहीं समझ पा रही हूं कि एक लादे हुए रिश्ते को तुम क्यों ढो रहे हो? क्या मजबूरी है तुम्हारी? मैंने सोचा था कि मेरे प्रस्ताव पर तुम ख़ुशी से मुझे गले लगा लोगे.”
“यह ख़ुशफ़हमी है तुम्हारी, तुम अपने रूप का गर्व दिखा रही हो. इसके अलावा तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं. तुम दोनों की यदि तुलना की जाए, तो रीमा तुमसे बहुत आगे निकल जाएगी. तुम आत्मकेंद्रित, स्वार्थी व मौक़ापरस्त हो और वह त्याग, स्नेह व प्रेम की प्रतिमूर्ति है.”
“तुम मेरा अपमान कर रहे हो.”
“तुमने सम्मान की गुंजाइश ही कहां रखी. रीमा से मेरी शादी मेरी अनिच्छा से ज़रूर हुई, पर उसने अपने धैर्य, प्रेम और सहनशक्ति से मुझे जीत लिया. उसने मुझे अवसाद, निराशा से उबारा. मुझे जीवन की सौग़ात दी और तुम मेरे बसे-बसाए घर को उजाड़ने आई हो? मैं सोचता था कि तुम निश्छल मन से अपनी बहन के घर आई हो, किंतु उसके पीछे क्या उद्देश्य था, यह तो आज पता चला.”
सुगंधा के सारे अस्त्र नाकाम हो गए. वह फूट-फूटकर रोने लगी. प्रीतम आराम से नीचे आ गए.
मेरे विश्वास की जीत हुई. मेरे तो जैसे पंख निकल आए थे. बेवजह हंस और मुस्कुरा रही थी. अब मैं सजी-धजी थी और सुगंधा रंग उड़े चेहरे और बेतरतीब वस्त्रों में, अन्य सभी सामान्य थे.
अगले दिन अपने जाने की घोषणा करके सुगंधा ने सबको चकित कर दिया.
पूरे घटनाक्रम के बारे में प्रीतम ने मुझे कुछ बताया नहीं, न ही मैंने उनसे कुछ पूछा. घर के सदस्य भी सारी बातों से अनभिज्ञ थे कि किस तरह मेरी दुनिया बिखरने से बच गई. सब कुछ वैसे ही चलता रहा, प्रीतम के प्यार में दिनोंदिन बढ़ोतरी हुई, मेरा विश्वास और अधिक पुख्ता हो गया.
यारा तेरी यारी
एक छोटा सा गाँव...जंहा सब लोग आपस मे बड़े प्रेम से रहते थे...वैसे हर चिज गाँव से दूर थी..हर छोटी बड़ी चिजे शहर से लाना पड़ता था मगर गांव वाले किसी से कोई शिकायत किए खुशी खुशी शहर जाके अपने लिए वह चिजे लाते थे...बस सरकार ने एक काम चलाउ छोटा सा अस्पताल जरूर खोल दिया था.. उस छोटे से गाँव की सबसे अच्छी चिज और सुंदरता थी तो..तिन दोस्तों की दोस्ती...
राजेश, मोहीत और राज दुबे..वैसे ये छोटे थे मगर इनकी दोस्ती बेहद बड़ी थी, दोस्ती भी ऐसी की क्या कहे आपको...सुबह का नाश्ता एक दोस्त के घर मे दोपहर का खाना दूसरे के घर मे रात का खाना तिसरे के घर में । और वहीं तिनो हंसते खेलते सो जाते थे..सारे गाँव वाले उनकी दोस्ती की मिसाले दिया करते थे..तिनो हम उम्र जैसे होने के कारण एक ही साथ पढ़ते थे..गाँव के ही बगल मे एक गाँव था जो शहर से जुड़ा था और वहीं पे उनका सरकारी स्कूल था और वे तिनो साथ पांचवी कक्षा मे पढ़ते थे। स्कूल मे भी इनकी दोस्ती जग जाहिर थी..वैसे स्कूल उतना दूर नहीं था मगर रास्ते मे जो नदी पड़ती थी वह वक्त ज्यादा ले लेता था स्कूल पहुँचने के लिए।
छ भी करना हो तिनो ही पहले आगे होते थे मगर इन तिनो मे थोड़ा जिद्दी राजेश था इसलिए हर वक्त जिद करके वही पहले आगे बढ़ता था, बस ऐसे ही एक दिन आम तोड़ने के चक्कर मे राजेश..मोहीत और राज से जिद करके आम के पेड़ पर चढ गया..मगर बरसात का मौसम पेड़ फिसलन होने कारण राजेश पेड़ से निचे आ गीरा, जल्दी से आनन फनान मे राजेश को घर लाया गया। वह अब पूरी अपाहीज जैसा हो गया था, न उठ सकता था न चल सकता था, घर वालों का रो रो के बुरा हाल था मगर मोहीत और राज एक बार भी नहीं रोये। इनको देखकर गाँव वाले भी हैरान थे कि आखिर एक साथ रहने वाले एक ही थाली मे खाने वाले ये दोनों दोस्त अपनी दोस्त की हालत पे क्यों नहीं रोये मगर सबके पास सवाल था मगर जवाब शायद सिर्फ दोनों के पास था। स्कूल की पढ़ाई शुरू हो चुकी थी। तिनो मे से एक स्कूल जा नहीं सकता था। मगर दो दोस्त तो जा सकते थे मगर अचानक वह दोनों एक दिन गाँव से गायब हो गये..बहुत तलाश किया गया मगर नहीं मिले..
करीब महीने दिन उन तीनों दोस्त के मास्टर जी उनके गाँव आते हैं और पूरे गाँव वालों से कहते हैं की...मैं कल अपने शहर से बाहर दूसरे शहर गया था, वहाँ मेरी नजर राज और मोहीत पे पड़ी, मैं उन्हें देखकर हैरान रह गया..वे फटे पुराने कपड़े पहने शहर मे बड़े बड़े अमीर लोगों की गाडीया साफ कर रहे थे, और साथ मे वहाँ खड़े लोगों का गाना गाके नाचके मनोरंजन कर रहे थे,। मेरी नजर और एक शख्स को ढूँढ रही थी। वह था राजेश उनका जीगरी यार, मगर मैं हैरान रह गया उसे न देखकर जबकि स्कूल मे साथ बैठते साथ खेलते थे। एक को लगी है भी तो तिनो साथ जाते थे। हम स्कूल वाले उनकी दोस्ती देखकर बड़े हैरान रह जाते थे। मगर उस वक्त उसको उनके साथ न देखकर मैं और भी ज्यादा हैरान रह गया था। सोचा उन दोनों बच्चों से मिलू पर भीड़ की वजह से मैं शरर्मींदगी महसूस हुई। आप लोगों को छोटे उम्र मे बच्चों को काम पे शहर नहीं भेजना चाहिए। पढ़ने की उम्र है इन्हें पढ़ने देते तो अच्छा होता। ऐसे भी सरकारी स्कूल मे खर्चा ही कहा है। मास्टर जी की बातें सुनकर गाँव वाले सारी बिती बात बता देते है मास्टर जी को कि कैसे राजेश बिमार हुआ और अचानक कैसे गायब हो गये गाँव से मोहीत और राज, मास्टर जी दुखी मन से लौट जाते है।
अचानक दो दिन बाद पूरा गाँव हैरान रह जाता है मोहीत और राज को गाँव मे वापस आते देखकर। मगर साथ मे एक चमचमाती गाड़ी भी थी और उनके साथ एक नौजवान इंसान भी था सूटबूट में। राज और मोहीत सिधा उस व्यक्ति को लेके राजेश के घर जाते है।
राजेश को देखते ही मोहीत और राज गले लगकर जोर जोर से रोते है। सब हैरान। राजेश भी फफक फफक के रो पड़ता है। तभी वह नौजवान व्यक्ति कहता है राज और मोहीत से, तुम दोनों को रोने के शिवा कुछ आता भी है या नहीं ? इतना कहके वह व्यक्ति खुद भी अपनी पलकों को साफ करता है और गाँव वालों से कहता है की..ये दोनों बेहद अद्भुत बच्चे हैं। मै आज जो यंहा पे खड़ा हूँ इसकी वजह ये दोनों मासूम बच्चे हैं और मै पेशे से एक डाक्टर हूँ । ये दोनों बच्चे हर सुबह वक्त से पहले आके
हर रोज मेरी गाड़ी को साफ करते थे। मेरे घर के आस पास एक कचरा भी रहने नहीं देते थे। पैसे देने पर दोनों हाथ जोड़कर सर हिलाकर नहीं कहते थे। आखो मे नमी साफ देख सकता था मैं। ये रोज का काम था इनका। मगर पैसे देने पर इंकार करते थे। इनका पैसा न लेना मुझे बड़ा अजीब लगता था। क्योंकि हर कोई पैसो के लिए काम करता है मगर ये दोनों किसलिये मुफ्त मे काम करते थे मैं उस वक्त जान न सका।
कंहा रहते थे कहा सोते थे पता नहीं मगर हर सुबह वक्त से पहले मेरी गाड़ी साफ करने आ जाते थे, मैंने उस दिन अपनी पत्नी से कहा कि इन दोनों बच्चों पर जरा ध्यान देना तो? मुझे कुछ ठीक नही लग रहा है । कुछ भी शक होता है तो पुलिस मे रिपोर्ट कर देते है फिर मै अस्पताल चला गया। मेरी पत्नी ने क्या देखा कि मेरे जाने के बाद दोनों गले मिलकर रो रहे थे..और फिर आसमान की और हाथ उठाके रोते हुए कह रहे थे..हमारे दोस्त को ठीक कर दो भगवान। मेरी पत्नी को इनपे दया आई और अंदर बुलाया और इन्होंने जो कहानी बताई मेरी पत्नी तक को रूला दिया जबकी मैंने शादी से पहले वादा किया था की तुम्हारी पलकों मे कभी आशू का एक बूँद भी आने नहीं दूंगा। मगर मै भी रो पड़ा जब मेरी पत्नी ने रोते हुए इनकी दोस्ती की कहानी सुनाई
इन दोनों ने कहा कि हम बेहद गरीब है और अपने दोस्त का इलाज नहीं कर सकते इसलिए शहर पैसे कमाने आये है ताकी अपने दोस्त का इलाज कर सके..हम रात मे सिर्फ चार घन्टे सोते है और बाकी हम पैसे कमाने मे जुट जाते हैं । हमें तब तक वापस नहीं जाना है जब तक उसके लिए व्हील चियर खरीद नहीं लेते
मैडम - व्हील चियर? ?
दोनों दोस्त - हाँ मैडम व्हील चियर हमारा अजीज दोस्त हमारा राजेश अपाहीज हो गया है और हम उसके बिना एक कदम चल नहीं सकते। हम गरीब है मगर पढाई पूरी करना चाहते है मगर हम उसके बिना स्कूल नहीं जा सकते। इसलिए उसे भी हम अपने साथ व्हील चियर पे बिठाके स्कूल ले जायेगें।
मेरी पत्नी उनकी अद्भुत दोस्ती की कहानी सुनकर वह भी भावुक हो गई थी..
मैडम - ऐसी जिद अच्छी नहीं होती बच्चों। वापस लौट जाओ अपने गाँव ।
बच्चे - जिद अच्छी नहीं आप कहती हो मैडम मगर उस आदत का क्या करे जो उसके बिना जिया नहीं जाता। इस शहर मे आये कितने दिन हुए हमें पता नहीं मगर हर बार उसकी याद मे रोये है हमें पता है।
हम उस वक्त रो न सके जब वह बिमार हुआ था। शायद लोगों ने हमारी दोस्ती पर उँगली भी उठाई होगी,मगर रोते भी कैसे मैडम..हमारे एक आशू के बूँद हमारे दोस्त की जिंदगी के दिन कम कर देते। शायद उसे उसकी बिमारी से उतनी तकलीफ नहीं हुई होगी जितनी हमारे आशू से होता।
मैडम - तुम लोग तो बेवकूफ हो, आखिर रोज सुबह मेरे पति तुम्हें पैसे देते है मगर तुम लोग लेते क्यों नहीं?
बच्चे -हमें भगवान के पैसे नहीं हमें भगवान चाहिए
कयोंकि सवाल पैसों का नहीं जिंदगी का है और जिंदगी भी ऐसी जंहा तिन जिंदगी और तिन साँसें एक साथ जुड़ी हो
मेरी पत्नी ने तुरंत इन दोनों को गले लगाकर बोलो चलो नहा धोके कुछ खा लो। और येही रहो।
तुम्हारे भगवान तुम्हारे साथ तुम्हारे दोस्त को देखने जरूर जायेंगे और आज मैं यंहा आप सभी के सामने खड़ा हूँ। मैं अगले शनिवार को फिर आउंगा और राजेश को लेके जाऊँगा। और इसका इलाज कराउंगा। बस पैसों के नाम पे मुझे इन तिनो की दोस्ती सदा सलामत चाहिए
इधर मोहीत और राज अपने अपाहीज दोस्त को व्हील चियर पे बिठाके पूरा गाँव घूमते हैं । इन तिनो के एक साथ मुस्कुराने जैसे गाँव मे फिर से एक नयी रोशनी आई हो जैसे।
फिर सोमवार को तिनो स्कूल के लिए निकले है। व्हील चियर को आगे से राज खिच रहा है और पिछे से मोहीत धक्का दे रहा है और राजेश व्हील चियर पे बैठा मस्ती मे गाना गा रहा है...तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना
Wednesday, September 11, 2019
सौग़ात
साम्या! जनता स्टोर से बाहर निकलते हुए सहसा अपना नाम सुनकर वह सकपका गई. यहां ट्रांसफर हुए अभी एक हफ़्ता ही हुआ है. यहां कौन जानता है? शायद वहम् हुआ होगा, यही सोचकर वह तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गई, लेकिन वहम् सच बनकर सामने आ खड़ा हुआ. उसे यूं अचानक सामने पाकर वह जड़वत् हो गई और अतीत जैसे वर्तमान बनकर उभर आया.
वह नियत की आर्ट क्लासेस में पेंटिंग सीखने जाती थी. पेंटिंग सीखते-सीखते कब वह नियत से प्यार करने लगी, पता ही नहीं चला. उसकी इस चाहत को पढ़कर ही नियत ने उसे प्रपोज़ किया था, लेकिन ‘हां’ कहने से पहले उसने अपने माता-पिता की रज़ामंदी लेना ज़रूरी समझा.
“क्या? एक पेंटर से शादी? सपने में भी नहीं सोचना कि हम ऐसा होने देंगे. तुम्हें पेंटिंग का शौक़ था, इसलिए क्लासेस में भेज दिया, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि क़लम-कूंचीवाले से शादी कर लोगी. तुम इस राज्य के चीफ सेक्रेटरी की बेटी हो. तुम्हारी शादी होगी, तो किसी आईएएस या आईपीएस से.” मां ने तर्क दिया.
“…मगर मां, वो बहुत अच्छा इंसान है. मुझे बहुत चाहता है और फिर पेंटर होने में बुराई क्या है? वो इतनी अच्छी पेंटिंग करता है कि एक दिन ज़रूर क़ामयाब होगा. और नहीं करनी है मुझे आप लोगों की पसंद से किसी ब्यूरोक्रेट से शादी.” साम्या ने क्रोधपूर्वक कहा.
“समू बेटा, हम समझते हैं यह सब. लेकिन प्यार से पेट नहीं भरता और क्या गारंटी है उसकी सफलता की? आज क्या दे सकता है वो तुम्हें- बेकारी और ग़रीबी के सिवा.
ज़िंदगी चित्रकार के कैनवास पर नहीं, यथार्थ के धरातल पर रंग बिखेरती है, इसलिए मेरा भी यही फैसला है कि तुम्हारी शादी हमारे रुतबे के अनुसार होगी.” ब्यूरोक्रेट पिता ने आदेश सुनाया.
माता-पिता का अंतिम निर्णय आ चुका था, मगर वो अपने दिल को कैसे समझाती, जो हर पल नियत के लिए धड़कता था. उसकी पेंटिंग क्लासेस बंद कर दी गईं. बाद में पता चला कि नियत अपनी आर्ट गैलरी बंद कर कहीं चला गया था. साम्या जानती थी कि इसके पीछे उसके रसूख़दार पिता का हाथ था.
महीनों तक साम्या के चेहरे से उदासी के बादल नहीं छंटे. उसने अपनी पढ़ाई, पेंटिंग सब कुछ छोड़ दिया था. दिन-ब-दिन एक गहरे अंधेरे गड्ढे में धंसती जा रही थी वो. एक दिन नियत घर आया, “साम्या, मां ने गांव बुला लिया था और वहीं मेरी शादी भी तय कर दी. शादी की तैयारियों में इतना व्यस्त था कि बता नहीं पाया. अगले हफ़्ते मेरी शादी है. तुम ज़रूर आना.” उसने कहा.
साम्या को अपने कानों पर यक़ीन ही नहीं हो रहा था. जिस इंसान की चाहत में वो एक ज़िंदा लाश बन गई है, वो इतने दिनों अपनी शादी की तैयारियों में लगा था. उसने जी भर कर नियत को खरी-खोटी सुनाई, मगर उस कलाप्रेमी का हृदय नहीं पिघला. बिना कुछ कहे वो शादी का कार्ड रखकर चला गया.
बाद में न चाहते हुए भी साम्या ने पिता की इच्छा से एक ब्यूरोक्रेट से शादी कर ली. बात-बात में होनेवाली सरकारी, ग़ैर सरकारी पार्टियों में सज-संवरकर नकली मुस्कान ओढ़े जाना होता था उसे. लेकिन वह ख़ुश नहीं थी वहां. चाहकर भी उसकी आंखों से आंसू नहीं निकलते थे. घुटती ही जा रही थी भीतर ही भीतर.
इसी बीच उसने एक बेटी को जन्म दिया. जब उसका नाम नियति रखा, तो साम्या के माता-पिता की आंखें पथरा गईं. उन्हें लगता था कि शादी और संतान के बाद साम्या ख़ुश होगी, मगर आज साम्या की ज़िंदगी की
कड़वाहट उनकी आंखों में आंसू बनकर बह रही थी. साम्या विरह की आंच को कम करती, तभी तो ममता की शीतलता महसूस कर पाती. अपनी बेटी की ज़िंदगी की घुटन साम्या के पिता की ग्लानि बनकर उन्हें अंदर ही अंदर खोखला करती गई.
एक दिन बीमार पिता ने साम्या को अपने पास बुलाया.
“समू बेटा, मुझे माफ़ कर दो. मैंने तुमसे एक बहुत बड़ा सच छिपाया है. नियत ने शादी नहीं की है. मैंने उसके रिटायर्ड पिता की पेंशन बंद करवा दी थी, उसकी आर्ट गैलरी का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया था. उसके घरवालों के लिए रोटी के भी लाले पड़ गए थे. उस पर बीमार मां का इलाज बंद हो गया था. उसे इतना मजबूर कर दिया कि वो उस दिन घर आकर तुम्हारे सामने झूठ बोलकर चला गया. वो शादी का कार्ड भी मैंने ही छपवा कर दिया था, ताकि तुम उसकी बात पर यक़ीन कर लो. शायद आज भी इंतज़ार है उसे तुम्हारा…” कहकर पिता ने अंतिम सांस ली.
आज तक साम्या समझ नहीं पाई थी कि नियत की बेवफ़ाई के बावजूद वह क्यों नहीं भुला पा रही है उसे? आज मालूम हुआ कि नियत तो आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां साम्या ने उसे छोड़ा था.
मगर क्या साम्या में हिम्मत थी अपने पति और बेटी को छोड़ नियत की तलाश में निकल जाने की? विरह की अग्नि में झुलसना तो उसे मंज़ूर था, मगर क्या विवाह की अग्नि से बाहर निकलना उसके लिए संभव था- वो भी शादी के इतने सालों बाद? इसी उधेड़बुन में रहती थी कि तभी पति का डेपुटेशन पर जयपुर आना हुआ. साथ में साम्या और नियति भी आए. वह हमेशा सोचती थी कि यदि नियत उसके सामने आ गया तो क्या कहेगी, क्या करेगी, क्या संभाल पाएगी ख़ुद को, क्या उसके कांधे पर सिर रखकर अपने दुख उसे बता पाएगी?
“साम्या, तुम इसी तरह ख़ामोश खड़ी रही तो मुझे लगेगा कि तुमने मुझे माफ़ नहीं किया. मैंने जो भी किया था, मजबूरी में किया था. अंकल मेरे पास आए थे. उन्होंने बताया था कि वो तुम्हें सब कुछ सच-सच बतानेवाले हैं. आशा करता हूं कि तुम अब वो सारी बातें भुलाकर अपने परिवार में ख़ुश होगी.” नियत ने साम्या को झकझोरकर पूछा और वह अपने वर्तमान में लौटी.
“हं… हां नियत, ख़ुश हूं. बहुत ख़ुश हूं. तुम घर क्यों नहीं चलते? मेरी बेटी से भी…” मेरे शब्द मेरे कंठ में ही अटक गए.
“अरे हां. क्यों नहीं? अच्छा बताओ बेटी का नाम क्या रखा तुमने?” उसने पूछा.
“नाम… न… न…”
“क्या हुआ? अभी तक नाम नहीं रखा?”
“तुम घर चलो. उसी से पूछना.” कहकर साम्या ने लंबी आह भरी, मगर मन में तूफ़ान उमड़ रहे थे कि जब उसका नाम पता चलेगा, तो क्या सोचेगा नियत?
घर की दहलीज पर बैठी नियति उसे देखते ही ‘ममा, ममा’ कहते हुए दौड़कर आई. वो अपने दोनों हाथ ऊपर किए उसे गोद में लेने को कह रही थी. यह उसका रोज़ का नित्यक्रम था और रोज़ साम्या आया को देखकर कह देती, इसे संभालो, मैं बहुत थकी हुई हूं. मगर आज ये शब्द भी गले में ख़राश बनकर अटक गए थे. इससे पहले कि साम्या उसे गोद में उठाती, नियत उसे गोद में उठा चुका था.
“हैलो अंटल, आपटा माम टा है.” नियति ने तुतलाती आवाज़ में कहा.
“मेला माम नियट है. आपका नाम क्या है?”
“अले वाह, आपटा माम नियट औल मेला माम निअटि है.” नियति का इतना कहना था कि नियत की आंखें साम्या से टकराईं और जैसे पराजित सिपाही शत्रु से बचता यहां-वहां भागता है, वैसे ही साम्या की निगाहें पल भर में कितनी ही वस्तुओं से जा टकराईं. तेज़ क़दमों से वह रसोई की ओर चल दी, मगर रह-रहकर आंखें नियत के साथ खेलती अपनी बेटी पर जा पड़तीं. उसकी तोतली बोली पहली बार साम्या के कानों में मिश्री घोल रही थी. उसकी उजली हंसी साम्या की आत्मा पर सालों से छाए अंधकार को मिटा रही थी. उसकी वो निश्छल आंखें ईश्वर के दर्शन करा रही थीं. साम्या के ममत्व की धार जो अब तक सूखी थी, आज फूट-फूटकर बहना चाहती थी. पिता की व्यस्तता ने उस मासूम से पिता का प्यार छीना, तो मां की बेरुखी ने ममता का अधिकार.
खाना बनाकर साम्या ने मेज़ पर लगाया और नियत को खाना खाने के लिए कहा. वह नियति की बातों में इतना खो गया था कि उसने आंगन में ही बैठकर खाने को कहा, ताकि वो उसके साथ खेलते-खेलते खाना खा सके. साम्या भी दोनों के साथ आंगन में ही बैठ गई. आज नियत के साथ नियति की ख़ुशी में शामिल होकर साम्या की सारी घुटन दूर हो गई. ऐसा लग रहा था कि सांसों को नई ऑक्सीजन मिल गई थी.
मालूम ही नहीं चला कब साम्या के पति अवकाश आ गए और उन तीनों को आंगन में बैठे खेलते और खाते देखने लगे. सहसा साम्या की नज़र अवकाश पर पड़ी. उसकी नज़रें आत्मग्लानि से झुक गईं. क्या सोच रहे होंगे अवकाश? और फिर क्यों उसके दिमाग़ में नहीं आया कि उसे फोन करके अवकाश को बता देना चाहिए था कि नियत घर पर आया है? फिर भी अपनी ग्लानि को दूरकर उसने अवकाश से कहा, “आप कब आए, पता ही नहीं चला. ये नियत हैं, मेरे पुराने दोस्त. मैं फोन करके आपको बताने ही वाली थी.”
“अरे, कोई बात नहीं. आप लोग डिनर जारी रखो. मैं हाथ-मुंह धोकर जॉइन करता हूं.” अवकाश ने नियत से हाथ मिलाकर कहा.
खाने के बाद अवकाश और नियत कुछ देर लॉन में टहलते रहे और फिर उसने हम सबसे विदा ली. एक हफ़्ता होने को आया है नियत को आए, ऐसे में साम्या की ख़ुशी, ज़िंदादिली तो जैसे फिर लौट आई थी. आज अचानक दोपहर में नियत आया.
उसने साम्या को एक तस्वीर थमाई और कहने लगा, “तुम्हें मालूम है, तुम्हारी बेरुखी और विरह में सबसे ज़्यादा किसने खोया है? तुम सोचती होगी कि तुमने अपनी मुहब्बत खोई है, अपने परिवार के रुतबे की वेदी पर. लेकिन नहीं साम्या, तुमसे कहीं ज़्यादा खोया है अवकाश ने.
उस दिन अवकाश मुझे लॉन में टहलने के लिए इसलिए ले गया, ताकि वो मुझसे तुम्हें और नियति को अपनाने की विनती कर सके. उसके चेहरे पर तुम्हारी तड़प और नियति के साथ हुआ अन्याय साफ़ झलक रहा था. उसने बताया कि किस तरह शादी की पहली रात ही तुम्हारे मन के घाव मृत जैसे तुम्हारे शरीर ने उसे बता दिए थे. बाद में उसने ऑफिस और घर-परिवार की पार्टी इत्यादि में तुम्हें ले जाकर तुम्हारा मन बदलने की कोशिश भी की, लेकिन हर बार तुम्हारी घुटन और बढ़ती जाती. अंततः अवकाश ने तय किया कि वो ख़ुद को काम में इतना झोंक लेगा कि चाहकर भी वो तुम्हें न चाहे और व़क्त आने पर वो तुम्हें उस व्यक्ति को सौंप सके, जिसकी विरह में तुम हर पल जल रही थी. नियति के जन्म पर हर बाप की तरह अवकाश भी बहुत ख़ुश था, लेकिन जब तुमने उसका नाम नियति रखा और तुम्हारे मम्मी-पापा के चेहरे से ख़ुशी ग़ायब हो गई, तो वह समझ गया कि इस नाम का तुम्हारे अतीत से कुछ संबंध है. तभी उसने अंकल से तुम्हारे अतीत के बारे में पूछा. अवकाश के कहने पर ही अंकल ने तुम्हें सब कुछ सच-सच बताया.
जब अवकाश को पता चला कि मैं यहां जयपुर में हूं, तो उसने डेपुटेशन के बहाने यहां ट्रांसफर करवा लिया, ताकि किसी बहाने से हम दोनों एक-दूसरे के सामने आ जाएं. उस दिन अवकाश ने मुझसे विनती की थी कि मैं तुम्हें और नियति को अपना लूं. लेकिन मैं यह नहीं कर सकता, क्योंकि तुम दोनों पर यदि किसी का सबसे ज़्यादा अधिकार है, तो वह है- अवकाश. मैंने तुम्हें जो तस्वीर दी है, उसमें तुम तीनों साथ हो. आशा करता हूं कि तुम्हारा निर्णय इस कल्पना को यथार्थ बना देगा.”
इतना कहकर नियत चला गया, लेकिन साम्या ने निर्णय लिया कि उसकी यह तस्वीर साम्या के परिवार के लिए सबसे अनमोल सौग़ात
बनकर रहेगी.
वह नियत की आर्ट क्लासेस में पेंटिंग सीखने जाती थी. पेंटिंग सीखते-सीखते कब वह नियत से प्यार करने लगी, पता ही नहीं चला. उसकी इस चाहत को पढ़कर ही नियत ने उसे प्रपोज़ किया था, लेकिन ‘हां’ कहने से पहले उसने अपने माता-पिता की रज़ामंदी लेना ज़रूरी समझा.
“क्या? एक पेंटर से शादी? सपने में भी नहीं सोचना कि हम ऐसा होने देंगे. तुम्हें पेंटिंग का शौक़ था, इसलिए क्लासेस में भेज दिया, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि क़लम-कूंचीवाले से शादी कर लोगी. तुम इस राज्य के चीफ सेक्रेटरी की बेटी हो. तुम्हारी शादी होगी, तो किसी आईएएस या आईपीएस से.” मां ने तर्क दिया.
“…मगर मां, वो बहुत अच्छा इंसान है. मुझे बहुत चाहता है और फिर पेंटर होने में बुराई क्या है? वो इतनी अच्छी पेंटिंग करता है कि एक दिन ज़रूर क़ामयाब होगा. और नहीं करनी है मुझे आप लोगों की पसंद से किसी ब्यूरोक्रेट से शादी.” साम्या ने क्रोधपूर्वक कहा.
“समू बेटा, हम समझते हैं यह सब. लेकिन प्यार से पेट नहीं भरता और क्या गारंटी है उसकी सफलता की? आज क्या दे सकता है वो तुम्हें- बेकारी और ग़रीबी के सिवा.
ज़िंदगी चित्रकार के कैनवास पर नहीं, यथार्थ के धरातल पर रंग बिखेरती है, इसलिए मेरा भी यही फैसला है कि तुम्हारी शादी हमारे रुतबे के अनुसार होगी.” ब्यूरोक्रेट पिता ने आदेश सुनाया.
माता-पिता का अंतिम निर्णय आ चुका था, मगर वो अपने दिल को कैसे समझाती, जो हर पल नियत के लिए धड़कता था. उसकी पेंटिंग क्लासेस बंद कर दी गईं. बाद में पता चला कि नियत अपनी आर्ट गैलरी बंद कर कहीं चला गया था. साम्या जानती थी कि इसके पीछे उसके रसूख़दार पिता का हाथ था.
महीनों तक साम्या के चेहरे से उदासी के बादल नहीं छंटे. उसने अपनी पढ़ाई, पेंटिंग सब कुछ छोड़ दिया था. दिन-ब-दिन एक गहरे अंधेरे गड्ढे में धंसती जा रही थी वो. एक दिन नियत घर आया, “साम्या, मां ने गांव बुला लिया था और वहीं मेरी शादी भी तय कर दी. शादी की तैयारियों में इतना व्यस्त था कि बता नहीं पाया. अगले हफ़्ते मेरी शादी है. तुम ज़रूर आना.” उसने कहा.
साम्या को अपने कानों पर यक़ीन ही नहीं हो रहा था. जिस इंसान की चाहत में वो एक ज़िंदा लाश बन गई है, वो इतने दिनों अपनी शादी की तैयारियों में लगा था. उसने जी भर कर नियत को खरी-खोटी सुनाई, मगर उस कलाप्रेमी का हृदय नहीं पिघला. बिना कुछ कहे वो शादी का कार्ड रखकर चला गया.
बाद में न चाहते हुए भी साम्या ने पिता की इच्छा से एक ब्यूरोक्रेट से शादी कर ली. बात-बात में होनेवाली सरकारी, ग़ैर सरकारी पार्टियों में सज-संवरकर नकली मुस्कान ओढ़े जाना होता था उसे. लेकिन वह ख़ुश नहीं थी वहां. चाहकर भी उसकी आंखों से आंसू नहीं निकलते थे. घुटती ही जा रही थी भीतर ही भीतर.
इसी बीच उसने एक बेटी को जन्म दिया. जब उसका नाम नियति रखा, तो साम्या के माता-पिता की आंखें पथरा गईं. उन्हें लगता था कि शादी और संतान के बाद साम्या ख़ुश होगी, मगर आज साम्या की ज़िंदगी की
कड़वाहट उनकी आंखों में आंसू बनकर बह रही थी. साम्या विरह की आंच को कम करती, तभी तो ममता की शीतलता महसूस कर पाती. अपनी बेटी की ज़िंदगी की घुटन साम्या के पिता की ग्लानि बनकर उन्हें अंदर ही अंदर खोखला करती गई.
एक दिन बीमार पिता ने साम्या को अपने पास बुलाया.
“समू बेटा, मुझे माफ़ कर दो. मैंने तुमसे एक बहुत बड़ा सच छिपाया है. नियत ने शादी नहीं की है. मैंने उसके रिटायर्ड पिता की पेंशन बंद करवा दी थी, उसकी आर्ट गैलरी का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया था. उसके घरवालों के लिए रोटी के भी लाले पड़ गए थे. उस पर बीमार मां का इलाज बंद हो गया था. उसे इतना मजबूर कर दिया कि वो उस दिन घर आकर तुम्हारे सामने झूठ बोलकर चला गया. वो शादी का कार्ड भी मैंने ही छपवा कर दिया था, ताकि तुम उसकी बात पर यक़ीन कर लो. शायद आज भी इंतज़ार है उसे तुम्हारा…” कहकर पिता ने अंतिम सांस ली.
आज तक साम्या समझ नहीं पाई थी कि नियत की बेवफ़ाई के बावजूद वह क्यों नहीं भुला पा रही है उसे? आज मालूम हुआ कि नियत तो आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां साम्या ने उसे छोड़ा था.
मगर क्या साम्या में हिम्मत थी अपने पति और बेटी को छोड़ नियत की तलाश में निकल जाने की? विरह की अग्नि में झुलसना तो उसे मंज़ूर था, मगर क्या विवाह की अग्नि से बाहर निकलना उसके लिए संभव था- वो भी शादी के इतने सालों बाद? इसी उधेड़बुन में रहती थी कि तभी पति का डेपुटेशन पर जयपुर आना हुआ. साथ में साम्या और नियति भी आए. वह हमेशा सोचती थी कि यदि नियत उसके सामने आ गया तो क्या कहेगी, क्या करेगी, क्या संभाल पाएगी ख़ुद को, क्या उसके कांधे पर सिर रखकर अपने दुख उसे बता पाएगी?
“साम्या, तुम इसी तरह ख़ामोश खड़ी रही तो मुझे लगेगा कि तुमने मुझे माफ़ नहीं किया. मैंने जो भी किया था, मजबूरी में किया था. अंकल मेरे पास आए थे. उन्होंने बताया था कि वो तुम्हें सब कुछ सच-सच बतानेवाले हैं. आशा करता हूं कि तुम अब वो सारी बातें भुलाकर अपने परिवार में ख़ुश होगी.” नियत ने साम्या को झकझोरकर पूछा और वह अपने वर्तमान में लौटी.
“हं… हां नियत, ख़ुश हूं. बहुत ख़ुश हूं. तुम घर क्यों नहीं चलते? मेरी बेटी से भी…” मेरे शब्द मेरे कंठ में ही अटक गए.
“अरे हां. क्यों नहीं? अच्छा बताओ बेटी का नाम क्या रखा तुमने?” उसने पूछा.
“नाम… न… न…”
“क्या हुआ? अभी तक नाम नहीं रखा?”
“तुम घर चलो. उसी से पूछना.” कहकर साम्या ने लंबी आह भरी, मगर मन में तूफ़ान उमड़ रहे थे कि जब उसका नाम पता चलेगा, तो क्या सोचेगा नियत?
घर की दहलीज पर बैठी नियति उसे देखते ही ‘ममा, ममा’ कहते हुए दौड़कर आई. वो अपने दोनों हाथ ऊपर किए उसे गोद में लेने को कह रही थी. यह उसका रोज़ का नित्यक्रम था और रोज़ साम्या आया को देखकर कह देती, इसे संभालो, मैं बहुत थकी हुई हूं. मगर आज ये शब्द भी गले में ख़राश बनकर अटक गए थे. इससे पहले कि साम्या उसे गोद में उठाती, नियत उसे गोद में उठा चुका था.
“हैलो अंटल, आपटा माम टा है.” नियति ने तुतलाती आवाज़ में कहा.
“मेला माम नियट है. आपका नाम क्या है?”
“अले वाह, आपटा माम नियट औल मेला माम निअटि है.” नियति का इतना कहना था कि नियत की आंखें साम्या से टकराईं और जैसे पराजित सिपाही शत्रु से बचता यहां-वहां भागता है, वैसे ही साम्या की निगाहें पल भर में कितनी ही वस्तुओं से जा टकराईं. तेज़ क़दमों से वह रसोई की ओर चल दी, मगर रह-रहकर आंखें नियत के साथ खेलती अपनी बेटी पर जा पड़तीं. उसकी तोतली बोली पहली बार साम्या के कानों में मिश्री घोल रही थी. उसकी उजली हंसी साम्या की आत्मा पर सालों से छाए अंधकार को मिटा रही थी. उसकी वो निश्छल आंखें ईश्वर के दर्शन करा रही थीं. साम्या के ममत्व की धार जो अब तक सूखी थी, आज फूट-फूटकर बहना चाहती थी. पिता की व्यस्तता ने उस मासूम से पिता का प्यार छीना, तो मां की बेरुखी ने ममता का अधिकार.
खाना बनाकर साम्या ने मेज़ पर लगाया और नियत को खाना खाने के लिए कहा. वह नियति की बातों में इतना खो गया था कि उसने आंगन में ही बैठकर खाने को कहा, ताकि वो उसके साथ खेलते-खेलते खाना खा सके. साम्या भी दोनों के साथ आंगन में ही बैठ गई. आज नियत के साथ नियति की ख़ुशी में शामिल होकर साम्या की सारी घुटन दूर हो गई. ऐसा लग रहा था कि सांसों को नई ऑक्सीजन मिल गई थी.
मालूम ही नहीं चला कब साम्या के पति अवकाश आ गए और उन तीनों को आंगन में बैठे खेलते और खाते देखने लगे. सहसा साम्या की नज़र अवकाश पर पड़ी. उसकी नज़रें आत्मग्लानि से झुक गईं. क्या सोच रहे होंगे अवकाश? और फिर क्यों उसके दिमाग़ में नहीं आया कि उसे फोन करके अवकाश को बता देना चाहिए था कि नियत घर पर आया है? फिर भी अपनी ग्लानि को दूरकर उसने अवकाश से कहा, “आप कब आए, पता ही नहीं चला. ये नियत हैं, मेरे पुराने दोस्त. मैं फोन करके आपको बताने ही वाली थी.”
“अरे, कोई बात नहीं. आप लोग डिनर जारी रखो. मैं हाथ-मुंह धोकर जॉइन करता हूं.” अवकाश ने नियत से हाथ मिलाकर कहा.
खाने के बाद अवकाश और नियत कुछ देर लॉन में टहलते रहे और फिर उसने हम सबसे विदा ली. एक हफ़्ता होने को आया है नियत को आए, ऐसे में साम्या की ख़ुशी, ज़िंदादिली तो जैसे फिर लौट आई थी. आज अचानक दोपहर में नियत आया.
उसने साम्या को एक तस्वीर थमाई और कहने लगा, “तुम्हें मालूम है, तुम्हारी बेरुखी और विरह में सबसे ज़्यादा किसने खोया है? तुम सोचती होगी कि तुमने अपनी मुहब्बत खोई है, अपने परिवार के रुतबे की वेदी पर. लेकिन नहीं साम्या, तुमसे कहीं ज़्यादा खोया है अवकाश ने.
उस दिन अवकाश मुझे लॉन में टहलने के लिए इसलिए ले गया, ताकि वो मुझसे तुम्हें और नियति को अपनाने की विनती कर सके. उसके चेहरे पर तुम्हारी तड़प और नियति के साथ हुआ अन्याय साफ़ झलक रहा था. उसने बताया कि किस तरह शादी की पहली रात ही तुम्हारे मन के घाव मृत जैसे तुम्हारे शरीर ने उसे बता दिए थे. बाद में उसने ऑफिस और घर-परिवार की पार्टी इत्यादि में तुम्हें ले जाकर तुम्हारा मन बदलने की कोशिश भी की, लेकिन हर बार तुम्हारी घुटन और बढ़ती जाती. अंततः अवकाश ने तय किया कि वो ख़ुद को काम में इतना झोंक लेगा कि चाहकर भी वो तुम्हें न चाहे और व़क्त आने पर वो तुम्हें उस व्यक्ति को सौंप सके, जिसकी विरह में तुम हर पल जल रही थी. नियति के जन्म पर हर बाप की तरह अवकाश भी बहुत ख़ुश था, लेकिन जब तुमने उसका नाम नियति रखा और तुम्हारे मम्मी-पापा के चेहरे से ख़ुशी ग़ायब हो गई, तो वह समझ गया कि इस नाम का तुम्हारे अतीत से कुछ संबंध है. तभी उसने अंकल से तुम्हारे अतीत के बारे में पूछा. अवकाश के कहने पर ही अंकल ने तुम्हें सब कुछ सच-सच बताया.
जब अवकाश को पता चला कि मैं यहां जयपुर में हूं, तो उसने डेपुटेशन के बहाने यहां ट्रांसफर करवा लिया, ताकि किसी बहाने से हम दोनों एक-दूसरे के सामने आ जाएं. उस दिन अवकाश ने मुझसे विनती की थी कि मैं तुम्हें और नियति को अपना लूं. लेकिन मैं यह नहीं कर सकता, क्योंकि तुम दोनों पर यदि किसी का सबसे ज़्यादा अधिकार है, तो वह है- अवकाश. मैंने तुम्हें जो तस्वीर दी है, उसमें तुम तीनों साथ हो. आशा करता हूं कि तुम्हारा निर्णय इस कल्पना को यथार्थ बना देगा.”
इतना कहकर नियत चला गया, लेकिन साम्या ने निर्णय लिया कि उसकी यह तस्वीर साम्या के परिवार के लिए सबसे अनमोल सौग़ात
बनकर रहेगी.
नई सोच नई दिशा
कभी किसी काल में किसी नगर में राम और श्याम नामक दो धनी व्यापारी रहते थे. वे दोनों ही अपने धन और वैभव का बड़ा प्रदर्शन करते थे.
एक दिन राम अपने मित्र श्याम के घर उससे भेंट करने के लिए गया. राम ने देखा कि श्याम का घर बहुत विशाल और तीन मंजिला था. 2 साल पहले तीन मंजिला घर होना बड़ी बात थी और उसे बनाने के लिए बहुत धन और कुशल वास्तुकार की आवश्यकता होती थी. राम ने यह भी देखा कि नगर में सभी निवासी श्याम के घर को बड़े विस्मय से देखते थे और उसकी बहुत बड़ाई करते थे.
अपने घर वापसी पर राम बहुत उदास था कि श्याम के घर ने सभी का ध्यान खींच लिया था. उसने उसी वास्तुकार को बुलवाया जिसने श्याम का घर बनाया था. उसने वास्तुकार से श्याम के घर जैसा ही तीन मंजिला घर बनाने को कहा. वास्तुकार ने इस काम के लिए हामी भर दी और काम शुरू हो गया.
कुछ दिनों बाद राम काम का मुआयना करने के लिए निर्माणस्थल पर गया. जब उसने नींव खोदे जाने के लिए मजदूरों को गहरा गड्ढा खोदते देखा तो वास्तुकार को बुलाया और पूछा कि इतना गहरा गड्ढा क्यों खोदा जा रहा है.
“मैं आपके बताये अनुसार तीन मंजिला घर बनाने के लिए काम कर रहा हूँ”, वास्तुकार ने कहा, “सबसे पहले मैं मजबूत नींव बनाऊँगा, फिर क्रमशः पहली मंजिल, दूसरी मंजिल और तीसरी मंजिल बनाऊंगा.”
“मुझे इस सबसे कोई मतलब नहीं है!”, राम ने कहा, “तुम सीधे ही तीसरी मंजिल बनाओ और उतनी ही ऊंची बनाओ जितनी ऊंची तुमने श्याम के लिए बनाई थी. नींव की और बाकी मंजिलों की परवाह मत करो!”
“ऐसा तो नहीं हो सकता”, वास्तुकार ने कहा.
“ठीक है, यदि तुम यह नहीं करोगे तो मैं किसी और से करवा लूँगा”, राम ने नाराज़ होकर कहा.
उस नगर में कोई भी वास्तुकार नींव के बिना वह घर नहीं बना सकता था, फलतः वह घर कभी न बन पाया. अतः किसी भी बड़े कार्य को सम्पन्न करने के लिए उसकी नीव सबसे मजबूत बनानी चाहिए एवं काम को योजनाबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए ।
"किसी भी बड़े कार्य को सम्पन्न करने के लिए उसकी नीव सबसे मजबूत बनानी"
गृहस्थी
संत कबीर रोज सत्संग किया करते थे दूर-दूर से लोग उनकी बात सुनने आते थे .
एक दिन सत्संग पूरा होने पर भी ...एक आदमी बैठा ही रहा कबीर ने कारण पूछा तो वह बोला -मुझे आपसे कुछ पूछना है ....
मैं गृहस्थ हूँ घर में सभी लोगों से ...मेरा झगड़ा होता रहता है खासकर अपनी पत्नी से ....
मैं जानना चाहता हूँ, कि मेरे यहाँ गृह क्लेश क्यों होता है, और वह कैसे दूर हो सकता है ......
कबीर थोड़ी देर चुप रहे....
फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा -सुनो जरा लालटेन जलाकर लाओ....कबीर की पत्नी लालटेन जलाकर ले आई....वह आदमी भौंचक देखता रहा, और
सोचने लगा - इतनी दोपहर में कबीर ने लालटेन क्यों मंगाई ...
थोड़ी देर बाद कबीर बोले -सुनो कुछ मीठा दे जाना.....
इस बार उनकी पत्नी .. मीठे के बजाय ..
नमकीन देकर चली गई.
उस आदमी ने सोचा कि -ये मे कहा फंस गया यह तो शायद पागलों का घर है.....
मीठे के बदले नमकीन
और दिन में लालटेन...
वह कुछ निराश होते बोला -कबीर जी ! मैं चलता हूँ.
कबीर ने पूछा -आपको अपनी समस्या का समाधान
मिला या अभी कुछ संशय बाकी है ....
वह व्यक्ति बोला -समाधान.... ये कैसा समाधान है..
मेरी समझ में कुछ नहीं आया.
कबीर ने कहा -जब मैंने लालटेन मंगवाई
तो मेरी घरवाली कह सकती थी -तुम सठिया गए हो क्या ....इतनी दोपहर में ...लालटेन की क्या जरूरत ...
लेकिन नहीं ... उसने सोचा कि जरूर किसी काम के लिए लालटेन मंगवाई होगी....
जब मीठा मंगवाया, तो ...वह नमकीन देकर चली गई.
हो सकता है, घर में ...कोई मीठी वस्तु न हो.
यही सोचकर ... मैं चुप रहा.....
इसमें तकरार क्या ....
आपसी विश्वास बढ़ाने, और
तकरार में न फंसने से ...
विषम परिस्थिति अपने आप दूर हो गई....
उस आदमी को हैरानी तो हुई मगर वह समझ गया कि कबीर ने, यह सब ...उसे बताने और समझाने के लिए किया था.....
कबीर ने फिर कहा ....
गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही
तालमेल बनता है.
आदमी से गलती हो तो ...औरत संभाल ले. ....
और औरत से कोई त्रुटि हो जाए तो ...पति उसे नजर अंदाज कर दे.....यही गृहस्थी का मूल मंत्र है....
दोस्तों घरों मे लडाई झगड़े कयो होते है ...
वजह सिर्फ अहम और विश्वास की कमी के चलते ..पति पत्नी एकदूसरे के पूरक होते है ये दोनों को पता है इसीलिए गर एक से कोई गलती हो तो दूसरे को समझदारी दिखाते सयंम से काम लेते उसे प्यार से नाकी गुस्से से ....उस समस्या का समाधान करना चाहिए ..एकदूसरे मे कमियों को कम और विश्वास को अधिक महत्व देना चाहिए फिर देखिए जीवन की ये गाड़ी गड्डो वाली सडको पर भी सुगमता से दौडेगी ..
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असली पूजा
ये लड़की कितनी नास्तिक है ...हर रोज मंदिर के सामने से गुजरेगी मगर अंदर आकर आरती में शामिल होना तो दूर, भगवान की मूर्ति ...
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रात बीतने को आई किन्तु वकील साहब की आँखों में नींद नहीं थी| सारी सात वे अँधेरे में ही कमरे की छत की ओर आँखें गड़ाए ताकते रहे| कभी करवट बदलत...
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इन 60-65 साल के अंकल आंटी का झगड़ा ख़त्म ही नहीं होता..... एक बार मैंने सोचा अंकल और आंटी से बात करू क्यों लड़ते हैं, हर वक़्त आख़ि...
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फ़ुर्सत में था , सोचा चलो आज थोड़ी सी जिंदगी सुलझा लूँ । अलमारी खोली तो ढ़ेर सारे सपनें नीचे गिर गये , ना जाने कब से रखे थे वहाँ , बे...